जून 14, 2012

मनाली , मौसम और बिकता शहर !

रात आधी बीत चुकी है ! होटल के इस कमरे में दोस्तों के नाक बजने की घिसघिस है और बाहर है जगे हुए कुछ अंतिम लोगों की आवाज ! नींद नहीं आ रही ! शायद कुछ है जो छूटा सा लग रहा है ! दरवाजा खोल कर बाहर जाने पर भी कुछ अलग नहीं महसूस हो रहा । शहर मनाली को अभी इसी रूप में देख रहा हूँ । चमकती रोशनी में पहाड़ी बनावट के घर और हर घर पर एक नाम- फलाँ होटल । सारे घर होटल बन कर जाग रहे हैं और लगातार रंग -रोगन से पुते चेहरे पर फीकी व्यावