दिसंबर 23, 2012

अब यहाँ किताब नहीं मिलते .....

दिल्ली में रहते हुए एक बात की लत सी लग गयी वो थी किताबें खरीदने की । 
मुहल्ले की दुकान बुक पॉइंट से लेकर हर बड़ी और प्रसिद्ध जगह पर किताबों की दुकानों ने न सिर्फ किताबों के लिए ललचाया बल्कि प्रभावित भी किया । एक बार की बात है , मैं और विकास कमरा छोड़ने वाले थे और चाह रहे थे के मुखर्जी नगर में रहने चले जाएँ । कमरा भी मिल गया था और सबकुछ तय भी हो गया था फिर विकास ने कहा के मुखर्जी नगर में कितनी किताबों की दुकानें हैं , ये तो हमारा खर्चा बढ़ा देंगी ! अब सोचते हैं तो लगता है के कितनी मामूली सी बात पर हमने मूखर्जी नगर में रहने का विचार त्याग दिया था लेकिन उस समय जब घर दिल्ली में रह कर तैयारी करने के लिए 2000 रूपय महीने के मिलते थे उनमें से यदि बहुत से रूपय किताब-पत्रिकाओं में ही चले जाएँ तो खाने का संकट आना लाजिमी था । और अच्छा किया कि नहीं गए मुखर्जी नगर, यहीं रहे और पैसे बचा कर किताबों पर लगाए । 

किताबों के मामले में  दिल्ली की स्थिति हमारे शहर से अलग थी । जहां सहरसा में अधिकतम इंजीनियरिंग की तैयारी की किताबें ही मिलती थी वहीं यहाँ पर अलग अलग रुचियों और स्वाद की किताबें । किताबों के स्वाद लेने के बारे में कृष्ण कुमार याद आते हैं पर उनकी बात कभी और .... 
कुल मिला कर सहरसा में रेलवे स्टेशन ही एकमात्र स्थान था जहां साहित्य से संबन्धित कुछ किताबें मिल जाती थी । तमाम सीमाओं के बावजूद सहरसा रेलवे स्टेशन पर बैठकर किताबें पढ़ने का अलग ही आनंद होता था । कितनी बार तो टी टी से झड़प हुई थी । फिर भी सारी किताबें वहाँ नहीं मिलती थी । मैं जब दिल्ली आ गया था तो दो तीन बार मित्र मिथिलेश जो आज एक नामी युवा कवि हैं उनके लिए यहाँ से किताबें भेजी क्योंकि सारी किताबें वहाँ नही मिलती थी । बहरहाल किताबों के मामले में दिल्ली ने न सिर्फ अवसर ही दिये बल्कि एक रुचि भी जगाई ...यहाँ समय समय पर होने वाले पुस्तक मेलों ने तो लगभग हर इच्छा पूरी करने की ठान रखी थी । और ऐसा ही किया कई बार यमुना विहार की उस दुकान ने जहां पुरानी किताबें आधी कीमत पर आज भी मिल जाती हैं । लेकिन दरियागंज में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार ने खासा निराश किया वहाँ हर बार वो किताबें नहीं मिली जो लेनी थी । 

इस बीच एक लंबा अरसा गुजर गया है , यमुना विहार का बुक पॉइंट बंद हो गया । मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर में चलने वाली दुकान भी लगभग उसी समय बंद हो गयी । जिस मुहल्ले में रहता हूँ वहाँ भी हमारे शहर सहरसा की तर्ज पर अब केवल प्रतियोगिता की तैयारी करने वाली किताबें ही मिलती हैं । मुखर्जी नगर की बहुत सी किताब की दुकानें बंद हो गयी अब वहाँ फैशनेबल कपड़ों और खाने की दुकानें आ गयी हैं । इधर कोढ़ में खाज की तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में चलने वाली किताब की दुकान को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बंद करा दिया गया है वहाँ कुछ नया खुलने वाला है और कहा जा रहा है कि किताब की उस दुकान के लिए अन्यत्र कोई जगह उपलब्ध कराई जायी जाएगी । ये दौर एक साथ ही आया है ... हमले किताबों पर ही हो रहे हैं । यूं ऊपर से देखने पर यह कोई बड़ी बात नही लगती लेकिन किताबों का जिस तरह से विचारों की मजबूती , उनके निर्माण एवं परिवर्तन में योगदान रहता है उसे देखते हुए ये सब एक सोची समझी प्रक्रिया ही लगती है और एक हमला भी । किताबों का व्यवसाय बहुत मुनाफे का व्यवसाय भी नहीं है कि इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनी आए और इसका पुनुरुत्थान हो । इस लिहाज से देखें तो हम काफी आगे बढ़ चुके हैं और विचारों की खुराक हमारी किताबें छुट रहीं हैं । 

कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के एक पुस्तकालय कर्मी से बात हो रही थी , उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कहा जा रहा है कि अब खर्च में कटौती के तहत मुद्रित शोध पत्रिकाएँ खरीदने के बदले 'इ-जर्नल' की खरीद सुनिश्चित की जाए । यहाँ समस्या ये है कि विभिन्न विभागों में जीतने छात्र पढ़ते हैं उतनी मात्रा में कम्प्यूटर नहीं हैं जिससे कि सभी छात्र सुगमता से इ-जर्नल पढ़ सकें । और सब के पास कंप्यूटर भी नहीं है कि उसे घर में बैठ के ही पढ़ा जा सके । 
दुकानों के बंद होने और शिक्षा संस्थाओं के बदलते नजरिए ने पढ़ने की संस्कृति को प्रभावित किया है । इसका प्रभाव दिल्ली में बहुत गहरा रहा है । एक किताब की जरूरत हो तो अब कोई निश्चित ठौर के नही रहने की दशा में सीधे प्रकाशन से लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है ... 
ऐसे समय में एक सुबह जब एक मित्र ने फोन पर अपने विभाग में पुस्तकालय के लिए समाज विज्ञान की किताबों के बारे में नाम बताने को कहा । आश्चर्य कि कोई विभाग अब भी ऐसा सोचता है ... पर ये विभाग दिल्ली नहीं पंजाब के एक जिले में है !

दिसंबर 19, 2012

समाधान मोमबत्ती जलाना भर नहीं है .....

पूरा भरोसा है कि जिस  समय में हम जी रहे हैं वह बहुत जल्द भुला दिया जाएगा । जिस शिद्दत और घनत्व से हम आज ये सब महसूस कर रहे हैं वह काफ़ूर होना है और इस घटना को बहुत तेज़ी से बदलते वक़्त के हाथों में दे देना है । फिर ऐसी ही घटना बिलकुल नयी लगेगी , लगेगा ऐसा तो कभी हुआ ही नही था , ये तो पहली बार हो रहा है । एक शर्म , कुछ न कर पाने की निरीहता और प्रतिक्रिया देने की सहज प्रवृत्ति और भावनात्मक कौतुक से मिली जुली गरम हवा बह रही है । इस सर्दी में भी इस समूहिक शर्म के समय शरीर का पसीने से तर हो जाना स्वाभाविक है । इसके साथ ही तकनीक एवं सामाजिक संचार भी उसके लिए या किसी भी अन्य घटना के पक्ष में कुछ करने का विकल्प दे रहा है और इसी का गवाह बन रहा है मोमबत्ती से रौशन इंडिया गेट । पर यह सब किसलिए ? कब तक ?


बलात्कार आज एक आम फहम शब्द और एक सुबोध सी संकल्पना लगती है क्योंकि यह सूरज उगने जैसी घटना बन गयी है । आज इस शब्द को बच्चों के सामने भी बोला जा सकता है वो भी इसका अर्थ जानते हैं और हम ये कहते हैं कि बच्चे अब मासूम नही रहे । अर्थात यह शब्द आए दिन आए दिन होने वाली घटना से  प्रचलन में आने कर एक अलग सामाजिक स्वरूप को समझा रहा है । भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से यह कोई बहुत बड़ी बात हो ऐसा नही है लेकिन समाज के लिए इस शब्द का बहू-प्रयोग एक खतरे की घंटी है । यह भारतीय समाज की कोई बहुत उम्दा तस्वीर पेश करता हो ऐसा नही है ।

ये एक नयी घटना नही है और न ही बहुत दिनों बाद घटी है । लेकिन इस पर यह आक्रोश नया है । यह क्यों है इसकी व्याख्या के लिए यह समय नहीं है । बहुत सी घटनाएँ हमारे यहाँ होती रहीं हैं इस से भी वीभत्स पर जो खबर नही बन पायी वह रह गयी दाब कर । और जो खबर बनी भी जिस पर बहुत हाय तौबा मची भी वो भी किसी अंजाम पर पहुँचने से पहले ही दफन हो गयी । ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है । किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की हालांकि यह एक जल्दबाज़ी है पर ऐसा कहा जा सकता है कि हम बहुत जल्दी भूलने वाले डरपोक लोग हैं जो अपनी दो रोटियाँ बचाने की जुगत में किसी मुद्दे पर टिके रहने से डरते हैं फिर जितना डरते हैं उतना डराया जाता है । डराने की प्रक्रिया और इसके तौर तरीके स्थान, काल ,वातावरण और व्यक्ति  के अनुसार होते हैं । हमारा समाज डरने वाले  और डराने वाले के दो स्पष्ट विभाजनों में लिपटा है और निश्चित तौर पर यह विभाजन आर्थिक-राजनीतिक-आपराधिक शक्ति और इसकी हीनता से जुड़ता है । आज जो प्रदर्शन कर रहे हैं वे कौन लोग हैं -घर से खाये हुए ही न ! पर ये बस खाये हुए हैं इनकी इससे कोई बड़ी शक्ति हो ऐसा नही है । शक्तिशाली को पता है कि ये बहुत से बहुत एक जगह जमा होकर प्रदर्शन कर सकते हैं, और वह भी कुछ ही समय के लिए । बस नज़र रखने और चुप्पी साधने से काम चल जाता है सरकारी तंत्र का । दुर्भाग्य से इनमें से कोई तंत्र में जा नही पाता और जो जाता है वो काजल की कोठरी से ही आता है !
बलात्कार एक सामाजिक बुराई है तो इससे निपटने के लिए समाज में ही जाना होगा । ज़ाहिर है यह न सरकार कर सकती है , न पुलिस और न ही न्याय व्यवस्था । इस घटना पर जितनी तीव्र और तीखी प्रतिक्रिया हो रही है उसका एक चौथाई भी यदि इस विषय पर सूचिन्तित ढंग से काम करे तो बात बन सकती है ।

आज जो भी बातें हो रही हैं उससे लगता है कि सुराज आ गया है लोग सचेत हो गए हैं , पुरुष आज से बल्कि अभी से स्त्रियॉं को बराबरी की दृष्टि से देखेंगे  जिसने भी इसको तोड़ने की कोशिश की उसे राष्ट्र -राज्य से कड़ी से कड़ी सजा मिलनी तय है , सोशल मीडिया पर जो कवितायें लिखी जा रही हैं उससे पीड़ितों में उत्साह का संचार होगा और वे हिम्मत से उठ खड़ी होंगी । पर क्या ये इतना सरल है ? सबसे पहले तो उसके घर से निकलने को ही लीजिये । माँ - बाप क्या ताना देने का एक भी मौका छोड़ेंगे जब वो कहीं भी अकेले चली जाएगी ? जहां जाएगी वहाँ कितने संवेदनशील लोग हैं जो उसकी परिस्थिति को समझेंगे ? उसे कौन नौकरी देगा ? किससे उसकी शादी होगी ?

ये सब बताता है कि यह समय इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाने का या प्रदर्शन कर आक्रोश और ऊर्जा को खत्म करने का नही है बल्कि किसी और बात पर विचार करने से पहले समाज में स्त्री - पुरुष की बराबरी लाने या कम से कम उसे एक जीव समझने के लिए जरूरी काम करने का है । यह घटना केंद्र में हो पर यह केवल आम आंदोलन या प्रदर्शन का आधार बन कर न रह जाए ।
यह सब इतना सरल नहीं है क्योंकि लंबे समय से पुरुष वाद में समजीकृत मन भले ही वह स्त्री का ही क्यों न हो बाहर आने से डरता है । ऐसे में बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है ।  बलात्कार की घटना से पहले की जो बहुत सी घटनायें होती हैं उन्हें नज़रअंदाज़ करने से बचना होगा । हमारे यहाँ कहावत है ' लत्ती चोर , पत्ती चोर तब सीनियर चोर ' । आए दिन मेट्रो, बस, महाविद्यालय ,विद्यालय , सड़क , मैदान आदि जगहों में हम कितनी जगह स्त्रीयो को देते  हैं ? बाहर जाने दीजिये घर की संरचना में ही क्या हम ऐसा कर पाते हैं ? ऐसा करने वालों में लगभग हम सभी आते हैं और इन्हीं 'हम ' मैं बहुत सारे इन प्रदर्शनों में भी हैं , टिप्पणीकारों में भी हैं  । हमने स्त्री की अस्मिता को जिस तरह से समझा और आत्मसात किया है वही त्रुटिपूर्ण है । वह बताता है कि जो है पुरुष है, स्त्री कुछ  है ही नहीं । यही गैर बराबरी उन पर अधिकार करने के लिए प्रेरित करती है बल्कि हिम्मत देती है ।
एक आंदोलन में चले जाने भर से काम बनने वाला होता तो अब तक बहुत से हो चुके और बहुत से और होते रहेंगे । जरूरी अपने आस पास स्त्रियॉं को स्पेस देना है ,उनके अस्तित्व को स्वीकार करना  है । वरना इंडिया गेट या मुनीरका में प्रदर्शन कर के लौटते हुए मेट्रो के' महिला बोगी ' के पास हम खड़े होते रहेंगे और रात को उन सब को याद कर अपने- अपने लिंग सहलाते रहेंगे ! 

दिसंबर 15, 2012

नाटक देखते देखते ...

ये हाल ही में अलग अलग समय पर देखे गए नाटकों कुछ कुछ लिखा गया है । इसमें कोई परस्पर संबद्धता हो ऐसा न मैं दावा करता हूँ और न ही ऐसा है । ये शायद नाटकों को मैं जितना समझ पाता हूँ उतना ही बताता है ।


1... शायर शटर डाउन ..........  त्रिपुरारी शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक । आरंभ में लगा कि क्या देख रहा हूँ, क्या कहा जा रहा है .... और एक बार को ये भी लगा के टीकम जोशी बांध नही पा रहे हैं दर्शकों को । फिर चीजें जुड़ती गयी एक से एक ... ये दरअसल अकेलेपन, लोगों के बीच बढ़ती दूरियाँ , बढ़ते अपरिचय का नाटक था । इसीलिए एक पात्रीय भी था । और ज़ाहिर है इस अकेले पन को दिखाने के लिए शहर ही केंद्र में होता और था भी । शहर क्या इतनी ही अकेली जगह होती है ? माना कि शहर में अपरिचय है और दूरियाँ हैं पर क्या ये दूरियाँ इस वजह से नहीं हैं के हम अपनी चीजें जहां से छोड़ के आए उस जगह को भूल नही पाये ? इसी शहर में यदि कोई मुझे नही पहचानता है तो मैं ही कितनों को जानता हूँ ? मैंने ही कितनों की ओर हाथ बढ़ाए हैं ? शहर में जो लोग वर्षों से रह रहें हैं वो तो कभी इस तरह की शिकायत नही करते क्योंकि उनका जो है यहीं है । इसलिए अकेलेपन के लिए शहर को जिम्मेदार बनाना उचित नही प्रतीत होता । और जो व्यक्ति का अकेला पन है उसे तो कहीं भी महसूस किया जा सकता है चाहे वह कितना ही प्यारा गाँव क्यों न हो ।   आजकल के बड़े निर्देशकों में एक चलन देखता हूँ -वे एक पात्रीय नाटक कर रहे हैं और कलाकार ला रहे हैं नामचीन ... आज थे टीकम जोशी । टीकम टीवी के प्रसिद्ध नाम हैं । प्रसिद्ध कलाकार अपने नाम पर बहुत भीड़ खींचते हैं वरना भूमिका के साथ तो निर्वाह कोई भी माँझा हुआ कलाकार कर देगा ।
नाटक देखते देखते कई बातें याद आ रही थी.... ;आलेख कमलेश्वर की कहानी 'खोयी हुई दिशाएँ ' से मेल खाता हुआ सा , टीकम के अभिनय में मिस्टर बीन की छाप , और अकेलेपन का मजा लेने वाले हिस्सों में अंग्रेज़ लेखक 'जी के चेस्टर्टन' के लेखों का मज़ा । पर इन सब को मंच पर निभा जाना अपने आप में प्रशंसनीय है । टीकम जोशी ने मंच पर जो प्रतिभा दिखाई वो उनके उन सब हिस्सों से अलग थी जो अबतक टीवी पर देखी या फिर हालिया प्रदर्शित तुगलक से बिलकुल अलग ....
वैसे एक बात जो कहनी जरूरी है वो यह कि ये नाटक बीते हुए समय का लग रहा है... भले ही इसमें हमारे समय से संवाद करने के लिए कुछ दृश्यों को डाला गया है पर इस नाटक का अकेलापन और अपरिचय काफी पुराना लगता है । लगता है हम बिलकुल पूर्व उदरवादी चरण के शहरीकरण में चले गए हैं जहां नए प्रकार की बसावट है , लोग एक स्थान छोड़ के दूसरी जगह आए हैं और यह नयी नयी व्यवस्था अभी पचि नही है । तब से एक या दो नयी पीढ़ी जरूर आ गयी हैं फिर भी अकेलेपन को समझने के हमारे औज़ार वही पुराने ही हैं ।  अब  ये अकेलापन कई गुना बढ़ गया है और अकेलेपन की कोई एक ही वजह नही रही  , अब तो यह  बीमारियों की कोटी में  आ गईं है ... अब तो हम पार्क में बैठकर आखबार पढ़ने से भी बढ़ चुके हैं .... वह अकेलापन दूसरा था और आज का दूसरा है । पहले काम के साथ तालमेल न बैठा पाना था अब अब काम से फुर्सत नहीं है अकेलेपन तक पर विचार करने को ।
इसके बावजूद नाटक में गज़ब की कसावट थी एक मजबूत आलेख और दमदार अभिनय जो नाटक के लिए जरूरी होता है  ...

2 अंत में पुरानी रंगभाषा ही काम आई ! लगभग एक सप्ताह में अनुराधा कपूर की दूसरी प्रस्तुति थी ।  उनके निर्देशकपने से ऊब जाने से बचाने के लिए अभिनय किया सीमा विश्वास ने !
सीमा के अभिनय शैली के विस्तार ने पहले कुछ ही मिनटों में जो बाँधा कि भई मैं तो निकल नहीं पाया !
गिरीश कर्नाड के टैगोर के नाट्यलेखन पर लिखने के बाद उनकी कथा 'जीवितो मृतो' पर जैसे सोच लिया गया था कि उनके नाट्य लेखन को महान साबित करना है । इस लिहाज से टैगोर चुने गए शायद ! नाट्य रूपांतरण गीतांजली श्री का था । टैगोर की एक संपूर्ण समझ से किया गया रूपांतरण लगा । और सीमा ने अपने हिसाब से जो इम्प्रोवाइज उससे नाटक किसी काल विशेष का नहीं बल्कि काल से ऊपर उठकर वर्तमान के लिए भी बन कर आ गया । फिर लगा कि  कोई मरता है तो क्या सब छुट जाता है ।
हालाँकि कितना भी उम्दा कलाकार हो सुना है निर्देशक को फिर भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है तो इस सुनी हुई बात पर अनुराधा ने बहुत मजबूत काम किया जिसमें वाकई कोई नई रंगभाषा घने की जिद न थी ।यहाँ नयी रंग भाषा का जिक्र इसलिए कि हाल ही में अनुराधा कपूर ने रानवि के छात्रों के साथ एक चलता फिरता नाटक तैयार किया जो लगभग आम जन जीवन की तरह जीवंत लगे ऐसी  सोच के साथ बना हो पर वह वैसा नही था । उसे नयी रंग भाषा कह कर प्रचारित भी किया गया था ।  'सीमा विश्वास' ने साबित किया कि नाटक केवल कथ्य और मंच सज्जा और निर्देशकों के तौर तरीके ही नही हैं  बल्कि उससे अलग वह एक कलाकार केन्द्रित विधा भी है जिसमें अंततः कलाकार को ही दर्शक से संवाद बिठाना है ।  सीमा का रेंज गजब है बॉस । जब जो चाहा दर्शक को महसूस कराया ! कभी कभी वहाँ भी और बाद में भी लगा कि उनको कोई निर्देशक क्या निर्देशित करेगा ! भाव समझा दो और कर लो एक सशक्त नाटक तैयार ।
टैगोर की कथा नहीं पढ़ी पर अब लगता है वह सामने ही तो घटी थी

3.हालाँकि ये एक खुश होने वाली बात है कि हिंदी का एक कवि रंगमंच के क्षेत्र में हस्तक्षेप की कोशिश कर रहा है लेकिन इसे हस्तक्षेप कहना उचित नहीं होगा !
अभी अभी निकला हूँ व्योमेश शुक्ल के रूपवाणी समूह की 'कामायनी' पर प्रस्तुति देख कर । कविता एक अलग विधा है और निर्देशन दूसरी विधा और ऐसा कहना कोई बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन नहीं है । व्योमेश अच्छे कवि हो सकते हैं परन्तु उनकी आज की नाट्य प्रस्तुति संतुष्ट करने वाली नहीं थी ! एक तरह से मैं इसे नाटक के दायरे में उनका प्रवेश ही मानता हूँ इस लिहाज से बहुत कसी हुई प्रस्तुति की अपेक्षा नहीं थी लेकिन ये कॉलेज स्तर के वर्कशॉप के उपरांत का अभियान लगा !
कामायनी का पाठ एक गंभीर पाठ है और उसकी मासूम और चंचल प्रस्तुति पाठ की गहनता से कभी तालमेल नहीं बिठा पायी । कविता का मंचन कठिन नृत्य अभ्यास और विस्तृत निर्देशकीय क्षमता की माँग करता है ताकि कथ्य को सम्यक रूप से पहुँचाया जा सके ! यदि ऐसा न हो रहा हो तो विभिन्न नाट्य सामग्री का सहारा लिया जा सके ! पर ये न देख पाया !
लड़कियों ने यथासंभव बेहतर देने की कोशिश की पर स्वयं व्योमेश ही कमजोर कड़ी साबित हो रहे थे । कुछ और नहीं तो पंक्तियाँ किसी अच्छे रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रिकॉर्ड करा लेते ! आखिर पैसे की कौन सी कमी है ।
इन अकादमियों के लिए कार्यक्रम करने वाले समूह की चयन प्रक्रिया क्या है इसे सार्वजनिक करने की आवश्यकता है ।

दिसंबर 02, 2012

कहने को बहनें बहुत खुश हैं

बहनों को अपने घर की संरचना में देखने का आदि मन उस से बाहर उन्हें  देखकर पहली बार पहचानने से इंकार कर देता है । लगता है न ये वो नही है जो हमारे घर में बड़ी हुई थी । शायद वो उनका भी सुनहरा दौर रहा होगा । एक स्त्री हमारी माँ  भी है पर उन्हे देख के ये कभी नहीं लगा के ये हमारे घर आने से पहले एक अलग ही व्यक्तित्व रही होंगी । क्योंकि उनको जब से देखा है एक जैसा ही  देखा है । शायद उनके बारे में ये सोचता भी नहीं यदि बहनों को उनके ससुराल में नहीं देखता ।
पहले सारा घर उनका था , उनकी तरह से चलता हुआ । उनके मेहनत की छाप तह किए गए कपड़ों तक में दिखती थी । हर आने जाने वालों की प्रशंसा उनके लिए ही होती थी । उनसे जलन होती थी । उस समय वही बहन घर से बाहर जब कोचिंग जाती थी तो लड़के तरह तरह की भंगिमाएँ करते रहते थे और बाद में हम घरवालों में से किसी ने देख लीया तो डांट बहन के हिस्से में ही आती थी । आज लगता है कि उन्हें हमने उसी समय से दराज में रखना शुरू कर दिया था । तभी शायद चाचा जी गर्व से कहते फिरते हैं कि हमारे घर की बेटियों ने कभी 'ताक-झांक' नहीं की । इस लिहाज से उनके व्यकित्व का एक पक्ष तो विकसित ही नहीं हो सका । उनके प्रेम पर प्रतिबंध था पर क्या उनके मन पर भी बंधन रहा होगा ? मुझे बार बार उनका अमरूद खाता हुआ हँसता हुआ चेहरा ही नज़र आता है । वैसे यदि वो प्रेम करती तो वो  भी हमारे मुहल्ले में अपने नाम से जानी जाती । मैं जब ऐसा लिख रहा हूँ तो मुझे लगा रहा है कि मैं भी चाचा बन रहा हूँ उन्हीं की तरह बोल रहा हूँ । पर यदि वो प्रेम करती तो उनको आज मैं मजबूत कहता हालांकि उनको कमजोर करने की हर एक व्यवस्था घर ने और पड़ोस ने कर रखी थी । उन्होने भी इस स्थिति को स्वीकार कर लीआ था इसीलिए विरोध की बात नही उठी । उनका विरोध उनके मन की इच्छा किसी और रूप में बाहर आई होगी पर मुझे इसका इल्म नही और उस दौरान इतना शऊर भी नही था कि ये सब पहचान पाऊँ । और घरवाले तो जान बूझ के नही जानते ऐसी बातों को । इसके बावजूद घर में बहनों की धूम बनी रहती थी । उनकी हंसी भले ही धीमी थी पर घर के दायरे में खूब गूँजती थी । स्वच्छंद चिड़ियों  की चहचहाहट बनी रहती थी । उनकी शादियों के बाद क्रमशः ये सब कम होता गया । हमें लगता था कि ये सब बस हमारे घर से कम हुआ है । बहुत सी कहावतों में ये सुन राखा था कि बेटियाँ इस घर के बाद उस घर में खिलखिलाती रहती हैं तो लगा था कि ये सच होगा । 
  हाल में जब उनसे उनके ही घरों में मिलना हुआ तो लगा के वो जो इनकी स्वच्छंदता थी शायद तभी खत्म हो गयी थी जब हमारे घर में इनकी चहचहाहट बंद हुई थी । इनकी हर गतिविधि पर किसी न किसी नज़र रहती है कम से कम सास तो कुंडली मार के बैठी ही रहती है । दिन भर किसी न किसी का हुकुम बजाओ जरा सी देर के लिए पलक मारा नही कि बच्चा रोने लगा । दिन भर में बहन तो कहीं थी ही नही । जिन दराजों में हमने उन्हें तब बंद करना शुरू किया था वो अब उनका घर बन गया था । इन दराज़ों के दायरे उनके मन को कितना छीजते होंगे । आज लगता है कि इन दायरों से बाहर निकलने का कोई भी मौका देने से पहले सास ससुर क्यों हज़ार बार सोचते हैं । 
अब तक स्त्री पर चिंतन को समझने का आधार किताबी किस्म का ही रहा था घर के वातावरण ने भी कोई बहुत मदद नहीं की पर बहनों को देख के लगा कि जो सब सिद्धान्त है वह  व्यवहार से कितना दूर है । और जो भी सिद्धान्त बना है उसके अनुप्रयोगों को खोजना  हो तो लगता है किसी और ग्रह पर जाना पड़ेगा ... खैर बहनें हमारे यहाँ भी अपने मन का नहीं करती थी पर उस समय वो जो भी थी आज नही हैं ... मुझसे कम उम्र में ही उनके चेहरे की झुर्रियां मायूस करती हैं । कहने को वो बहुत खुश हैं सुख से जी रही हैं .....

नवंबर 04, 2012

तुगलक की तुगलकी !

फिरोजशाह कोटला किले में नाटक तुगलक के इस प्रदर्शन को भानू भारती का कहें या गिरीश कर्नाड का ! भानू ने चूँकि इसे निर्देशित किया इसलिए तत्काल तो हम इसे उन्हीं से संबद्ध कर के देखते हैं । लेकिन यह नाटक किसी भी निर्देशक से ज्यादा कर्नाड का नाटक है । कारण है उनका तर्कपूर्ण कल्पनाशीलता से भरा लेखन ! मुहम्मद बिन तुगलक के संबंध में इतिहास सबके लिए उतना ही उपलब्ध है जितना गिरीश के लिए परंतु उन्होंने इसके बीच से जिस प्रकार कथा-सूत्र निकाले हैं वह इतिहास में नहीं है । इतिहास के कथानक को उससे बाहर जाकर भी ऐतिहासिक रूप से निर्मित कर जाना लेखक की सफलता की पहचान है ।
मुहम्मद बिन तुगलक के संबंध में जितनी कहानियाँ और अफवाहें प्रचलित है उनमें कोई तारतम्य नहीं है वे सब कुछ घटनाएँ हैं जो अलग- थलग बिखरी पड़ी हैं लेखक ने उनके बीच अपनी कल्पना से जो दृश्य निर्मित किए हैं वे कतई उस काल और घटनाओं से बाहर के नहीं लगते हैं । ऐसे कथानक पर काम करना किसी भी निर्देशक और कलाकार के लिए कठिन नहीं रह जाता !

 कोटला किले में इस नाटक का प्रदर्शन निर्देशक को इस बात की अतिरिक्त सुविधा देता है कि वह आसपास के वातावरण का अधिकतम उपयोग कर सके । लेकिन यह सुविधा दर्शकों के लिए कष्टकारी हो जाती है । उनके लिए बार बार अपना फोकस नए तरीके से बदलना एवं उनकी महत्वपूर्ण दृश्यों से बहुत ज्यादा दूरी नाटक का रस ग्रहण करने में व्यवधान की स्थिति निर्मित कर रहे थे । और कभी कभी तो दर्शक केवल संवाद पर निर्भर थे ।

 इस नाटक को कर्नाड ने मूल रूप से कन्नड में लिखा था जिसका हिंदुस्तानी में अनुवाद वी.वी.कारंत ने किया । कारंत के काम की जितनी भी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है क्योंकि संवादों से कभी लगा ही नहीं कि यह अनूदित नाटक है मूल नहीं ! जबकि इधर कुछ नाटक तो बहुत वाहियात रूप से देश की सबसे बड़ी नाट्य संस्था एनएसडी के देखे जिसके हिंदुस्तानी में अनूदित संवाद कभी दर्शकों को जोड़ ही नहीं पाए ! जब ऐसी स्थिति बनती है तो दृश्य पर दबाव बढ़ जाता है क्योंकि दर्शकों जो ग्रहण करना है वह संवाद की तरफ से तो कम ही हो जाता है । पर एक अच्छे अनुवाद ने ऐसी किसी भी स्थिति को उपस्थित ही नहीं होने दिया !
 दृश्य कलाओं में खासकर नाटकों में कलाकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है । अंततः उन्हीं के माध्यम से ही तो लेखक और निर्देशक दर्शकों से संवाद स्थापित करते हैं । 'तुगलक' के इस प्रदर्शन में कलाकारों ने जो अभिनय प्रस्तुत किया वह सहज रूप बेहतरीन नहीं कहा जा सकता । हालाँकि जिस तरह से रंगमंच और , सिने जगत के बहुत से लोग ले लिए गए थे उससे उच्च कोटि के अभिनय की उम्मीद थी । मुख्य भूमिका में आए यशपाल शर्मा और तीन-चार अन्य कलाकारों को छोड़ दिया जाए तो बहुत से कलाकार अपने बेहतर रूप में नहीं नजर आ रहे थे । अभिनय में लंबा अनुभव रखने के बाद भी उस दिन की प्रस्तुति में अपने अभिनय को पुराने स्तर तक नहीं ले जा पाने की कसक उन कलाकारों को भी होगी ! हिमानी शिवपुरी अपने फिल्मी स्वरूप से बाहर नहीं आ पाई फिल्म तौर तरीकों की आदत लगातार मंच पर बनी रही । वहीं यशपाल शर्मा ने अपने फिल्मी व्यक्तित्व को हत्या के एक-दो दृश्यों को छोड़कर कभी हावी होने नहीं दिया । वे तुगलक के रूप में बहुत जंच रहे थे और जिस सहजता से उन्होंने उस चरित्र को जिया वह प्रशंसनीय है ! आगे जब भी इस नाटक का प्रदर्शन होगा यशपाल शर्मा का नाम जरूर लिया जाएगा । उन्होंने निश्चय ही मुख्य भूमिका को मुख्य रूप से निभाया । इस नाटक में सहायक कलाकारों की एक टोली ही काम कर रही थी । वे जब भी मंच पर आते तभी लगता कि ये कलाकार किसी ऐतिहासिक नाटक नहीं बल्कि आधुनिक नाटक को अंजाम देने आए हों ।

 समकालीन संदर्भ में इस नाटक का प्रदर्शन राष्ट्र राज्य की बहुत सी विफलताओं से संबंध जोडता दिखाई देता है । जबतक हम मुहम्मद बिन तुगलक को सकारात्मक भाव से देखते हैं तबतक वह हमें हमारे समय से बाहर दिखाई देता है । जैसे ही उसे भाव निरपेक्ष कर देते हैं उसी क्षण वह हमारी राज्य-व्यवस्था की अजीबोगरीब नीतियों का प्रतीक नजर आने लगता है । मुहम्मद बिन तुगलक के लिए लाख तर्क विकसित कर उसकी स्थिति को जस्टिफाई करने की कोशिश करें लेकिन इतना स्वीकार करना ही होगा कि उसकी नीतियाँ उसके ही मन की उपज थी और उसके पीछे कोई सुचिंतित ठोस आधार नहीं था ! सारे मामले झोंक में लिए गए निर्णयों से लगते हैं । और ठीक यहीं पर यह नाटक समकालीन हो उठता है । वह नाटक का नायक तो लगता है पर जनता का नायक नहीं हो पाता ! यहाँ सरकारी नीतियों से मिलान की स्वतंत्रता लेते हुए यह कहना अनुचित नहीं जान पड़ता कि नीतियों को लागू करने से पहले देश के सभी पक्षों के गहन अध्ययन की आवश्यकता है अन्यथा राज्य की संपत्ति को हथियाने वाले हर शासन काल में रहे हैं फिर योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं !

नवंबर 01, 2012

दरबारी साहित्य की एक शाम ( व्यंग्य रिपोर्ताज )

उस दिन इस घुमन्तु ,बेकार को एक संगी बँहियाते हुए राजधानी के महल में ले गया ! क्या चिक्कन-चुनमुन महल था ! दीवारों में झकझक चेहरा झलक जाए ऐसी चिकनाई ! भीतर एक प्रकोष्ठ में दरबार लगना था और बाहर बरामदे में उससे पहले की औपचारिकता अंतिम दौर में थी । अंतिम दौर में इसलिए कि , दरबार में उपस्थित होने आए गणमान्यों की हल्की-क्षुधा-तृप्ति के लिए जो पकवान आदि लाए गए थे वे चुकने वाले थे । दूसरे जब इस चिर-अतृप्त ने जब बिना एक पल भी जाया किए एक थाली में जो जो मिला भर लिया और भकोसने के लिए स्थान ग्रहण किया तो उपस्थित सज्जनों (दुर्जन हों तो अपनी ओर से योगदान करें) व सज्जनानियों ने थाली की ओर अतृप्ति नहीं बल्कि घृणा की दृष्टि से देखा । अर्थात सबके उदर यथा खाली स्थान तृप्त हो चुके थे ।

 जब से राजे-रजवाडों का अत हुआ है तब से साहित्य का दरबार संपादक और प्रकाशकों के यहाँ स्थानांतरित हो गया है । ये साहित्य में नए राजा बने और आश्रय देने लगे । इसके साथ साथ पूरी प्रक्रिया का रूपांतरण नए संदर्भों में हुआ । मसलन अबके राजाओं का प्रशस्ति गान खुलकर नहीं कर सकते तो उनको झेलने का चलन आरंभ हो गया । हाँ ठकुरसुहाती का केवल नाम भर बदला यह अब प्रकाशक-सुहाती हो गया । यह एक ऐसे ही राजा का दरबार था जहाँ दस नए दरबारियों को शामिल किया जाना था । तिथि भी विजयादशमी चुनी गई थी-रावण के दस सिरों की भाँति ये भी देदीप्यमान, रंग-रोगन से चेहरे की खाईयां भरे हुए । दरबारी उनके चमचे , प्रेमी आदि पहले से ही प्रकोष्ठ में बैठे थे। मोबाइल के ध्वनि नियंत्रण की औपचारिक घोषणा के साथ सभा की शुरुआत हो गयी । सर्वप्रथम राजा का बोलना जरूरी है सो वे उठे कुछ टूं-फां की, अपने संबंध में यत्र-तत्र किए गए प्रशस्ति वाचन को अहंकार पूर्वक सुनाया । फिर पता नहीं क्यों 'राग गर्दभ' में एक अजीब-सा गीत रेंकने लगे ! सभा बगलें झांकने लगी थी ।

अब नए दरबारियों को शामिल करने का समय आ गया था । वे बारी-बारी बुलाए गए लाल-नीले पैकेट फाड़ के उनकी पुस्तकें वरिष्ठतम दरबारियों के हाथ में देकर फोटो ली गई और हर नए को दो शब्द कहने को बुलाया । नए माईक पकडते ही इतना अवश्य बोलते कि ,उन्हें बोलना नहीं आता पर बोलते जरूर -पहले विवाद, फिर भडास, फिर हर्ष अंत में धन्यवाद !
 जब इनकी नुमाईशें खतम हुईं तो शुरु हुआ पर वरिष्ठतमों का वाचन । प्रायोजित होकर बोलने का मजा ही अलग है मित्रो ! केवल अच्छा और कर्णप्रिय ही निकलता है । इस प्रायोजन का मूल्य क्या तय हुआ होगा यह न कभी उजागर हुआ है और न ही होगा । लेकिन जिन-जिन यह प्रायोजन मूल्य नहीं चुकाया उनका प्रोमोशन रह गया । उनके लिए दो-तीन बार यह वाक्य फेंक दिया गया-'हर कृति पर बात करना संभव भी नहीं है ' ।इधर उन 'लाँच होते 10 रॉकेट' पर कुछ फब्तियाँ भी उन मझोले साहित्यिकों द्वारा फेंकी गयी जिनका कैशोर्य पिता की कडाई में बीता था और यौवन पत्नी की जी हुजूरी में बीत रहा था इसलिए यहाँ मौके बेमौके अपनी भडास छाप रहे थे ।

 मध्यकालीन दरबारों में बीच-बीच में कविताएँ , दोहे या फिर साधु-साधु का स्वर उठता होगा पर यहाँ कैमरे , टैब आदि की चमक मिश्रित आवाज ही चलती रही । दरबार बदस्तूर जारी था वरिष्ठतमों की आपसी लल्लो-चप्पो से लबरेज ! बीच में कुछ चमक उभर जाती जब चिपकाए हुए मुस्कान के साथ एक स्त्री , बच्ची के समान इधर से उधर फुदक जाती ।( संचालक महोदय यूँ तो बहुत सा बोल गए लेकिन इस फुदकन पर कुछ नहीं बोले । अधिकारियों से कौन लगे भैया )

शाम रात में बदलने लगी । दरबार की औपचारिकता में जितना होना था हो चुका लोग ऊबने लगे थे ।
ऐसे आयोजनों के अध्यक्ष अपनी उर्जा बचा कर रखते हैं ताकि अंत में बोलते वक्त निंदियाते लोगों को झिंझोडकर अपने शब्द सुनाएं । किसी तरह से सब निपटा , सभा विसर्जित घोषित हो गयी पर अन्य आयोजनों की तरह लोग दरवाजों या जन सुविधाओं की ओर नहीं भागे !! आश्चर्य ! दो-दो, चार-चार के रूप में बताने लगे जैसे कि वहीं रहना हो । कुछ संवाद रोचक थे - ' यहाँ तो कितना आदर्श पेल गया पर उसके अखबार में कभी कोई हेडलाईन देखी जो पत्रकारिता के आदर्श का पासंग भी हो ?'
 ' आऽऽ... नाईस साड़ी ! कहाँ से ली ? दिल्ली हाट ! ओ ऽऽ !'
उधर मंच पर ही धूम्रदंडिकाएँ प्रज्वलित की जा चुकी थी । तभी बँहिया कर लाने वाले संगी भी आ गए - चलना नहीं है मित्र ?
मैं -हाँ ! पर ये सब ?
 संगी - ये सब तो अभी ऐसे ही रहेंगे । अस्सल कार्यक्रम तो अब होगा -पीने का कार्यक्रम ! वैसे ये राजा बड़ा कंजूस है बहुत कम को बुलाया है ! ...तुम न होते तो मैं भी मजा लेता .............!
बाहर हल्की ठंड थी ! संगी का बोलना जारी था -
 लास्ट टाईम जब अमुक जी का बर्थडे था तो उस महिला ने ...अरे वो जो पीछे नहीं बैठी थी उसी ने सारा इंतजाम किया ........मैं भी गया था ! बहुत कुछ होता है उसमें बे । असली समीक्षा तो वहाँ होती है !

अक्तूबर 31, 2012

स्थायी क्षति की ओर बढ़ती शिक्षा !

अभी हाल ही में दूरदर्शन के एक कार्यक्रम के दौरान 'मॉडर्न स्कूल' की प्रधानाचार्य बार-बार आरटीई वाले बच्चे , आरटीई वाले बच्चे कह रही थी । जाहिर है यह उनके यहाँ और उस तरह के अन्य विद्यालयों में हाल में बने शिक्षा गारंटी कानून के तहत पढ़ रहे चंद गरीब बच्चों के लिए सबसे सम्मानित नाम है । लेकिन यही नाम एक तरह से उनके लिए नई श्रेणी गढ़ रहा है जो उसी तरह से उन्हें उपहास का आधार बना रहा है जैसे कि गरीब बच्चे या कि अन्य नाम ! बड़े स्कूल की किसी भी एक कक्षा में इस कानून के अंतर्गत पढ़ने आ रहे बच्चों की संख्या उसमें पढ़ रहे खानदानी रूस बच्चों की तुलना में बहुत कम है जो उस धनी चकाचौंध भरी दुनिया में उनके लिए एक कष्टकारी स्थिति से कम नहीं होगा जहाँ वे अपना टिफिन खोलने तक की हिम्मत नहीं करते होंगे ! वो प्रिंसिपल आगे बोलती हैं कि कानून बनते ही हमने अपने शिक्षकों को यह निर्देश दिया और उनकी ट्रेनिंग शुरु कर दी क्योंकि 'आरटीई वाले बच्चों' को कक्षा के स्तर तक लाने के लिए बहुत काम करने की आवश्यकता है । ऐसे प्रधानाचार्य की बात समझ से परे है क्योंकि बड़े स्कूल में पढ़ रहा एक बच्चा , किसी झुग्गी बस्ती में रहकर सरकारी स्कूल जा रहे या स्कूल नहीं भी जा रहे बच्चे से बहुत ज्यादा अलग नहीं है । यदि हम किताबी ज्ञान को बच्चे की विशेषता मान कर उसके आधार पर बच्चे- बच्चे में विभेद कायम करते हैं तो निश्चय ही यह एक गंभीर स्थिति है । पुस्तकों में जो ज्ञान निहित हैं उन्हें पुस्तक पढ़ कर जान लेना कोई बहुत कठिन कार्य नहीं है । यहीं एक दूसरी बात भी आती है कि यह ज्ञान किस प्रकार हासिल किया जा सकता है ? यदि दोनों ही बच्चों के लिए समान स्थितियाँ होती तो शायद नतीजे के रूप में हमें कुछ और ही देखने को मिलता ! समान किताबें , पढ़ने के लिए समय , उचित रोशनी यदि झुग्गी झोपड़ी में जी रहे बच्चे को मिलते तो उसके विकास की भी बराबर संभावना बन सकती थी । ऐसी दशा में हम यदि गरीब पृष्ठभूमि से आ रहे बच्चों को कक्षा में पढ़ रहे धनी बच्चों की तुलना में रखेंगे तो जाहिर है वे कहीं नहीं ठहरेंगे ! उनके अपने अनुभव भी उन्हें कक्षा के अन्य विद्यार्थियों से अलग ठहराते हैं । एक तरह से यह दशा 'मिस-मैच' की है । हालाँकि अभी इस व्यवस्था को लागू हुए दो साल ही हुए हैं सो किसी निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी लेकिन इसके अबतक सामने आए लक्षण उत्साहवर्धक नहीं हैं । बड़े बड़े निजी विद्यालय अपने यहाँ काम कर रहे गार्ड, माली आदि के बच्चों को दिखाकर इस कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं । आगे जिन लोगों के बच्चे किसी कारणवश इन बड़े स्कूलों में दाखिला नहीं ले पाते वे जहाँ तहां से फर्जी बीपीएल कार्ड बनवा कर वास्तविक गरीब बच्चों का हक मार रहे हैं और इसमें कुछ स्कूल भी उनकी मदद कर रहे हैं । कानून बने दो साल हो गए हैं और लगभग इतना ही समय उसकी तोड़ ढूँढने वाले दिमाग ने खपाए हैं । इसमें भला जिन बच्चों का होना चाहिए था उनका नहीं हुआ । भला देश की शिक्षा का होना चाहिए था वह तो सिरे से खानापूर्तियों के चक्रव्यूह में फँस गया ! जरूरत देश के शिक्षा माफियाओं के चरित्र को समझ कर सभी शिक्षा संस्थाओं के राष्ट्रीकरण की है ताकि सबको समान शिक्षा मिल सके ! 12 वीं शिक्षा के क्षेत्र में जबतक विभेद और स्तरीकरण की स्थिति रहेगी तबतक उच्च शिक्षा में ज्यादा लोगों का आना संभव नहीं हो पाएगा और गुणवत्तापूर्ण शोध के क्षेत्र में हम निरंतर पिछड़ते ही रहेंगे । शिक्षा का अधिकार कानून का लक्ष्य केवल यह हो कि बहुत से छात्रों का नामांकन हो जाए बाद में वे क्या पढ़ते हैं, कहाँ जाते हैं उससे कोई सरोकार नहीं है । हम जिस चुनौती भरे समय का सामना कर रहे हैं , उसमें मात्रा के साथ साथ गुण भी होना जरूरी है ! क्योंकि केवल मात्रा पर ध्यान देना हमारी शिक्षा को चिरस्थायी क्षति पहुँचा सकता है ।

अक्तूबर 16, 2012

वो त्योहारी रोमांच बुलाता है ....

न मुझे दुर्गा पसंद और न ही मेरी अब पूजा में रुचि है पर दुर्गापूजा का यह समय बहुत लुभाता है । इसके पीछे वो पुराने रोमांचक अनुभव हैं जो बार -बार अपनी ओर खींचते हैं । लोग ये भले ही न माने कि बिहार में भी दुर्गापूजा का अपना मजा और सौंदर्य है जो कहीं से भी कम नही है पर यह बहुत भव्य रूप से वहाँ भी मनाया जाता है । हालांकि बिहार, बंगाल का ही हिस्सा था और बंगाल की पूजा को अंग्रेजों ने भी सराह दिया तो हम औपनिवेशिक गुलामों को कहीं और जा कर देखने और विचार करने की जरूरत ही नही रही । दुर्गा पूजा को मैं एक त्योहार नही कहता बल्कि मेरे लिए यह एक अवसर है और शायद एक समय जब हर तरफ एक अलग ही प्रकार की खुशबू रहती है । इस अवसर कि शुरुआत का धान के फूलों की महक से ही पता चल जाता है और मन अपने आप से त्योहारी हो जाता है । चूंकि हमारे उधर इस समय जहां देखिये वहाँ धान ही धान दिखता है सो उसकी महक ,उसका रंग आवश्यक रूप से इस समय के साथ जुड़ जाता है । यदि धान की फसल अच्छी नही प्रतीत होती तो ये त्योहारी चमक फीकी ही रहती है । और यदि सारा मामला दुरुस्त रहा तो क्या कहिए ! अगतीया भदई धान कट कर आ जाता है, जब बैलों से उनकी दौनी चल रही होती है उस समय बैलों के पैरों के नीचे दबने से धान एक अलग ही गंध छोडते हैं । फिर उस समय कहीं से गरम-गरम मूढ़ी-शक्कर मिल जाए तो मत पूछिए-मुंह में पानी आ गया ! खैर बात तो अभी हम दुर्गा पूजा पर कर रहे हैं । ये अवसर है और ऐसा अवसर तो साल भर बाद ही मिलता था । जिसमे लंबे समय तक इसकी आड़ ले के हम स्कूल के चक्कर से बच जाते थे , खाने के लिए भले ही मांस-मछली और प्याज-लहसुन वाली तरकारी नही मिलती थी पर मौज थी । वैसे भी मांस-मछली कौन सा महीने- डेढ़ महीने से पहले खाने को मिलती थी । बहरहाल , दुर्गा पूजा का मजा तो बहुत था । पता नही अभी भी वैसा मजा आता है या नही ।

 फूल चुनने का आनंद :

 फर्ज़ कीजिये एक ऐसी जगह का जहां कोई बाज़ार न हो जिसमें दिल्ली की तरह फूलों की कोई मंडी या दुकानें न हो । ऐसी जगहें उधर एक नही बल्कि सभी हैं । छोटी जोत वाले सीमांत किसान अपने दालान पर यदि एक बैगन का पौधा लगाते हैं तो मौसम आने पर दोनों साँझ के लिए सब्जी की व्यवस्था हो जाती है वहाँ फूलों वाले पौधे या पेड़ लगाने का तो प्रश्न ही नही उठता है । और पड़ोस के गाँव में जो दो घर माली थे उनसे चार कनेर के फूल और उसके चालीस पत्ते के लिए तीन-चार रूपय का गेंहु देना कहीं से भी अच्छा सौदा नही रहता था । दुर्गा पूजा में जो कभी पूजा का 'प' भी न करे वो कम से कम एक टुकड़ा फूल और एक लोटा पानी तो जरूर चढ़ाता है । सो सब के लिए फूल भी चाहिए और फूल कहाँ मिलते हैं । पर फूल मिलते हैं किसी मंदिर के पास , गाँव के समृद्ध लोगों के दालान पर एक तो वहाँ से फूल लाना टेढ़ी खीर रहती थी दूसरे ऐसा करने वाले आप अकेले नही होते थे । सो हर बार फूल हाथ लग ही जाएँ ऐसा नही था । पर हम इसके लिए एक से एक चालाकियाँ किया करते थे । कभी आधी रात ही निकल जाते थे और कभी कभी तो ऐसा भी किया कि अड़हूल (जिसे आप गुड़हल कहते हैं ) की कोढ़ि(कली) ही तोड़ लेते थे और वो सुबह में वो खिल जाते थे । फिर बहुत बाद में एक फूल आया था 'सिंगार हार' (हर शृंगार ) बहुत खिलता था मह-मह महकने वाला और खूब सारा खिलने वाला ! सिंगार हार के एक दो पेड़ हो जाएँ तो गाँव भर को फूल मिल जाए और फूल होते ही इतने छोटे हैं के कितना चढ़ाओगे बेटा -चढ़ाओ ! बाद में जब शहर में रहने आ गए और किराए के मकान में रहते थे तो वहाँ थोड़ी सी जगह थी जहां हम फूल लगाते थे । आगे जब पिताजी ने अपनी जमीन खरीद ली और उस शहर में अपना भी एक घर हो गया था फिर तो फूल लगाने की पूरी आज़ादी थी और हमने लगाया भी -अड़हूल, सिंगार हार , तीरा-मीरा और पछतीया खिलने वाला गेंदा । लेकिन इसके साथ ही शुरू हो गया अपने फूलों को जोगने का कार्य ताकि कोई और हमारे फूल चुरा न ले - आखिर कितनी ऊंची दीवार चिनवाएंगे आप लोग सब कूद सकते थे वो फूल चुराने का जुनून ही ऐसा होता है कि क्या कहें ! फिर हम अपने फूलों की रक्षा करते और उजाला होने पर बड़े अंदाज़ से तोड़ते थे । बहुत मज़ा था भई !

 तुमने कितनी डायनें देखि :

 दुर्गा पूजा आते ही डायन का डर और उसे देखने की बात चलने लगती थी । दुर्गा पूजा के दौरान माएं अपने बच्चों को शाम के बाद निकलने नही देती थी । पर माओं को भी पता होता था कि बच्चे तो इधर उधर निकल ही जाएंगे सो वे 'डिबिया' की फुनगी जो पूरी कालीख ही होती थी कान के पीछे लगा देती थी । मुझ महानुभाव को भी लगाया गया था भई ! बहरहाल , हमलोगों को बताया जाता था कि चौराहा पर डायनें निर्वस्त्र होकर नृत्य करती हैं । जो वहाँ चला जाता है उसकी जान भी ले लेतीं हैं वे । सुबह चौराहे पर उनके पूजने के सुबूत भी होते थे - सींदूर का निशान , फूल , अरवा चावल ,पूरियाँ । दिन भर हम उन पदार्थों से बच के निकलते थे । शुरू में तो हम मानते थे के वे सच में ऐसा करती थी पर जब हम भी किसी के घर के सामने ऐसा करने लगे थे । जब रात में किसी के दरवाजे के सामने ऐसा कर दिया तो दिन भर गालियाँ सुनने को मिलती थी और ये हम करने वाले ही जानते थे कि वो अनाम गालियां हमें ही दी जा रही हैं । पर हम तो उस समय बुद्ध हो जाते थे किसी की गाली स्वीकार नही की तो हमें नही लगी । इससे डायन जैसे मुद्दे के प्रति जो भय था वो जाता रहा । बाद में हमने कुछ स्त्रीयों को सचमुच ऐसा करते देखा था जिन्हें हम सब पहचानते भी थे लेकिन उनके जीवन इसका कोई नफा-नुकसान मुझे आज तक दिखाई नही दिया है । मुझे लगता है कि वो भी उसी विश्वास में डायन पूजती होंगी जिसमें ये कहा जाता है कि दुर्गापूजा की रातों को ये तमाम तरह के कार्य और पूजा पाठ करने से सिद्धि मिल जाती है । सच मानिए मैं बहुत दिनों तक उनकी सिद्धियों की प्रतीक्षा करता रहा पर आज तक उनको उसी गरीबी और जहालत में देखता हूँ जिसमें वो पहले थीं । हे सिद्धि देने वाली देवी या जो भी हो उन्हें सिद्धि दो ताकि वे अपने परिवार की माली हालत ठीक कर पाएँ , जिस महाजन से कर्जा लिया है उसके घर आग लगा सकें जिसमे उसका खाता जल जाए या वो ऐसा अगिनबान मारें कि उनकी बेटियों की इज्जत छूने वाला वहीं जल के स्वाहा हो जाए ....

शाकाहारी बलि :

 आज तक आपने जानवरों , मनुष्यों की बलि के बारे में सुना होगा क्या कभी सब्जियों की बलि सुनी है ! ये सही बात है साब । ये तो आप को पता ही होगा कि ये पूजा लगभग दस दिनों तक चलती है लगभग इसलिए कि कभी कभी तो आठ - नौ दिनों में ही इसे निबटा दिया जाता है । इसे दस दिनों का मानते हुए आगे बढ़ते हैं । इन दस दिनों में जो सातवाँ दिन होता है उस रात की गयी पूजा को निशा पूजा कहा जाता था । पता नही शायद कहीं लिखा हो के उस रात को जिसने भी अपने यहाँ दुर्गा की स्थापना की है उसे बलि देनी होती है । इस सूत्र से अमूमन हर घर में बलि पड़नी चाहिए । उस समय एक 'छागर' (बकरा ) की कीमत 4-5 सौ रूपय थी जो आज दो-ढाई हजार है फिर बलि कैसे दी जाए ? पर भैया सब का जुगाड़ है इस देश में । काले झींगा [1] (तोरई) को महिषासुर का प्रतीक मान कर उसकी बलि दी जाती थी । उसके लिए शाम से बड़े ज़ोर की तैयारी चलती थी । लोग मोटा-ताज़ा काला झींगा ढूंढ के लाते , कचिया (दराँती , अब तोरई को काटने के लिए कत्ता या तलवार तो चाहिए नही ) को पिजाया जाता था फिर धोकर उसे पवित्र मान लिया जाता था । फिर रात में जब निशा पूजा होती थी तो उससे झींगे को काटा जाता था । रात का पवित्र झींगा सुबह झाड़ू के साथ दो टुकड़ों में बंटा हुआ बाहर आता था फिर किसी राख़ की ढ़ेरी की शोभा बढ़ाता था । कभी कभी ये निशा पूजा , नशा पूजा भी हो जाती थी । इन सब के बाद आता था दशमी का दिन जब नहा धो के नीलकंठ को देखने के लिए लोग निकलते थे । हमें भी तैयार कर के भेज दिया जाता था । कहा जाता था कि नीलकंठ देखने से यात्रा बढ़िया होती है ... पर भैया मुझे बालक को तो कहीं जाना भी नही होता था ।उसी दिन शाम के समय मामाजी के साथ हम मेला जाते थे । बरसम के मेले की अब बस धुंधली यादें हैं - सीता मौसी गोदी में उठा कर ले जा रहीं है । आज सीता मौसी से मिले कितने ही साल हो गए ! कितनी ही यादें ताज़ा हो गयी इस दुर्गा पूजा के बहाने आज तो । इसके नितांत रोमांचक अनुभवों और मौज को आज भी जीने का मन करता है .... ।

[1] हमारे यहाँ तोरई को झींगा कहा जाता है । इसकी दो किस्में होती है एक काली जो आम तौर आप भी खाते हैं पर इन्हें हमारे यहाँ नही खाया जाता । दूसरी हल्के हरे रंग की किस्म होती है जिसकी बेल हर किसी के घर -आँगन में मिल जाती है ।

अक्तूबर 14, 2012

बहुत से दुखों को समेटने का दुख

कुछ चीजें घर की ऐसी होती हैं जिनका हमे इल्म तो होता है कि वो घर में हैं पर कहाँ और किस हाल में हैं ये देखने की न हिम्मत होती है और न ऐसी जहमत हम लेना चाहते है । साहित्य में तो ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिनका जिक्र आ जाने पर भले ही हो जाता है पर उस से मुह फेर कर बैठना हमारी आदत में शुमार है । क्योंकि कभी कभी वह अरजनीतिक होता है और कभी कभी उसमें वो मसाला नही रहता कि उस के माध्यम से अपने को दूसरों पर थोपा जा सके या उनसे स्वयं को बीस साबित किया जा सके । हिन्दी साहित्य में शैलेश मटियानी और उनका साहित्य ऐसी ही वस्तुओं में से एक है । उनके नाम पर कोई गोष्ठी नही होते देखी और न ही कहीं किसी को उन्हें उद्धृत करते हुए सुना । विवाद उठाने के लिए भी नही (जबकि आज की हिन्दी आलोचना की विवाद प्रियता किसी से छिपी नही है ) । वो 2004 का वर्ष था जिसमें भारत सरकार की साहित्य केन्द्रित पत्रिका आजकल ने शैलेश मटियानी पर केन्द्रित एक अंक निकाला था । उस अंक की और कुछ विशेषता हो न हो पर वह अंक मटियानी के जीवन और साहित्य से पाठकों का परिचय करने के लिए काफी था । वो जिस तरह से माता-पिता के गुजर जाने के बाद के अपने जीवन से जूझ रहे थे और अपने भाई-बहन की ज़िम्मेदारी छोडकर मुंबई भागे थे वो उनकी आर्थिक हैसियत को बयां करने के लिए काफी है । उन्होने जो जीवन बिताया उसका एक ठीक ठाक हिस्सा भीख मांगने में , कसाई की दुकान पर कीमा कूटने में और भीख मँगवाने वाले गिरोहों के आस पास गुजरा था । ज़ाहिर है इनका असर उनके साहित्य पर पड़ता ही । शैलेश मटियानी का साहित्य उनके भोगे हुए यथार्थ से बिलकुल अलग नही है । वो जिन ज़िंदगियों में रहे वहाँ की हर स्याह - सफ़ेद सच्चाई बड़ी बारीकी से उनके यहाँ चित्रित हुई है । भीख मांगने और उसे मँगवाने के तमाम खटकरम उनकी बहुत सी कहानियों में आते हैं । ' दो दुखों का एक सुख ' उनकी ऐसी ही एक कहानी है जिसमें तीन भीख मांगने वाले लोग हैं - एक कोढ़ पीड़ित अधेड़ ,एक कानी युवती और एक नेत्र विहीन युवक । तीनों रेल्वे स्टेशन के पास भीख मांगते हैं । जब कानी गाती है तो नेत्रहीन युवक का मन हरा हो जाता है और कोढ़ी को उसका रूप प्रभावित करता है । कोढ़ी और युवक दोनों कानी को पाना चाहते हैं । और दोनों इसके लिए अपने अपने तिकड़म भिड़ाते हैं । कोढ़ी , नेत्रहीन युवक पर स्त्रीयों को छेड़ने का आरोप लगाता है वहीं युवक नगरपालिका द्वारा कोढ़ियों को हटाने के अभियान से खुश होता है । बाद में नेत्रहीन युवक और कानी में दोस्ती हो जाती पर उनके लिए रहने का कोई ठिकाना नही है और ठिकाना होता है कोढ़ी के पास । इनकी आवश्यकताएँ और उसका फाइदा ! इस बीच कानी गर्भवती हो जाती है और कहीं भीख मांगते हुए कोई नौटंकी कंपनी वाले उसे उठा ले जाते हैं । 10-15 दिनों बाद वे उसे छोड़ भी जाते हैं । ये दिन कोढ़ी और युवक के लिए किस कष्ट में गुजरे ये कहने की बात नही । बाद में कानी एक बच्चे को जन्म देती है । जन्म के दिन दोनों ये सोचते हैं कि बच्चा उनके जैसा कोढ़ी या नेत्रविहीन न हो । भीख मँगवाने का धंधा करने वालों का जिक्र उनकी कई कहानियों में आया है । एक कहानी में मटियानी जी जिक्र करते हैं कि किस प्रकार बच्चे चुराये जाते हैं , भीखमंगों के बच्चे ये धंधेबाज दो एक दिन की उम्र में ही छिन लेते हैं फिर उनके पैरों को बांध कर , दबा कर ऐसा कर दिया जाता है उनमें स्वाभाविक रू से विकृति आ जाती है ... उन्हे किसी और की गोद में डाल कर ज्यादा पैसा कमवाया जाता है । इन कहानियों को पढ़ के ऐसा लगता है के हम हाल में आई फिल्म स्लमडॉग ..... फिल्म का कोई दृश्य देख रहे हों पर ताज्जुब देखिये कि हमें उस फिल्म को देखते हुए कभी ये नही लगा होगा के ये तो मटियानी के साहित्य में भी है । इसके लिए पाठकों पर ज़िम्मेदारी नही डाली जा सकती क्योंकि यह तो आलोचकों के जिम्मे है । जिसने इस पूरे दौर में नवलेखन , नया - पुराना आदि के विवाद को हवा दी बस कुछ सार्थक नही ढूंढा या फिर जो है उसे पाठकों के संज्ञान तक लाने का प्रयत्न नही किया । पाठक दो-चार नयों और कुछ 'स्टार ' लेखकों को तो पढ़ पाये हैं क्योंकि उनके संबंध में खूब लिखा पढ़ा गया है । लेकिन शैलेश मटियानी जैसे लेखक आज भी अपने पाठकों से बहुत दूर हैं । आज अङ्ग्रेज़ी से नकल की गयी कहानी पर बहुत बड़ा विमर्श चल सकता है पर मटियानी जैसे साहित्यकर पर नही । आगे उनकी एक कहानी 'मैमुद' याद आती है । जद्दन जिसने अपने बकरे को बड़े प्यार से पाला है उसका नाम भी रखा है- मैमुद । बक़रईद पर परिवार वाले उसे काट देते हैं । बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाए इस मुहावरे के आस पास बुनी गयी एक मार्मिक कहानी है यह । शैलेश मटियानी जैसे लेखक यदि याद नही किए जाएंगे और उनका जिक्र साहित्य की तथाकथित मुख्यधारा में नही होगा तो साहित्य के जिम्मे से बहुत सारी चीजें , हजारों संदर्भ आदि छुट जाएंगे । साहित्य केवल नए और आज के संदर्भों तक सीमित नही है बल्कि पीछे रह गए लोगों की हिस्सेदारी भी है । आगे देखते हैं क्या सब हो पता है ।

अक्तूबर 02, 2012

बिहार के अनुबंधित शिक्षकों के समर्थन में ...

किसी भी समाज में शिक्षकों का आंदोलन करना और उनका जेल जाना समाज की गतिकी को प्रभावित ही नही करता है बल्कि उस पर दूरगामी प्रभाव डालता है । वे अपना आंदोलन उस समय में से समय निकाल कर करते हैं जिसमें उन्हें कक्षा में होना चाहिए । कक्षा का समय समाज के सबसे मत्वपूर्ण हिस्से बच्चों के लिए मुकर्रर है जो उन्हें न केवल शिक्षित करता है बल्कि आगे के जीवन की तैयारी में भी भूमिका निभाता है । हालांकि इन कुछ वाक्यों में आदर्श की उपस्थिती है पर जरा उस स्थिति की कल्पना करते हैं जहां एक गैर बराबरी का समाज है और सामाजिक गतिशीलता में अपनी दशा को ठीक करने के लिए सरकार के द्वारा दी जा रही शिक्षा ही एक मात्र ऐसा कारक है जो व्यक्ति की मदद कर सकता है उस समाज में यदि शिक्षक ही कक्षा से अनुपस्थित होकर आंदोलन कर रहे हों तो वहाँ यह विचार का मुद्दा बन जाता है । बिहार का समाज ऐसा ही समाज है और वहाँ चल रहा अनुबंधित शिक्षकों का उग्र होता आंदोलन इसी बात की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है । इस पर गौर करें तो हम पते हैं कि इन शिक्षकों के आंदोलन की भूमिका इनकी नियुक्ति में ही निहित है । एक तो अनुबंध अर्थात ठेका आधारित नौकरी है जहां नौकरी में आवश्यक स्थायित्व का अभाव है जो किसी के भी आत्मविश्वास को लगातार प्रभावित करने के काफी है । यह साधारण मनोविज्ञान है कि यदि आप अस्थायी प्रकार की सेवा में हैं तो सेवा के प्रति आपकी असुरक्षा लगातार बनी रहती है और अंततः यह आपकी कार्यक्षमता को प्रभावित करता है । शिक्षक के मामले में यह केवल उसी तक सीमित नही होता बल्कि आगे बढ़ कर विद्यार्थियों पर भी असर डालता है । इसका लब्बोलुआब यह कि सेवा में इस प्रकार की असुरक्षा से समाज की एक पीढ़ी प्रभावित होती है । अनुबंधित शिक्षकों पर हुए बहुत से शोध में इस बात को रेखांकित भी किया गया है । 'प्रोब रिपोर्ट' का भी मानना है कि अस्थायी प्रकार की सेवा के कारण अनुबंधित शिक्षक अपने काम के प्रति बहुत अन्यमन्स्क हो जाते हैं और इस व्यवस्था में पूरी निष्ठा से काम करने वाले शिक्षक विरले ही मिलते हैं । आगे वेतन का मुद्दा है जो इस असुरक्षित प्रकार की नौकरी में 'कोढ़ में खाज' जैसी दशा का निर्माण करता है । अनुबंधित शिक्षकों को 6000-8000 तक प्रति महीने वेतन मिलता है जो वेतनमान पर नियुक्त शिक्षकों की तुलना में चार गुना कम है । इतने कम पैसे में गुजारा चलाने के लिए बहुत बड़े कौशल की आवश्यकता है । इस संबंध में इस लेखक ने एक शोध किया था और उस दौरान बिहार के सहरसा जिले के कई शिक्षक - शिक्षिकाओं का साक्षात्कार किया था । उसी साक्षात्कार के कुछ अंशों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है । 1 शिक्षिका कल्याणी कहती हैं '' इतने वेतन में कैसे संतुष्ट होंगे ? मंहगाई के चलते कैसे संतुष्ट होंगे .....एतना मंहगाई में हमलोग को ई साते हज़ार (7000) वेतन मिलता है .... अभी सात हज़ार हुआ है पहले तो पाँचे था । ... तो सात में सोच लीजिये कि एतना मंहगाई में हमलोग कैसे संतुष्ट होंगे । किसी तरह काम चलता है ।'' इस सेवा में विकास की संभावना पर कल्याणी कहती हैं ''इसमें क्या विकास होगा ! इसी में समय कट जाए यही बहुत है । '' 2 शीला कुमारी कहती हैं '' वेतन कुछ संतुष्टि नही है ... जरूरी आवश्यकता की भी पूर्ति नही कर पति हूँ... इसको हमलोग ठेका पर काम करना समझते हैं ...जिसमें सरकार हमको सात हज़ार में खरीद ली है ....'' '' इसमें कोई विकास नही है '' 3 महबूबा खातून कहती हैं '' एक तो वेतन बहुत कम है दूसरे हमारा वेतन का आधे से ज्यादा तो आने जाने में ही खर्च हो जाता है । सहरसा से यहाँ तक आने में रोज़ का 50-60 रुपया लगा जाता है । अब सोच लीजिये कि हमारे लिए क्या बचता कि खाएं और मौज करें ... '' 4 निरंजन जो सहरसा जिला शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी हैं वे कहते हैं '' इतने कम वेतन के कारण कोई इस संघ में पद धरण करने के तैयार ही नही होता है क्योंकि यदि पद लिया तो दस लोग आपसे मिलने आएंगे चाय -पान , फोन , पटना जाने आने आदि में सात - आठ हज़ार कब उड़ जाते हैं पता ही नही चलता ... मैं तो अध्यक्ष बन कर पछता रहा हूँ ...'' इस से एक अंदाज़ा आ जाता है कि शिक्षक-शोक्षिकाओं में इस सेवा में मिल रहे वेतन को लेकर कितनी संतुष्टि है और इसमें विकास की वो कितनी संभावना देखते हैं । आगे इसी वेतन से जुड़ा एका और पहलू है विद्यालय में शिक्षकों बीच गैर-बराबरी का । नियमित वेतनमान पर काम करने वाले शिक्षक और अनुबंधित प्रकार के शिक्षक में विद्यालय परिसर से लेकर निजी जीवन दोनों में एक स्पष्ट विभाजन है । निम्न आर्थिक हैसियत के कारण उन्हे कई बार ताने सुनने पड़ते हैं और बार बार उन्हे यह जताया जाता है कि वे नियोजित शिक्षक हैं और दूसरे नियमित वेतनमन वाले । ( इस तरह की अनेक स्थिति इस लेखक ने स्वयं अपने शोध के दौरान देखी और इस सामान्य मानव व्यवहार का अनुमान करना कोई कठिन भी नही है । )इस तरह की स्थिति नियोजित शिक्षकों में हीनता को बढाती है । अनुबंधित शिक्षक -शिक्षिकाओं की नियुक्ति शहर तथा गावों के स्थानीय निकायों के द्वारा हुई है जो उन्हें इन निकायो के प्रति जिम्मेदार बनाती है । इसका असर यह होता है कि साधारण सा जन प्रतिनिधि भी इनकी जांच कर सकता है और इसके साथ साथ आम आदमी भी । हालांकि यह एक अच्छा प्रयास है लेकिन इसका खामियाजा अंततः शिक्षकों कोण ही उठाना पड़ता है । उनकी जांच करने वालों की संख्या बहुत हो जाती है और यह उनके कार्यों में अनावश्यक दखल को बहुत ज्यादा बढ़ा देती है जो पुनः उनकी कार्यक्षमता को ही प्रभावित करती है । आगे उनका वेतन मुखिया या इस तरह के अन्य जन प्रतिनिधियों की अनुशंसा के अधीन है जो उन्हे मुखिया के इर्द - गिर्द घूमने के लिए बाध्य कर देता है । बहुत बार उन्हे उन जन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत कार्य भी करने पड़ते हैं मसलन घर के काम आदि । यदि वह प्रतिनिधि जीवन बीमा का अभिकर्ता है तो शिक्षक को उसकी पॉलिसी भी लेनी पड़ती है अन्यथा बिहार सरकार की इस व्यवस्था में अनुबंधित शिक्षक के वेतन को लटका दिया जाएगा । इन सब को ध्यान में रखकर अब बिहार में उग्र होते जा रहे अनुबंधित शिक्षक-शिक्षिकाओं के आंदोलन को देखें । हाल में वेतन को लेकर लंबा इंतजार चल रहा है , उनका पदस्थपन एसी जगहों पर है जो उनकी रिहाइश से काफी दूर है , ट्रांसफर करने के लिए बिचौलियों की एक पूरी फौज है जो पैसे मांगती है और अंत में नियमित वेतनमान में जाने की उत्कट इच्छा । ये सब मिल कर अभी के उनके आंदोलन की एक आधारभूमि तैयार करते हैं । उस पर मुख्यमंत्री की अधिकार यात्रा जो उनके लिए एक वरदान का ही काम कर रही है क्योंकि वो जिले जिले में घूम रहे मुख्यमंत्री से सीधे तौर पर विरोध जाता सकते हैं जो कि उनके राजधानी में रहने पर इस तरह संभव नही था । और अब यह संक्रामक तरीके से विस्तार भी ले रहा है । मुख्यमंत्री इसमे विपक्षी की साजिश देख रहे हैं और अपनी हत्या के षड्यंत्र से भी इसे जोड़ रहे हैं जो बड़ा ही बचकाना और हास्यास्पद प्रकार का स्पष्टीकरण प्रतीत हो रहा है । यहाँ हम शिक्षा के स्तर को तो रहने ही दें उसके स्थान पर मुख्यमंत्री केवल शिक्षकों के असंतोष के कारणों को देखें तो उनहे लग जाएगा कि यह उन अनुबंधित शिक्षकों की सहज अभिव्यक्ति है जो अपेक्षित ध्यान न दिए जाने से अराजक स्थिति को भी प्रपट कर सकती है । क्योकि इस समूह में युवाओं की संख्या ज्यादा है जो इस आंदोलन को ठीकठाक गति दे रहे हैं । ऊपर से यदि विपक्ष इसे मदद देता है तो यह नितीश कुमार के लिए खतरे की घंटी है । इस आंदोलन में भाग लेने वाले शिक्षक बधाई के पात्र हैं जो इसे प्रकाश में ले आए । बस इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि यह किसी भी दल या गठबंधन के हाथ में न खेलने लगे क्योंकि इससे इसका राजनीतिक इस्तेमाल हो जाएगा और उनके अपने मुद्दे धरे रह जाएंगे ।

सितंबर 29, 2012

अखबार का विभाजन

हालांकि इसकी शुरुआत काफी पहले से ही हो चुकी है पर आज कल इसका चलन काफी ज़ोर पकड़ रहा है । अखबार अपने परिशिष्ट में महानगरीय जीवनशैली को ही प्रमुख रूप से स्थान देने में लगे हुए हैं । यह एक ऐसी स्थिति है जब हम किसी भी महानगर को एक समांगी संरचना के रूप में ही देखने के आदि होने लगते हैं । इस दशा में उसमें बने हुए स्तर या तो दिखते नही या हम उन्हें देखना नही चाहते । अभी एक हिन्दी अखबार में 'लाइफ स्टाईल' को समर्पित परिशिष्ट को देख रहा था । उसमे छापे हुए सारे लेख दिल्ली की एक अलग ही छवि गढ़ रहे हैं जो उनसे पक्के तौर पर अलग हैं जो झुग्गी बस्तियों वाली दिल्ली की छवि है । कुछ लोग होंगे जो रात में मजे करने के लिए निकलते होंगे या ऐसा भी हो सकता है की इनकी संख्या ज्यादा भी हो पर ये कभी भी उन लोगों से ज्यादा नही हो सकते जो पुरानी सीमापुरी , सुंदर नगरी या जहांगीर पूरी की सड़कों पर खड़े सरकारी संडास से उठती दुर्गंध के बीच खुले में अपनी रात बिताते हैं । जहां गर्मी की रातें बहुत छोटी हो जाती हैं क्योंकि बिजली के अभाव में उन नीची छत वाले कमरों में सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है । ऐसी दिल्ली में नाइट लाइफ एक ही नही हो सकती न । बेशक बहुत से लोग इंडिया गेट पर या किसी बड़े होटल के क्लब में अपनी रात बिताने की क्षमता रखते हैं पर एक अखबार के लिए उनका जरूरी होना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है । ऐसे अखबार जिनका प्रसार कुछ और राज्यों में भी है उनकी स्थिति बहुत हास्यास्पद हो जाती है । इसकी बानगी हाल ही में पटना में देखने को मिली । एक तो ये तथाकथित राष्ट्रीय अखबार दिल्ली में जो चीजें आज छपते हैं वही चीजें अगले दिन या उसके भी अगले दिन दूसरे राज्यों में छापते हैं । खैर , वाकया ये हुआ कि परिशिष्ट में जो लेख दिल्ली से पढ़ के गया था वही अगले दिन उसी लेखक के नाम से पटना में भी पढ़ने को मिला लेकिन कुछ चीजों में बदलाव के साथ जैसे दिल्ली का 'मिरण्डा हाउस कॉलेज' बन गया था पटना का विमैंस कॉलेज और इंडिया गेट बन गया था पटना का गांधी मैदान । बहरहाल कहना ये है कि अखबारों के माध्यम हम जो पढ़ते हैं वह क्या बहुसंख्यक के लिए है ? शायद नही । अपने देश में अखबार आज भी इंटरनेट से ज्यादा पढे जाते हैं और इसकी सबड़े बड़ी वजह है इसका सस्ता और सबके लिए आसानी से उपलब्ध होने वाला भी । इसमें ज़्यादातर लोग महानगरों और नगरों से बाहर भी रहते हैं । आजकल अखबार को देखने पर लगता है कि उसका स्पष्ट विभाजन हो रखा है । समाचारों का हिस्सा बहुसंख्यक के लिए हो तो हो पर परिशिष्ट तो उसके लिए बिलकुल नही लगता है । ज़्यादातर परिशिष्ट , सोसाइटी ,मौज मस्ती , ट्रेंड्स ,सैर सपाटा , पेज 3,वीकेंड प्लानर जैसे शीर्षकों के साथ आते हैं जो शायद ही आम आदमी के लिए कोई मतलब रखते हों । यह महानगरीय माध्यम वर्ग का जीवन भले ही हो पर उसी महानगर मे रह रहे बहुत से लोग उससे बिलकुल अलग जीवन जीते हैं । वहाँ खाने का ठीक - ठिकाना ही नही है मोटापा कहाँ से । शास्त्री पार्क की वो स्त्रियाँ फैशन और पेज़ 3 के ट्रेंड्स जान कर क्या करेंगी जो 2 रूपय के मुनाफे के लिए दिन दिन भर बैठ कर मोबाइल चार्जर और नकली गहने बनाती हैं । ये अलग बात है कि हम जिस समय में जी रहे हैं उसमें सहज तरीके से कह दिया जाता है कि आज अखबार आंदोलन के नही चलते और अखबार निकालना समाज सेवा नही है । इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि ये एक उद्योग है लेकिन ये क्या जरूरी है कि 70 फीसदी लोगों पर कुछ लोगों की रुचियों को थोपा जाए ! और यदि ऐसा हो रहा है तो उस 70 फीसदी लोगों को भी मौका दिया जाना चाहिए और उनकी रुचियों को भी स्थान मिले । लोकतान्त्रिक संरचना में पत्रकारिता यदि इस प्रकार का विभाजन कायम रखती है तो उससे नुकसान पत्रकारिता का ही है क्यूंकी आम आदमी का कम होता प्रतिनिधित्व उसे अखबारों से दूर ही करेगा ।

सितंबर 03, 2012

केबीसी अब ह्क़ भी दिलाता है .....

दिन भर में बहुत कुछ मिल जाता है जो सोचने को विवश कर दे । तमाम जगहें हैं जहां पर बड़े बड़े विज्ञापन हमारा ध्यान ही नही खींचते बल्कि ये दावा भी करते हैं वे हमारा ज्ञान बढ़ाते हैं । और कभी कभी ऐसा करते भी हैं । आज कल हमारे' सम्मानित बुजुर्ग 'अमिताभ बच्चन अपने कार्यक्रम कौन बनेगा करोडपति को लेकर हर जगह छाए हैं । मेट्रो से निकलते हुए देखा किस प्रकार वे अपने काम की विशेषता बता रहे थे - अखबार के पन्ने जैसे होर्डिंग मे एक स्वस्थ सा चेहरा लेकर । उनके चेहरे के पास बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था - ज्ञान ही सबको अपना हक़ दिलाता है । इस पंक्ति को पढ़कर सहजता से कहा जा सकता है कि वे और उनकी पूरी टीम ज्ञान कि अपनी व्याख्या ही नही कर रहे बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त असमानता का सरलतम समाधान दे रहे हैं । फौरी तौर पर यह लगता है कि कितनी महत्वपूर्ण बात कही गयी है परंतु इसे गहराई से देखे तो यह हमारी ज्ञान के प्रति मानसिकता और सामाजिक समस्याओं के प्रति वैचारिक अस्पष्टता को भी प्रदर्शित करता है । ज्ञान को किस तरह से समझा जाए यह विमर्श का विषय हो सकता है और आज भी यह विमर्श केवल शिक्षाशास्त्रीय ही नही बल्कि दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय स्तरों पर चल रहा है । उन विमर्शों से यदि एक सर्वमान्य बात उठाई जाए तो वह ये हो सकती है कि सूचना ज्ञान का एक हिस्सा है तथा सूचना और ज्ञान में अंतर है । सूचनाओं को ही ज्ञान मान लेने कि प्रवृत्ति ने एक शैक्षिक संकट का सा वातावरण खड़ा कर दिया है । यह क्रमिक रूप से भारत जैसे समाज में जहां आज भी बहुत से लोगो को शिक्षा ग्रहण करने का अवसर नही मिल पाता है ,सूचनाओं के जानकारों को विशिष्ट होने का दर्जा देता है । यही विशिष्टता तथाकथित ज्ञान आधारित वर्चस्व को स्थापित करती है और एक बड़ी आबादी को हाशिये पर ला कर खड़ा कर देता है । इस प्रवृत्ति को बढ्ते हुए हम इस प्रकार देख सकते हैं कि देश भर मे किताबी ज्ञान को ही महत्व दिया जाता है। आम दैनिक जीवन में किताबी ज्ञान ज़्यादातर काम नही देते या इसे यों कहें कि दिन प्रतिदिन के ज्ञान में से ही किताबी ज्ञान के लिए अवसर बनता है । किताबी ज्ञान पर निर्भरता न सिर्फ सामान्य ज्ञान के लिए अवसर सीमित करता है बल्कि ज्ञान कि एक पंगु परिभाषा बनाती है । इसी को आगे बच्चों पर उनके माँ बाप द्वारा दिए जा रहे दबाव के रूप में द्देखा जा सकता है । एक समय अमेरिका में सरकार द्वारा अश्वेतों की शिक्षा पर किए जा रहे खर्चों पर रोक लगाने के लिए श्वेतों ने अलग अलग तरह के तर्क दिए थे । कुछ मनोविज्ञानियों ने तो तरह तरह के टेस्ट भी ईज़ाद कर के दिए जिससे ये साबित किया गया की अश्वेत शिक्षा के लायक ही नही हैं । एक दिलचस्प शोध तो यह था कि एक खास समयान्तराल में अमेरिकियों द्वारा खेल एवं शिक्षा , विज्ञान आदि क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धियों कि तुलना । खेल में ज़्यादातर सफलता अश्वेतों को और अन्य में श्वेतों को मिली थी । इस आधार पर कहा गया कि अश्वेत पढ़ाई लिखाई के काबिल ही नही हैं और उन पर पैसा खर्च करना बेकार है । यह किताब आधारित ज्ञान के वर्चस्व कि ऐतिहासिक बानगी है । और भारत उसी दिशा में बढ़ता जा रहा है । कौन बनेगा करोडपति जैसे कार्यक्रम किताब आधारित ज्ञान ही नही बल्कि उससे आगे बढ़कर सूचना को ही ज्ञान मान रहे हैं । और यह सूचना केवल उनके पास ही है या वो ही इस पर अधिकार रख सकते हैं जिनके पास उसे ग्रहण करने के अवसर हैं । जो यह अवसर नही रखते वो इस नए प्रकार के ज्ञान कि पूरी प्रक्रिया से ही बाहर हैं । यह ठीक उसी प्रकार कि स्थिति है जैसी कि अवशयक संसाधनों के अभाव में देश के लाखों लोग शिक्षा से वंचित हैं । इस प्रकार के वंचित लोगों कि संख्या निरंतर बढ़ ही रही है । इस दशा में ऐसे कार्यक्रम नए प्रकार के संकट का निर्माण कर रहे हैं जहां विभिन्न प्रकार के ज्ञान जो लोक में और स्थानीय स्तरों पर उपलब्ध हैं विलुप्ति के कगार पर हैं । यह प्रक्रिया अलग अलग प्रकार के श्रमों के प्रति हमारी स्वीकार्यता को भी कम कर रही है । भारत जैसे देश में जहां असमानता का कोई एक स्वरूप नही है वहाँ पर हक़ को प्राप्त करना बहुत सरल नही है । इस अवस्था में ज्ञान से हक़ प्राप्त कराने का दावा करना दूर कि कौड़ी जैसी लगती है । यदि इसे प्राप्त करने के लिए प्रयास किया भी जाए तो उससे पहले इन असमानताओं को समझने कि जरूरत है । कौन बनेगा करोडपति हक़ दिलाने का जो तरीका बता रहा है वह समाज में व्याप्त भेद को स्वीकार करते हुए उसी में जीते रहने के पुराने तौर तरीकों का ही प्रातिनिधित्व करता है । अमिताभ बच्चन और उनका समूह मुहावरे तो नए गढ़ रहे हैं पर उनके आधार वही सामंतवादी हैं जिसमें यथास्थिति को ही स्वीकार करने की प्रवृत्ति है ।

जुलाई 26, 2012

बरस जाओ कहद से पहले

उस दिन अखबार मे एक खबर देख कर हैरान हो गया |लिखा था कि ग्रामीणों ने गाँव को जोड़ने वाली कच्ची सड़क को खोद कर उसे खेत की शक्ल दे दी और उसमे कीचड़ बना कर धान की रोपाई कर दी | खबर अनोखी थी पर अपने आप मे कुछ कह रही थी |उसमे आगे लिखा था कि ऐसा इसलिए किया गया है क्योकि बारिश नही हो रही और धान के बीचड़ बेकार हो रहे हैं एवं इस संबंध मे सरकार भी कुछ नही कर रही है | यह कार्य सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने के लिए किया गया है | सरकारी तंत्र तक अपनी बात पहुँचाने यह बड़ा ही कारगर विकल्प था क्योंकि सड़क प्र्यत्यक्ष रूप से जनजीवन को प्रभावित करती है |दिल्ली मे रहने के बाद अपने शहर वापस जाना और वहाँ के आसपास के गावों के बारे मे ऐसी खबरें पढ़कर अनोखी ही लगती हैं इसके साथ ही कौतूहल भी होता है कि ऐन घटनास्थल पर क्या हुआ होगा उस स्थान पर लोगो की भीड़ लग गयी होगी एक तरह का तमाशा बन गया होगा | जैसा कि हमारी फिल्मों ने हमे सिखाया है की अपना देश किस तरह तमाशा प्रधान है जहां छोटी सी बात पर भी बड़ा तमाशा जाम जाता है |इसी आशा के साथ कि वहाँ तो बड़ी भीड़ होगी घटना वाले गाँव क ओर चल पड़ा | हाय रे मेरी निराशा ! वहाँ तो कोई नही था |उस स्थान से सौ कदम आगे बढ्ने पर ही गाँव शुरू होता था सो ग्रामीण अपने अपने घरों मे होंगे | उनसे बात करने पर पता चला कि ये कोई अनोखी बात नही है |इधर तो 2000 ईस्वी के बाद से हर साल बारिश कम ही हो रही है बीच मे एक बार कोशी की भयानक बाढ़ आई थी उस साल तो सबकुछ पानी से ही तबाह हो गया था। हर साल धान की रोपणी के समय अब ऐसा ही रहता है बारिश कम होती है जिसके पास साधन है वह बोरिंग से अपने खेत की पटाई कर धान रोपते हैं । जो गरीब हैं वो दिन रात भगवान से गुहार लगाते हैं कि पानी बरसा दो । फिर भी बारिश नही आती तो कभी कभी सड़क काट कर उस पर रोपणी कर देते हैं ताकि सरकार का ध्यान इस ओर जाए वह खेत मे पानी देने की कोई व्यवस्था करे | पर सरकार ने आज तक तो ऐसा नही किया | पिछले साल जब बलहा वालों ने सड़क काटकर धान की रोपाई की थी तो कुछ लोगों को पुलिस पकड़ कर ले गयी । अब मुझे समझ मे आ रहा था कि वहाँ कोई क्यो नही है । लौटते वक़्त देखा तो लगा की यहाँ पुलिस क्या करने आएगी ये धान कौन सा यहाँ फल फूल जाएंगे । निसंठ जमीन को हल्का सा खोद कर तो इन्हे लगा दिया गया था और यहाँ कौन सी बारिश हो रही है जो ये जीवित रह जाएंगे । फिर बलहा वालों को पुलिस क्यों ले गयी ? होगा कुछ और पुलिस के हजार तिकड़म !दोनों ओर खेत थे पर उनपर हल्की बारिश से उग आए घास की झीनी सी चादरें | दूर एक खेत मे बोरिंग से पानी पटाया जा रहा था साथ ही साथ ट्रेक्टर से जुटाई भी चल रही थी आसपास लोग खड़े थे और ढेर सारे बगुले उड़ उड़ कर आ रहे थे कि पानी भरने से जो कीड़े बाहर आएंगे उन्हें खा सकें । ये बगुले तो कीड़े खा लेंगे पर यहाँ के लोग क्या करेंगे जब बारिश ही नही होगी ! मुझे याद है जिस साल बारिश नही होती थी या कम कम होती थी उस साल मेरे गाँव मे लोग उदास उदास रहते थे | कृष्ण जन्माष्टमी के मेले में कोई उत्साह नही होता था ! और जब कृष्ण की मूर्ति को मेले की समाप्ती के बाद विसर्जित किया जाता था तो उस के गले में धान के बीचड़ की गाँठें बांध दी जाती थी कि संदेश पहुँच जाए की इस साल यहा बारिश नही हो रही अब कुछ करो | बहुत प्रतीकात्मक लगता है ये सब । पर एक ऐसा देश जहां कृषि के योग्य भूमि का बहुत कम हिस्सा सिंचित हो वहाँ तो बारिश ही एक मात्र आधार है । और जब वही न हो तो आँख से आग निकलेगी ही । पानी आकाश से गिरता है और उस पर किसी का अख़्तियार नही है ये सब इसे सहज ही ईश्वरीय बना देता है और साधनहीन निराश लोग सहज रूप से दैवी प्रतीको का सहारा लेने लगते हैं। अब लोगों को लगता है की सरकारें भी उनकी जरूरतों को पूरा कर रही हैं तो वे सरकार के उपकरणो जैसे सड़क आदि का प्रयोग कर अपनी बात पहुँचाने की कोशिश करने लगे हैं | पता नही इस कोशिश का अंजाम क्या हो | हो सकता है बलहा वालों की तरह ये भी पुलिस द्वारा उठा लिए जाएँ ।

जून 30, 2012

शादियों के मौसम में उत्तर बिहार में होना एक ऐसा अनुभव है जो हर बार याद दिलाता है कि समय कितना रुका हुआ है और कुछ भी बदला नहीं है । शादी की तिथियां हिंदू पंचांग से ली जाती हैं और उन तिथियों को अनेक सादियां होती हैं ! अभी छत पर हूँ और चारों तरफ से आवाजें आ रही हैं लाउडस्पीकर पर तरह तरह के गानों की ! कहीं बाराती पहुँच गए हैं सो विधि-विधान के गीत गाए जा रहे हैं , कहीं 'बिच्छु मेरे नैना' और कहीं से ' आज मेरे यार की शादी है' सुनाई दे रहा है । एक बात मुझे समझ नहीं आती कि बैंड वाले शादी में ' ये देश है वीर जवानों का' की धुन क्यों बजाते हैं , उसका शादी से क्या संबंध ? आज यदि शादी का दिन नहीं होता तो अबतक ये शहर नींद में चला गया होता ! ऐसा लगता है ये आवाजें पूरे शहर को जगा रखा है । गीतों से ही पता चल पाता है कि शादी हो रही है ! चाँद डूब रहा है और विधि - विधान के गीतों की संख्या बढ़ रही है । इसका एक पैटर्न समझ में आ रहा है- पहले देवी-देवताओं के समर्पित गीत , फिर चंद रीति-रिवाजों के गीत जैसे अठोंङर, लाबा, सिंदूरदान आदि के गीत फिर कुछ हँसी मजाक के गीत और बीच बीच में ' फिलर्स ' के रूप में कुछ अलग गीत । अभी थोड़ी देर पहले ऐसा ही एक गीत गाया जा रहा था जिसका मजमून था कि मिथिला में बेटी के रूप में जन्म नहीं लेना चाहिए और जन्म ले लिया और बड़ी हो गई तो किसी के कुएँ में कूद के जान दे दे । गीत में इसका कारण भी बताया गया है ! लड़की देखती है कि उसकी शादी के खातिर उसके पिता लड़के वालों के यहाँ जा जा कर मिन्नतें करते हैं और लड़के वाले शादी के बदले दहेज के लिए बड़ा सा मुँह फाड़ते हैं जिसके नहीं स्वीकार किए जाने पर वे लोग लड़की के पिता को दुत्कार कर भगा देते हैं और ऐसा ही लगभग हर लड़के का बाप करता है । गीत के अंत में वह पूछती है कि ईस दशा में डूब मरना सही है कि नहीं ! एक जगह शायद बारात में आए लोग खा रहे हैं तभी उन्हें अलग गीत सुनाया जा रहा है जिन्हें 'डहकन' कहते हैं । ये हँसी ठिठोली और ढिठाई भरे गीत होते हैं । एक स्त्री गा रही है कि दूल्हे को अब अपने बाप को बाप नहीं कहना चाहिए क्योंकि उसे तो पैसों से खरीद कर लाया गया है । वह चाहे तो लड़की पक्ष के किसी को भी अपना बाप मान सकता है । फिर वो गीत में ही कुछ नाम सुझाती हैं और उनके गुण भी बताती है । एक अन्य शादी में मैं गया था वहाँ डहकन तो नहीं पर फिलर्स के रूप में एक गीत में कहा जा रहा था कि लड़के , तुम्हारी माँ ने जो तुम्हें अपना दूध पिलाया उसकी भी कीमत वसूली लड़की के पिता से कर ली । 'कूटे नै जाने अठोंङर हे हरजैइया के पूत ' विधि के इस गीत में दूल्हे के अनाडी पन को उसकी माँ के हरजाई होने से जोड़ कर देखा गया है । अभी शादियों के इस मौसम की शुरुआत के समय मेरे एक मित्र ने एक अखबार में खबर में लिखा था कि उत्तर बिहार में सबसे महँगा दूल्हा बिकता है । दहेज अन्य जगहों पर भी दिए-लिए जाते हैं पर इतनी मात्रा में अन्यत्र ऐसा नहीं होता । इससे पीड़ित होना इतना सहज है कि गानों में , आम बोलचाल में इसे सहज ही देखा जा सकता है । यह इतने गहरे रूप में जमा है कि यदि किसी ने अपने बेटे की शादी 'आदर्श ' में करने की बात कही तो माना जाता है कि लड़के में कोई न कोई खोट होगी या कोई अंदरूनी कमी । अकेले दहेज ही नहीं बल्कि भारी संख्या में बाराती भी आते हैं जो अन्य स्थानों की तुलना तरह दुल्हन लेकर विदा नहीं हो जाते बल्कि कम से कम एक दिन तो जरूर रुकते हैं । और बाराती सामंतो की याद दिलाते हैं जिनकी सेवा में हल्की सी भी त्रुटि हुई तो वे आसमान -धरती एक कर देते हैं ! चचेरी बहन की शादी में मछली नहीं खिलाए जाने के कारण बाराती नाराज हो गए थे और अनाप-शनाप बकरे लगे थे । और ये हालत तब है जब इधर स्त्री -पुरुष लिंगानुपात भी सामान्य है अर्थात लगभग हर किसी को अपनी बेटी की शादी करनी है । जब इन गानों में कोई लड़की कुएँ में कूद कर जान देने की बात नहीं करेगी , कोई बाप दुत्कारा न जाए तब शायद कुछ बदले !

जून 14, 2012

मनाली , मौसम और बिकता शहर !

रात आधी बीत चुकी है ! होटल के इस कमरे में दोस्तों के नाक बजने की घिसघिस है और बाहर है जगे हुए कुछ अंतिम लोगों की आवाज ! नींद नहीं आ रही ! शायद कुछ है जो छूटा सा लग रहा है ! दरवाजा खोल कर बाहर जाने पर भी कुछ अलग नहीं महसूस हो रहा । शहर मनाली को अभी इसी रूप में देख रहा हूँ । चमकती रोशनी में पहाड़ी बनावट के घर और हर घर पर एक नाम- फलाँ होटल । सारे घर होटल बन कर जाग रहे हैं और लगातार रंग -रोगन से पुते चेहरे पर फीकी व्यावसायिक हँसी टांग कर । मौसम बिक रहा है और इसने अपने साथ साथ यहाँ सबकुछ बिकाऊ बना दिया है । पहाड़ है पर पहाड़ी चेहरे नहीं और जो हैं वे खूबसूरत और गुदाज खरगोश या भेंड का बच्चा पकड़े हुए - फोटो खिंचा लो 'लेम' के साथ ! मैदानी चेहरे अपने यहाँ की भीषण गर्मी से राहत पाने आए हैं ! उथली, तेज बहाव वाली ब्यास नदी का ठंडा पानी सबकुछ भुला देने के लिए काफी है । पर दूसरे तरह से देखा जाए तो यह बिक चुका सौंदर्य है और औपनिवेशिक सौंदर्यबोध ! अभी थोड़ी देर पहले तक 'माल रोड' पर बस सैलानी ही सैलानी थे । इस-उस नामवाले होटलों के कमरों से निकल कर आए ये लोग ही इस शहर के वाशी लगते हैं । आज ये हैं कल कोई और उस सड़क पर चल रही भीड़ का हिस्सा होगा । पर इन घरों को पता है कि भीड़ तो जरूर रहेगी या तो सुंदरता के नाम पर या नहीं तो बर्फ के नाम पर । जब से आया हूँ तब से देख रहा हूँ जर्रे जर्रे को पता है कि उसका मोल क्या है और नहीं पता है तो उसका मोल कैसे बनाया जा सकता है । अखरोट की लकड़ी के यादगार मिल रहे हैं , चाभी का छल्ला मिल रहा है जबकि सब जानते हैं ये सब ऐसे ही पड़े रह जाते हैं । और जब कूडेदान में डालने की बारी आती है तो कोई भी लकड़ी हो कोई फर्क नहीं पड़ता । यहाँ या तो होटल हैं या दुकानें । एक मुख्य क्रिया जो लगातार चलती रहती है वह है -बिक्री ! बेशक लोग खरीद रहे हैं पर उससे ज्यादा बेचा जा रहा है । आज हम आसपास के दर्शनीय स्थानों पर पैदल ही घूम आए पर इतने के लिए ही कल शाम जब एक टैक्सी-ड्राइवर से बात की थी तो उसने तीन हजार का खर्चा बताया था । शहर से जरा से बाहर के होटल वाले अपने आगे या पीछे को हिस्से में सेब के पेड़ लगा रखे हैं उसके नीचे खाने की मेज और कुर्सियां ! सेब के पेड़ के नीचे खाने का मजा खाने की बिक्री के लिए विस्तृत अवसर का निर्माण करता है । हिमाचल प्रदेश के फल अन्य राज्यों में बिकते हैं पर यहाँ वे छोटे - छोटे पियो-फेंको कप में मिल रहे हैं और कीमत किसी भी स्थान से ज्यादा । इस शहर में आज दिन भर भटक कर पता चल गया कि इसका अपना कोई स्वाद नहीं है । हो सकता है कभी इसका अपना स्वाद रहा हो पर अब तो वही दाल है और वही पनीर ! बनाने का तरीका भी वही । और उन्हें बेचना है तो नदी के किनारे हल्के पानी में कुर्सी डाल दी जाती है , उस कुर्सी पर बैठा इंसान क्षण भर के लिए ही सही लेकिन परंपरागत सामंत जरूर दिखता है । पतली पतली सड़कों पर जाम है और गाड़ियों से निकलता धुआँ ! सड़कें अन्य राज्यों में भी खराब हैं और इससे बहुत ज्यादा खराब हैं पर यहाँ सड़क की खराब हालत के लिए जगह जगह खेद व्यक्त किया गया है और जहाँ सड़क की मरम्मती हो रही है उसके तुरंत बाद सहयोग के लिए धन्यवाद दिया गया है । खेद और धन्यवाद बाजारू कृत्रिमता से ज्यादा कुछ नहीं है । जो भी दिख रहा है सब बिक रहा है मोल लगाओ और आँखों , झोले या कमरों में भर लो । भीड़ शाश्वत है लोग बदलते हुए । पहाड़ के आसपास है तो किताब की अबतक देखी एकमात्र दुकान पर योग और आध्यात्म ही बिक रहा है । मन कर रहा है मैं भी कहीं से जाकर रात भर नींद खरीद लाउं !

मई 25, 2012

शहर दिल्ली और मैं -1

दिल्ली के मंडी हाउस इलाके को दिल्ली से बिल्कुल अलग करके देखना पड़ता है । यह आम दिल्ली नहीं है ! आरंभ में जब मैं नया नया दिल्ली आया था तो नाटकों का क्रेज था पर यह नहीं जानता था कि यहाँ नाटक होते कहाँ पर हैं ! और दूसरे यह भी कि उस समय मैं दिल्ली से अपरिचित तो था ही साथ ही दिल्ली के विस्तार से डर भी लगता था ! बाद में मंडी हाउस का पता चला कि वहाँ ढेर सारे प्रेक्षागृह हैं जहाँ नाटक आयोजित होते हैं ! इसके साथ ही यह भी कि वहाँ हर आधे घंटे में एक फिल्म बनती है , लगती है और उतरते ही अभिनेता को रातोंरात सुपरहिट बना देती है । शायद मेरे लिए ही उन दिनों सुरेंद्र शर्मा के ग्रुप ने आ 'रंगभूमि' को नाटक के रूप में पेश किया और हमारी एक परिचित उसमें एक छोटा सा किरदार कर रही थी । नाटक देखा तो पाया कि ये तो हमारे शहर के नाटकों से बिल्कुल अलग है ! मंच सज्जा तो बेहतरीन थी ! सुविधाएँ रहने पर साधारण अभिनेता भी अलग ही नजर आने लगते हैं जो मैंने बाद में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के संदर्भ में भी महसूस की । हमारे यहाँ तो आज भी लड़की का किरदार निभाने के लिए लड़की नहीं मिलती । इसीलिए वहाँ एक तो ऐसे नाटक ही किए जाते हैं जिनमें स्त्रियों की भूमिका ही नहीं होती और यदि एक दो स्त्री चरित्र हैं तो उनकी भूमिका भी पुरुष ही निभाते हैं । बहरहाल जब मैं 'रंगभूमि' देखकर निकला तो मैं लगा मंडी हाउस के भूगोल को देखने ! तब वहाँ आज की तरह मेट्रो नहीं बनी थी फिर भी रोशनी और चमक - दमक का अंदाज वही था । मेरे लिए यह अनुभव बड़ा ही रोचक रहा क्योंकि उसके बाद तो उधर जाने की आदत पड़ गयी ! इस आदत को विकसित करने में रितेश का भी बराबर योगदान है । नाटकों के प्रति उसका जुनून गहरा है । उन दिनों हमारे पास दिल्ली विश्वविद्यालय का बस पास हुआ करता था सो कहीं भी कभी भी चलने में सोचने तक की आवश्यकता नहीं थी ! धीरे - धीरे मैं दिल्ली से परिचित होता गया फिर ये उतनी आक्रामक और विस्तृत नहीं रह गई ! फिर तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय , साहित्य अकादमी , त्रिवणी कला केंद्र , श्रीराम सेंटर , कमानी , एलटीजी , बंगाली मार्केट ये सब आम शब्दों जैसे लगने लगे ! इनके साथ जो महाकाव्यीय भाव थे वे सब जाते रहे ! इस इलाके में लगता था कि चाय की दुकान के आसपास मँडराने वाला कुत्ता भी अभिनेता ही है और जो उसकी चाल है वह कोई गंभीर अदा है ! मनुष्यों की तो बात जाने ही दीजिए ! श्रीराम सेंटर के पास एक चाय नाश्ते की दुकान है, उसके बाजू में एक गराज जिसके मालिक का हुक्का और उसके गुड़गुडाने का अंदाज लाजवाब ! हमारे जैसे दर्शकों के अलावा वहाँ जो भी हैं अभिनेता ही हैं । लगता है उन्हें ही देखकर शेक्सपीयर ने कहा था ' दुनिया एक रंगमंच है और हम उसके अभिनेता ' ! एक दोपहर में यूँ ही किसी इंतजार में वहीं श्रीराम सेंटर के चौराहे पर बैठा था वहाँ एक लड़की एक व्यक्ति से बातें कर रही थी । उसके हाथ में उसका पोर्टफोलियो था । व्यक्ति उसकी तस्वीरें देखता जा रहा था । वह एक फोटो पर जाकर रुख गया और कहने लगा कि ये तस्वीर तुम्हें फिल्मों में काम दिला सकती है। लड़की की आँखें चमक उठी उसने फिर से बताया कि वह कई नाटकों में अभिनय कर चुकी है । व्यक्ति ने कहा मुख्य भूमिका तो मिलना थोड़ा कठिन है पर बहन ,भाभी का किरदार तो पक्का मिल जाएगा । लड़की की आँखों की चमक थोड़ी कम हुई ! तभी वहाँ एक और व्यक्ति आया । वही रंगमंचीय पात्र एक बार को शक हो जाए कि यहाँ कोई नाटक तो नहीं चल रहा ! उसने पहले व्यक्ति को 'हाय' किया और बिना पूछे ही पोर्टफोलियो लेकर देखने लगा ! एक तस्वीर पर जाकर वह भी रुख गया । उसने कहा तुम्हारी ये तस्वीर तुम्हें लीड रोल दिला सकती है और वो मैं तुम्हें दिलाउँगा ! फिर वह उठ कर एक कोने में चला गया लड़की भी पीछे -पीछे ! बातें होने लगी ! 'सर मैंने कई नाटकों में रोल किया है ' । 'तुम मेरे घर पर क्यो नहीं आती ! वहीं बातें करते हैं । डरो मत मेरे पत्नी भी है तुम्हारी तो बहन ही हुई !' बड़ी चालाकी से वह लड़की साली बना ली गई थी ! थोड़ी देर बाद सब जाने लगे । जाते जाते लड़की ने अगले संडे उस व्यक्ति के घर आने का वादा भी दिया ! मेरा इंतजार जारी था !

मई 14, 2012

तेज रफ्तार जिंदगी रुकी थी उस दिन !

दिल्ली में ऐसा बहुत ही कम होता है जब आप किराएदार हों और आपका मकान मालिक घर की पुताई कराने के लिए बार बार जोर दे ! यहाँ किराए के लिए मकान मालिक को लगातार चिख-चिख करते देखा है । कुछ साल पहले जब अपने पास मोबाइल नहीं था तो नीचे आंटी के फोन पर ही फोन आता था । जब भी कोई कॉल आती आंटी इतने जोर से चिल्लाती थी कि तीन घर छोड़कर रहने वाले विकास तक को पता चल जाता था । किसी रात रेडियो बजता रह जाता तो धमकी आ जाती थी कि आगे से ऐसा कुछ पाया गया तो 50 रूपए प्रति महीने किराया बढ़ जाएगा ! हम दिल्ली में नए थे सो हर धमकी के बाद एक दो महीने तक रात के 10 बजे ही रेडियो बंद कर देते थे । ऐसे में मकान की पुताई किस चिड़िया का नाम है ! इधर दिल्ली में रहते हुए काफी दिन भी हो गए और किराए पर रहना एक आदत सी बन गयी और हम भी मकान मालिक और आसपास के लोगों के प्रति जिद्दी हो गए । पहले जहाँ हमें धीमे बोलने के लिए कहा जाता था वहीं अब इसका कोई लिहाज नहीं करते और देर रात तक रोशनी भी जला कर रखते हैँ । इन हालात में मकान मालिक का बार बार पुताई के लिए कहना दिल्ली में एक किराएदार होते हुए अलग ही एहसास देता था । कुछ पर्चे सर पर थे सो मन चाहता था कि यह टल जाए । पर एक मकान मालिक की भी सत्ता है वह कितना भी उदार हो आखिर चलती उसी की है । उस दिन सुबह सुबह आकर भैया ने फरमान जारी किया कि आज से पुताई का काम चालू हो जाएगा कल तुम्हारी बारी आएगी । तीन दिन बाद एक पर्चा और ये सदमा ! शाम में पुताई वाले ने खबर दी कि रात में सामान हटाकर एक कमरे में कर लेना दूसरे की पुताई होगी और फिर जल्दी से सामान को दूसरे में रख लेना ताकि पहले की पुताई हो सके ! परीक्षा और पुताई ! एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा उस पर सामानों को जल्दी - जल्दी इधर उधर करना एक नए मुहावरे की माँग करता है ! अलमारी से किताबें हटाना , टीवी को दूसरे कमरे में शिफ्ट करना कोई बड़ा काम नहीं था पर टाँड की सफाई बाप रे बाप ! सोचकर ही हालत खराब हो रही थी ! पर करना तो था ही ! आखिर में हम जुट गए । राजीव नीचे खड़ा था और मैं टाँड पर ! जो भी सामान नीचे उतरता पुराना ही उतरता ! ज्यादातर तो कबाड ही पड़े थे । ऐसे कपड़े जो पुराने पड़ गए थे या फिर ऐसे जिन्हें अब पहना नहीं जा सकता । बैग जिसे चूहे ने काट दिया था । अबतक खरीदे गए फोन के डब्बे । पुरानी सीडी । पचास के करीब पुरानी कलम । इन सामानों में एक पैटर्न था जो सामान जितना पुराना टाँड में वह उतना ही पीछे । चूहे का खाया हुआ बैग वही बैग था जिसे चाचा ने पहली बार दिल्ली आते समय दिया था । उसी बैग में दिल्ली आते समय सिलवायी पैंट भी मिली जो अब किसी तौर पर मुझे नहीं आ सकती क्योंकि अब कमर की गोलाई अपेक्षाकृत बढ़ गयी है । वो पैंट बहुत खूबसूरत थी और उसकी फिटिंग़ भी बहुत अच्छी थी । उस पर लगा डायमंड टेलर का टैग देखते ही मन सहरसा के कपड़ापट्टी की गलियों से होता हुआ उस घर की पहली मंजिल पर जा पहुँचा जहाँ कभी कमाल चाचा ने कमीज की नाप लेते हुए बाबूजी से कहा था कि ये लड़का बड़ा आदमी बनेगा , इसकी बाहीं की नाप देखिए ! उस दिन बाबूजी की आँखों में दुर्लभ प्यार देर तक दिखा था । फोन के डिब्बे तकनीक में बदलाव साफ दिखा रहे थे ! पहला डब्बा काफी गंदा हो चुका था पर उसे देखते ही वह खुशी एक बार पुनः आ गई जो उस दिन पहला फोन खरीदते हुए हुई थी । ठीक से मोबाइल फोन चलाना भी नहीं आया था कितने तो रुपए यूँ ही बर्बाद हो गए थे ! और उसी शाम बाबूजी की नसीहत भी आई थी कि मोबाइल लेने खर्चा न बढ़े इसका ध्यान रखना । बाद में उस महँगे मोबाइल का डब्बा भी दिखा जो कितनी ही बचत और दोस्तों से उधार लेकर खरीदा था ! उन दिनों जीवन सस्ता भी था ठीक - ठाक बचत हो जाती थी । याद है बड़ी जल्दी ही दोस्तों का उधार भी चुका दिया था । बाद में वह मोबाइल चोरी हो गया । उसके बाद से जिसके भी हाथ में वह मोबाइल दिखता लगता मेरा ही फोन है ! टाँड के एक कोने में राजीव द्वारा खाए गए बिस्कुट , ब्रेड और चॉकलेट के कवर भी मिले जो उसके बढ़े वजन के प्रमाण के रूप में थे । इस पर आंटी का कहना था कि जो भी खाओ भाई पर पिन्नी तो बाहर फेंक दो ! सफाई करते करते यादों की यात्रा भी चलती रही । जाहिर है समय तो लगना ही था ! आनेवाले पर्चे को तो प्रभावित होना ही था पर उन पुराने सामानों ने कुछ यादों को जोड़ने का मौका दे दिया था ! एकाध को छोड़कर उनमें से संभाल कर रखने जैसा कुछ नहीं था सबको फेंक दिया पर भागते जीवन के बीच के वो रुके हुए क्षण कमाल के थे !

अप्रैल 27, 2012

क्या फायदा ऐसे दिवस का ?

एक मई यानि मजदूर दिवस ! एक ऐसा दिन जिस दिन के बारे में वह कह सकता है कि यह दिन उसका भी है । पर क्या वाकई में ऐसा हो पाता है । दिन हो या सप्ताह या फिर साल ही किसी को देने से स्थितियाँ परिवर्तित हो जाएँ ऐसा कहना कभी खतरे से खाली नही रहा । अभी साल भर ही तो हुआ है उस दिन भी एक मई ही था ! हिंदुस्तान अखबार में एक पुस्तक समीक्षा छपी थी । वह समीक्षा की तो मैंने थी पर वहाँ नाम किसी और का छपा था ! दिमाग भन्ना गया ! जिस काम को करने में मैंने उतना समय दिया उस काम का श्रेय किसी और को दिया गया ! अखबार के जिस कर्मी से मैंने समीक्षा के लिए पुस्तक ली थी और जिसे समीक्षा सौंपी थी उसे फोन किया तो उसने सीधे - सीधे मना कर दिया कि जो समीक्षा छपी है वह मेरी है ! उसने कहा उसने किसी और से लिखवायी है जिसका नाम भी छपा है । मेरे लिए यह एक सदमे से कम नहीं था ! मेरे इतना कहने पर कि समीक्षा में जो लिखा हुआ है वो मेरे शब्द हैं और बड़ी चालाकी से एक दो पंक्तियाँ उपर नीचे की गई हैं उसका कहना था कि एक ही किताब की समीक्षा है तो बातें तो मिलेंगी ही न ! और अब मुझे तंग मत करो मैं मीटिंग में हूँ । फोन कट गया था । उस आदमी ने कितनी सरलता से मेरे किए हुए काम को किसी और का साबित कर दिया था ! मैं उससे पूछना चाह रहा था कि जब किताब मेरे पास थी तो दूसरे किसी ने उसकी समीक्षा कैसे कर दी ? पर वह शख्स तो मीटिंग में चला गया था । व्यस्त होने से क्या कोई अपने अपराध से मुक्त हो सकता है ? उस दिन मेरे एक मित्र का जन्मदिन भी आता है सो मैं उसके जन्मदिन पर जेएनयू में था । दोस्तों को पता था कि मेरे साथ क्या हुआ है सो वे मुझे खुश करने की कोशिश कर रहे थे पर मन तो वहीं अटक रहा था जहाँ मेरे का श्रेय किसी और के हिस्से गया था । हम सब खाना खा रहे तो अखबार से उसी व्यक्ति का फोन आया । उसने कहा जो भी हुआ वो गलत हुआ उसके लिए मैं माफी माँगता हूँ । पर वो व्यक्ति यह स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हुआ कि अगले दिन इस संबंध का कोई माफीनामा अखबार में आए । मैं बस इतना कह पाया कि इतने बड़े अखबार से नए लेखकों के इस तरह के शोषण की उम्मीद नहीं थी और आज एक भरोसा टूट गया । ये मैं भी समझ रहा था कि इन बातों का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह गया था पर एक दर्द था जो बलबला कर शब्दों का आकार ले रहा था । इस घटना से पहले मैंने इस तरह के कामों के विषय में सुना था पर प्रत्यक्ष अनुभव उसी दिन हुआ ! अपने मरने पर नर्क देखने जैसा ! एक कार्य को करने पर मजदूरी तो दूर उसका श्रेय तक भी नहीं मिलना आज के लिए नया नहीं है । जबकि हम कितने ही बरसों से ये मजदूर दिवस मना रहे हैं पर मजदूरों में बने वर्गों में जो 'बड़े' और 'ऊँचे' मजदूर हैं बड़ी सरलता और सहजता से 'निम्न' श्रेणी के मजदूरों का हिस्सा खा रहे हैं । नया लेखक लिखना चाहता है और पुराने घाघ ये जानते हैं । अतः वे लिखाते हैं और फिर बड़ी चालाकी से उस लिखे हुए के अपना या अपने चमचों का करार कर देते हैं क्योंकि उनके पास संस्था की शक्ति है जो हमेशा उसी का साथ देती है । मैं जानता हूँ स्थितियाँ बदली नहीं हैं पर इस साल भर में इतना तो हो गया कि मैं कोई काम माँगने उस अखबार के दफ्तर नहीं गया । पर क्या मैं सच्चा मजदूर हूँ - नहीं ! यदि मैं सच्चा मजदूर होता तो मेरे पास वहाँ जाने के अलावा कोई चारा नहीं था । और शायद कुछ और शर्तें लाद दी जाती क्योंकि मैंने पूछने - जानने की हिमाकत की थी । मेरे कुछ दोस्त आज भी कभी - कभी मजाक में मुझे उसी नाम से बुलाता हैं जो नाम पिछले साल एक मई को उस समीक्षा के नीचे छपा था । समझ नही पाता हूँ कि ये सीख है या किसी भी क्षेत्र में नए लोगों के प्रवेश करने से लगायी गयी रोक । यह कहना नितांत गलत होगा कि मैं यदि लिखता तो सबसे अच्छा लिखता पर अपना स्थान तो बनाने का प्रयास करता ही । लेकिन पहले ही दौर ने मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया ।

अप्रैल 14, 2012

बदला बदला सा रेडियो !

रात रेडियो सुन रहा था....रेडियो क्या एफएम सुन रहा था । आज लगता है कि हम जिस समय बड़े हो रहे थे लगभग उसी समय तकनीक में आ रहे बदलाव सामाजिक संबंधों को बदल रहा था । हमारे ध्यान दिए बिना इतनी बारीकी से यह चलता रहा कि इसके यहाँ आ जाने तक की भनक तक न लगी ।
उन दिनों वहाँ संयुक्त परिवार जैसा ही कुछ था नाना और उनके अन्य तीन भाइयों का परिवार सब एक ही बड़े घर में रहते थे । परिवारों में खाना भले ही अलग अलग बनता था पर एक साथ रहने से एक अपनापा था । सुबह 6.05 बजे जब आकाशवाणी से पहला समाचार प्रसारित होता तब से लेकर बीबीसी की शाम की सेवा खत्म होने तक रेडियो किसी न किसी के हाथ में जरूर रहता था और कोई भी कार्यक्रम अकेले नहीं सुना जाता था । गर्मियों की दोपहर में जब आसपास के लोग अपना काम समाप्त कर मचान पर बैठने लगते और घडियां दो बजाने लगती तब शुरु होता था रेडियो के समाचारों और उन पर साथ साथ टिप्पणियों का दौर ! और रोचक संयोग तो देखिए इसी समय आकाशवाणी पर एक के बाद एक समाचारों की श्रृंखला सी थी 2 बजे अंग्रेजी में , 2.10 पर हिंदी में और उसके बाद धीमी गति के समाचार ! काफी बाद में मीडिया एम ए में मीडिया पढ़ते हुए पता चला कि ये धीमी गति के समाचार दूरदराज के क्षेत्रों में चल रहे छोटे अखबारों तक खबरें देने के लिए दिए जाते थे जिनके पास ढेर सारे संवाददाता नहीं होते । आज इंटरनेट ने धीमी गति के समाचार की आवश्यकता ही खत्म कर दी । 2.10 का बुलेटिन काफी लोकप्रिय था ! और मजा देखिए कि लोग अपने सारे काम उस समय तक खत्म कर देते थे । जो उस समय तक नहीं आ पाते तो माना जाता था कि उन्हें देर हो गई ।
शाम में जब बीबीसी के समय तक लोग अपना खाना पीना निबटाकर बैठ जाते थे । मामाजी उस समय बताते थे कि इंदिरा गाँधी के मरने की खबर सबसे पहले बीबीसी ने ही दी थी । उसके बाद जब उनके बेटे प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने आकाशवाणी पर हर घंटे समाचार का आदेश दिया । चुनाव के समय परिणाम आने तक रेडियो ओवरटाइम करता था । उस दौरान कोई चैनल लगाने में देरी हो जाती तो कितने ही ताने सुनने पड़ते थे ।
इतने सब में एक बात और भी थी इन सारे समय में स्त्रियों की भागीदारी न के बराबर थी । कभी कभी मेरी माँ पटना रेडियो स्टेशन से प्रसारित होने वाली'रस मंजरी' सुनती थी ।
समय इतनी तेजी से बदला आज रेडियो मोबाइल में फिट हो गया । और इतना सर्वसुलभ हो गया कि हर जेब में कम से कम एक तो आ ही गया है । आज रेडियो सुने तो जाते हैं पर नितांत व्यक्तिगत रूप से । समाचारों का स्वरूप बदल गया । समाचार की आवश्यकता भी अब उस तरह नहीं रही । इन 15-20 सालों में जो पीढ़ी सामने आई वह बुजुर्गों के तरीकों से अलहदा हो गई । आज जब गाँव जाता हूँ तो वहाँ रेडियो जैसा कुछ सुनने को नहीं मिलता । नाना और उनके भाई लोग अलग अलग घर बना कर रहने लगे । गाँव के बहुत से लोगों ने शहरों का रास्ता ले लिया । रेडियो अब दूरदराज के इलाकों में बस क्रिकेट बेचने तक का माध्यम भर रह गया है । बिजली नहीं है तो टीवी पर मैच नहीं आ सकता उतनी देर के लिए ही वहाँ अब रेडियो है ।
शहरों में रेडियो तो है पर वह खाली समय बिताने के एक उपकरण के रूप में । एफएम ने रेडियो को तो बदला पर वह व्यक्तिगत हो कर रह गया ।

अप्रैल 08, 2012

जो देना है अभी दे दो बाद में तुम अपने घर हम अपने घर ।

सुबह सुबह शोर से नींद खुल गई है । आँखें मुँह फुलाये बैठी हैं - उन्हें और सोना है । पर क्या किया जा सकता है जब नीचे इतनी आवाजें आ रही हों उसमें सोया भी तो नहीं जा सकता । ये चिल्लम-चिल्ली निगम चुनाव के उम्मीदवारों ने मजा रखी है । सुबह सुबह जब लोग नींद में ही हों तब आकर इतनी आवाजें की जाए कि बंदा उठ जाए और समझ जाए कि ये कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है । आज के दौर में हर जगह प्रतियोगिता का राज है , दूसरों से पहले स्वयं पहुँच जाने की इच्छा । विज्ञापन की दुनिया की तरह नये से नया तरीका ढूँढना इस समय की पहचान ! चुनाव है तो इसमें भी यही । आज मतदाता को जरूर महसूस हो गया होगा कि वह महाभारत के उस दृश्य में जी रहा है जहाँ वह गहरी नींद में सो रहा है और युधिष्ठिर - दुर्योधन उसके नींद से बाहर आने का इंतजार कर रहे हैं । एक बार को बड़ा अच्छा लगता है सोचना कि मतदाता इतना महत्वपूर्ण तो है ही कि उसके लिए इस तरह से किया जा रहा है । पर क्या यह ऐसा है ? इस व्यस्त से समय में मुश्किल से अपनी नींद के लिए अवकाश निकाल पाता है और उसके नितांत व्यक्तिगत पलों में उसे व्यक्तिगत नहीं रहने देने की कवायद की जाती है । बहरहाल नींद तो गई तेल लेने । मैंने गैलरी में जाकर देखा तो बड़ा ताज्जुब हुआ कि एक साथ इतने सारे बच्चे हाथों में खास पार्टी का चुनाव चिन्ह ले कर आगे आगे नारे लगाते चल रहे हैं । वे बच्चे किसी भी तरह से इस मोहल्ले के नहीं लग रहे हैं । प्रत्याशी के और उनके रिश्तेदारों के बच्चे हों इसकी संभावना तो प्रत्याशी को देखकर नहीं लगती । कम से कम जो काला चश्मा मैडम चढ़ा रखा है उसे देखकर तो पक्का कहा जा सकता है कि ये बच्चे उनके और उनके रिश्तेदारों के नहीं हैं । मैं नहीं जानता कि ये बच्चे कहाँ के हैं पर इसी तरह के बच्चों को कई बार विश्वविद्यालय मेट्रो पर दो दो रुपए माँगते देखा है ।
अभी परसोँ दिल्ली विश्वविद्यालय के आसपास घूम रहा था तो देखा लगभग सौ की संख्या में महिलाएँ किसी खास पार्टी के पर्चे बाँट रही थी । एक ही प्रकार के आर्थिक परिवेश की झलक उन स्त्रियों से क्यों आ रही थी , जिस इलाके में मैं घूम रहा था वहाँ इस आर्थिक समूह की स्त्रियाँ रहती ही नहीं है और जब मैं बस से यमुनापार आता हूँ तो वो प्रचार करने वाली स्त्रियों की तरह ही दिखने वाली स्त्रियाँ इस तरह की बातें कि 'आज यहाँ गए वहाँ गए ' '250 रुपए कम दे रहे हैं ' ' कितना भी खर्च कर ले जीतेगा नहीं' क्यों करती नजर आती हैं ये समझ पाना बहुत कठिन नहीं है ।
कल शाम बाल बनवा रहा था और वहीं पास में एक चुनावी सभा हो रही थी जिसमें स्थानीय विधायक भी उपस्थित थे । उन्होंने तमाम सूचना दी कि फलाँ दल के प्रत्याशी ने जब से पर्चा दाखिल कराया है तब से आफिस में दिन रात खुल्ला खाना दे रहे हैं , वो वाला शराब बाँट रहा है और ये निर्दलीय नोट ! जब उन लोगों की चुनावी सभा खत्म हुई तो उद्घोषक ने वहाँ बैठे लोगों से अनुरोध किया कि वे थोड़ी देर और बैठें उनके लिए नाश्ते की व्यवस्था की गई है ।
देश की चुनावी राजनीति, देश की दशा से बहुत आगे चली गयी है । अब यह मतदाता और नेता दोनों ही स्तरों पर माना जा चुका है कि इस गरीबी या महँगाई या कि सड़क आदि का इलाज किसी के पास नहीं है । ऐसी स्थिति में दोनों ही एक ने तरह के संबंध में बँध रहे हैं और यह है तात्कालिक और व्यक्तिगत फायदे का संबंध । जो देना है अभी दे दो बाद का झंझट ही क्यों पालें ! इस बीच एक नए तरह का वर्ग भी उभरा है जो चुनाव प्रचार के लिए एक तरह से 'स्किल्ड लेबर' का काम कर रहा है । ये दिखने में भले ही लुंजपुंज , गंदे दिखते हों पर इनमें एक प्रोफेशनल के गुण भरे पड़े हैं एक बार यदि पैसा लिया तो उसकी पूरी कीमत भर काम करते हैं । यह स्थिति भी एक तरह से लोकतंत्र के हित में ही है । पैसे का किसी रूप में सही नीचे की ओर प्रवाह हो तो रहा है । पहले जहाँ दूर दराज से ऐसे लोगों को चुनाव -प्रचार के लिए केवल 'पेट-भात' पर पकड़ लाया जाता था उससे तो स्थिति बदली है ।

अप्रैल 01, 2012

बेतरतीब यादें और उनका छूटते जाना !

जिन दिनों मैं अपने नानी के यहाँ रहता था उन दिनों उतने बड़े गाँव में शहतूत का एक ही पेड़ था । फागुन के खत्म होते ही लंबी और मोटी हवाओं में धूल के बड़े बड़े बादल यहाँ से उड़कर वहाँ जाते रहते थे । सुबह में हल्की सर्दी लगती थी पर 'टाभ नींबू' और सड़क के कात की 'भैंठ' की झाडी से उठती खुशबूओं के लिए सबेरे ही उठ जाना बड़ा ही आकर्षक हो जाता था ! पिताजी ऐसी ही सुबहों में कहते : प्रभाते भ्रमणं पथ्यम । मुझे लगता है उन्हें भी इस मौसम के अलावा बाद की सुबहें शायद नहीं लुभाती इसीलिए बाद के दिनों में कभी ऐसा नहीं कहा ।
बहरहाल उस नानी गाँव वाले शहतूत पर जाने से पहले एक बात और । उन धूल भरे दिनों में सबसे ज्यादा डर अगलगी का होता था । बहुत कम ऐसी शामें होती जिसमें ये खबर न आती की अमुक गाँव में आग लग गई ढेर सारे घर जल गए । सबसे ज्यादा दुख उन मवेशियों के लिए होता जो बँधे बँधे ही जल जाते थे !
फिर जिनके मवेशी इस तरह मर जाते थे उन्हें 'वध' लग जाता था । वे लंबे समय तक प्रतीक रूप में गले में एक रस्सी बाँध लेते और मौन रहते थे । हमारे इलाके में 'बध लगना' आज भी एक मुहावरे के तौर पर इस अर्थ में प्रयुक्त होता है जब किसी को कोई भारी दुख लग जाए और उससे वह अवाक़ हो जाए ! पशुपालक समाज में मवेशी कमाऊ सदस्य होते हैं उनके जाने का दुख उतना ही गहरा जितना घर के किसी मनुष्य का !!
उस शहतूत पर बच्चे क्या बड़े बड़े भी लगे रहते । उन फलों के पकने का इंतजार और ऐसा होने देने का धैर्य किसे था ! उन हरे हरे खट्टे फलों में ही सारा स्वाद था और यदि किसी को ज्यादा हाथ लग गए तो उसके घर शहतूत की चटनी ! बेचारा शहतूत लाठी पत्थर और पता नहीं क्या क्या झेलना सीख चुका था ।
और रही सही कसर उस पर चढ़ने वाले निकाल देते । शहतूत के खतम हो जाने के बाद ऐसा लगता जैसे दूसरी बार उस पेड़ पर पतझड आ गया हो ! तब उसकी ओर कोई मुँह भी नहीं करता । छूछा पेड़ -हुंह !!
आज दिल्ली में जहाँ भी जाईये शहतूत ही शहतूत नजर आते हैं । पक पक कर जमीन पर गिरते और अपना दाग छोड़ते शहतूत ! यहाँ ये जितने फलते हैं उसका एक प्रतिशत भी लोग खा लें बहुत है । दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में तो छोटे बच्चों को पेड़ से शहतूत 'चुनते' देखा पर अन्यत्र नहीं । एम के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय की लाइब्रेरी के भीतर लॉन में जो शहतूत का पेड़ था उसकी डालियां फल लगने से काफी नीचे तक झुक जाती थी । मैं और नंदू जबतक फल रहते तबतक बिला नागा जरूर खाते थे । वह पेड़ आज भी वहीं है अलबत्ता उसकी डालियों को जरूर पांग कर छोटा कर दिया है जिससे जो फल पहले हाथ से ही पकड़ में आ जाते वे अब कई मीटर उपर हो गए हैं । नंदू कब का दिल्ली छोड़ चुका है अभी उसने फोन कर बताया था कि उसकी शादी तय हो गयी है । उसने उस दिन एक और बात कही कि हम न के बराबर बात कर पाते हैं फिर भी हमारे बीच दोस्ती वही पुरानी है । तब लगा कि गला फाड़ के रोऊं कि जब हम मिलते थे तो कभी ये नहीं सोचा कि यह सब खत्म हो जाएगा, हम सब की राहें इस कदर अलग होंगी ! नंदू क्या बहुत सारे मेरे दोस्त और मैं आज इसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ शहतूत से हाथ की दूरी बढ़ती ही जा रही है ।
मेरे नानी के गाँव वाला शहतूत नहीं रहा और नहीं रहे भरी धूप में वहाँ जाने से रोकने वाले लोग ! दिल्ली में शहतूत का वह पेड़ तो है ही और दूसरे भी हैं पर फल हाथों की पहुँच से दूर होते जा रहे हैं ।
नंदू की शादी उन पुराने दिनों में खुशी देती थी पर अब वह दोस्ती के दायरे से हम दोनों की अंतिम विदाई जैसी लगती है ।
ये मौसम है कि हर बार आएगा और शहतूत में फल हर साल लगेंगे और दोस्तों से मिलने की तडप हर बार उठेगी !!

फ़रवरी 20, 2012

मांसाहारी चूना

आज तकनीक के सामाजिक प्रभाव पर कहीं पढ़ रहा था । पढ़ते हुए लगा कि यदि आपके पास विकल्प हों और उनमें से चयन की स्वतंत्रता हो तब आप उसके विषय में विचार - विमर्श करने की दशा में होते हैं । यदि ऐसा नहीं है तो जो भी उपलब्ध है फिर उसके गुण-दोषों की ओर ध्यान देने की जरूरत भी महसूस नहीं होती ।
इस बार मैं अपने नाना जी से मिला तो मुझे बातों बातों में ही पता चला कि बहुत समय पहले चूने का उत्पादन घोंघा के खोल को जला कर किया जाता था । तब मकानों के निर्माण में जिस चूने का प्रयोग होता था उसके लिए मुसहर जाति की स्त्रियाँ नदियों , तालाबों और चौरों से बड़े पैमाने पर घोंघा पकडती थी । फिर उनके मांसल भाग को अलग कर बड़े -बड़े बर्तनों में भर कर बेचने निकल जाती थी । सस्ते मांस के रूप में यह काफी लोकप्रिय था । (आज की संचार क्रांति और तकनीकी युग में घोंघा का मांस एक सस्ते मांसाहार का विकल्प ग्रामीण क्षेत्र में दे रहा है । ) वे स्त्रियाँ शाम को लौटकर घोंघा के खोल को जलाती थी और जलकर वह सफेद पाउडर में बदल जाता फिर उस जमाने में मकान बनाने के लिए व रंगाई-पुताई के लोग उसे चूने की तरह इस्तेमाल करते । इससे उन स्त्रियों की दोहरी आमदनी होती थी । घोंघा से प्राप्त चूना उसके मांस की तुलना में बहुत महँगे बिकता था ।
चूने का प्रयोग तब भी और आज भी पान एवं तम्बाकू के सेवन में किया जाता है । जबतक चूना-पत्थर से प्राप्त चूना उस बाजार में नहीं पहुँचा था तबतक उसी घोंघा के खोल को जलाकर प्राप्त किए गए चूने का ही प्रयोग लोग पान और तम्बाकू मे करते थे । लेकिन जैसे ही उनके सामने पत्थर वाले चूने का विकल्प आया वैसे उन्होंने पुराने प्रकार के चूने को त्याग दिया । इसके पीछे कारण यह बताया गया कि वह मांसाहारी चूना है और मुँह लगाना पाप है । फिर मकानों के निर्माण से भी धीरे धीरे वह दूर हो गया ।
यदि कल्पना की जाए तो कुछ संकेत तो अवश्य मिलते हैं कि हो न हो पत्थर वाले चूने की खपत बढ़ाने के लिए यह मांसाहार वाला पत्ता फेंका गया हो । मुसहर स्त्रियों के रोजगार का एक बड़ा साधन समाप्त हो गया । बड़ी पूँजी ने उन्हें बाजार से अपदस्थ कर दिया ।
समाज में लोगों के पास दो प्रकार के चूने का आ गया अब वे चयन कर सकते थे । इतना ही नहीं लोग अब चूने जैसी चीज तक को शाकाहार और मांसाहार जैसे द्वितीय स्तर के चिंतन में ला सकते थे । अन्यथा ये विचार तो पहले भी थे ।
अब गाँवों से घोंघा के मांस के साथ साथ केंकडे , छोटी मछलियाँ आदि के स्वाद गायब हो गये और गायब हो गया भूमिहीन लोगों की आमदनी का एक साधन । आज वहाँ भी स्वाद का मानकीकरण हो गया है । वहाँ की मछलियों का भी वही स्वाद है जो चेन्नई का है । और इसके साथ ही अपना रोजगार बदलकर ठेकेदारी और पलायन में फँस गया ।

फ़रवरी 09, 2012

गाना , लड़की और भारत में प्रेम

खिली धूप , तेज हवा और लौटती सर्दी की खूबसूरती है इस फरवरी में ! सर्दी के कपड़ों के बीच रंग दिखने लगे हैं और धूप में कुछ समय के बाद महसूस होने लगा है पसीना । कोई आश्चर्य नहीं कि प्रेम के इतने सारे उत्सवों के लिए यही समय मुफीद है । फूलों के खुले-खिले चेहरे हर तरफ अपने जैसा ही वातावरण बना रहे हैं । लोग मुस्कुराहट के साथ मिल रहे हैं और इस धूपिया खुशी के कारण कोई नहीं जानना चाह रहा है । वेलेंटाइन वाले सप्ताह का मध्य चल रहा है इसकी धमक हर जगह दिखाई दे रही है ।
हमारे एक सीनियर विश्वविद्यालय कैंपस उस समय आते हैं जब अधिकांश लोग चले गये होते हैं और कुछ जा रहे होते हैं । लोगों के जाने और उनके आने में वह संबंध नहीं है जो लोगों के जाने के समय और उनके आने के समय में है । यह समय शाम का होता है जब कैंपस में बहुत कम लोग होते हैं जिनमें से कुछ लाइब्रेरी में पढ़ने वाले और बाकी अँधेरे और एकांत तलाशने वाले होते हैं । लोग कहते हैं हमारे वे सीनियर कभी अपने लिए कैंपस में अँधेरा और एकांत नहीं तलाश पाए और अभी तक उनकी शादी भी नहीं हो पायी है । इस दशा में उनका देर से कैंपस आना किसी और प्रयोजन के लिए होता है । वे उन अँधेरों और एकांतोँ में जाते हैं और वहाँ के कार्यकलापों को महसूस करते हैं । इसे एक मानसिक विकार के तौर पर देखा जा सकता है और ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं हैं । अंग्रेजी विभाग की हमारी एक मित्र बता रही थी कि वे लोग एक खास शिक्षक के रास्ते में नहीं पडना चाहते क्योंकि ' ही इज अ बिग टाइम ठरकी ' ।
आज बस में आ रहा था । भीड़ भरी बस में अब लड़कियाँ भी खूब चलती हैँ । सीट पर बैठे लोग सीट नहीं देते बल्कि पास बिठाने की बात करते हैं और लड़कियाँ दो सीट के बीच की जगह में खड़ी हो जाती हैं । जिस ओर महिलाएँ हैं बस की भीड़ उधर ही केंद्रित हो जाती है । विश्वविद्यालय आने से पहले कुछ लोग बस के गेट की ओर आ जाते हैं और वहाँ ऐसी भीड़ हो जाती है कि कोई भी बहुत आसानी से नहीं निकल पाए । ऐसे में जब वहाँ से लड़कियाँ निकलती हैं तो उनका 'कुछ न कुछ' किसी न किसी से चिपक कर जरूर गुजरता है । और काम पर जाते हुए लोगों (इसमें हर उम्र के लोग होते हैं ) के लिए यह बस में चढ़ने का एक आवश्यक आनंद है और वे इसे अपना अधिकार मानते हैं । आज एक लड़का अपने फोन में गाने बजा रहा था । कैंपस आने से पहले लोग भीड़ पार कर के बस के दरवाजे की ओ आ लगे , लड़कियाँ भी । उस समय 'उ ला ला ' बज रहा था । लड़कों के बीच से एक लड़कियाँ गुजर रही थी वे जोर जोर से गाने लगे ' छेड़ेंगे हम तुमको लड़की तू है बड़ी...' । किसी ने प्रतिवाद किया तो एक लड़के ने कहा ' गाने में ऐसा लिखा है हम अपनी ओर से तो कुछ नहीं कह रहे ' ! इसका जवाब किसी के पास नही था ।
इस माहौल में अपने देश की परिस्थिति में वेलेंटाइन डे की उपस्थिति को देखने की जरूरत महसूस होती है । इसके विरोध में हम कितना भी कह लें पर देश में प्रेम के स्वरूप और उस की स्थिति पर बात करने व इसे समझने का मौका इसने जरूर दिया है ।
कहते हैं प्राचीन काल में मदनोत्सव, रास, महारास आदि होते थे लेकिन यह मुझे किस्से कहानियाँ और कोरे गप्प से ज्यादा कुछ नहीं लगता । ऐसा मानने का कारण यह है कि लोक में इसके कोई प्रमाण आज नहीं दिखते जबकि पूजा-पाठ , जाति-धर्म , और छोटी छोटी रूढ़ियों को हम आज तक प्रमाण के रूप में उपस्थित पाते हैं ।
भारतीय समाज में प्रेम की सहज उपस्थिति के प्रमाण नहीं हैं और यदि कहीं ऐसा होता पाया जाता है तो उसे पाश्चात्य प्रभाव के रूप में देखा जाता है । उपर के दो उदाहरण समाज में व्याप्त यौन कुंठा की ओर संकेत करते हैं । यहाँ प्रेम सहज रूप से करने की चीज नहीं मानी जाती तभी इस पर तमाम वर्जनाएं हैं । खाप , जाति आदि के बंधन को भी इससे जोड़ने की आवश्यकता है । इतिहास में यदि प्रेम सहज रूप में स्वीकृत होता तो कृष्ण - गोपियों जैसे और उदाहरण होते साथ ही राम और सीता विवाह से पहले बस दूर से ही एक दूसरे को देखते नहीं और उनके विवाह को इतने नाटकीय रूप से दिखाया नहीं जाता ।
इस स्थिति में वेलेंटाइन डे और इसके अन्य 'डे' हमें कम से कम प्रेम को सहज रूप में देखने के लिए प्रेरित तो करते हैं । भारत में भले ही यह बाजार के रास्ते आया हो और बाजार के स्तर पर इसे स्वीकार किया भी नहीं जा सकता पर भारत में प्रेम को नये से परिभाषित करने की आवश्यकता के बीच इसकी भी भूमिका है ।

फ़रवरी 02, 2012

पराये, तेरे कूचे से बाहर !

कहने को बहुत कुछ है पर किस तरह कहूँ कि छिपा भी दूँ तेरी नादनी को ........!

उस काम को करने की दिली इच्छा थी , ऐसी कि उसके लिए कुछ भी । कुछ भी मतलब कुछ भी ! मन में था और मौका इतनी आसानी से मिलेगा ये सोचा भी नहीं था । आसानी क्या, बाध्यता थी कि उस व्यवस्था में रहना है तो वैसा करना ही पड़ेगा । सोचिये कि जो आप करना चाहें और आपको वही करने के लिए अवसर भी दिए जाएँ तो कितना ही मजा हो । और जब आप आंतरिक रूप से अभिप्रेरित हों तो काम को करने का उत्साह अलग ही होता है । फिर भले ही आप किसी समूह का हिस्सा भी हों तो बार बार आगे बढ़ कर काम करने का ही मन करता है कोई करे न करे आए न आए कोई परवाह नहीं । ये बेफिक्री ही आपको आगे ले जाती है और इसी से आप एक सामान्य दायरे से हट जाते हैं ।
और मामला तब फँसता है जब बेफिक्री से आपके आसपास समस्या पैदा होने लगती है । यहाँ तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि उसको धारण करने की क्षमता समूह में आपकी हैसियत तय करने लगती है । आपके पास यदि अपेक्षित उपकरण नहीं है तो आप वे तमाम शऊर जो उस कार्य के लिए अपेक्षित हैं, रखकर भी नाकारे हैं और जिसके पास वो खरीदी हुई तकनीकी हो वो नासमझ भी हो तो भी किसी भी समूह में पूज्य है । हालाँकि इसमें कुछ भी नया नहीं है पर इसे एक उदाहरण द्वारा और स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है जैसे आप किसी समूह में होँ और आपको कोई फिल्म बनानी हो और आप दृश्य को पकड़ने की बारीक नजर भी रखते हों इसके बावजूद पूरा समूह वही करेगा जो कैमरे वाला कहेगा । पूरी गणित पूँजी की है । जो खरीदने की क्षमता रखता है आज लीडर वही है । ऐसा नहीं होता तो इतने गो-पों पंडित नेतागिरी में न रहते(कम से कम मेरे शहर के विधायक तो पक्के तौर पर ) । बहरहाल समूह को कद्र तो सोच की नहीं बल्कि पूँजी की करनी थी सो बेचारे सोचक के लिए वहाँ कोई स्थान ही नहीं रह गया था । यह स्थिति लगातार कुछ दिनों से बनी थी लेकिन एक सोच ही थी जो बराबर अपनी किल्लाठोक उपस्थिति जता रही थी । पर वह भी स्वयं को समझाने और खुश करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं थी । अंततः जीत पूँजी की ही हुई और एक अपनी क्षमता दिखाने का अवसर जाता रहा । कहने को तो समूह छोड़ना मेरा ही था इसे भी खुद को खुश करने का एक बहाना ही मानिए ।
सामाजिक स्थिति और स्वीकृति पूँजी तय करती है और इससे लगातार आपका साबका पड़ता रहता है । बात कुछ पुरानी है पर है जेहन में उसी तरह लिखी जैसे उस समय हुई थी ।दिल्ली में लंबे समय तक तैयारी करने के बाद भी कोई सरकारी नौकरी न करने के कारण घर जाने पर मेरी स्थिति अदना सी थी वहीं आठवीं पास बीएमपी एक सम्मानित व्यक्ति हो गया था ।
काम तो मिलते रहेंगे और होते भी रहेंगे पर मेरा उस समूह से निकलना समूह के समाजशास्त्र को समझने का अवसर देता है । हम सब चाहे मानें या न मानें पर पूँजी की ही गुलामी करते हैं । आज मैंने इसे झेला है तो मैं इस तरह की बात कर रहा हूँ लेकिन कल को मैं भी ऐसा कर सकता हूँ और उस समय मेरे पास भी उसके पक्ष में तर्क होंगे । समूह एक मजबूत गठजोड़ है लेकिन उस में सत्ता जब पूँजी हथिया ले तो उसका समूहपना नष्ट होकर उसे एक विकृत रूप दे देता है जहाँ विचार , बहस और यहाँ तक कि हँसी-मजाक के लिए भी गुंजाइश नहीं बचती ।
आगे की राह पर बहुत से मकाम हैं और वहाँ ढेरों समूह पर उनमें जाने का नया भय सर उठा रहा है । ऐसी स्थिति रही तो लोग एक दूसरे से बोलना-भूंकना छोड़ देंगे । बाबा भारती को अपना घोड़ा चोरी होने का मलाल नहीं था बल्कि उस घटना के प्रकाश में आने के बाद लोग विश्वास करना छोड़ देंगे इसका दुख था ।
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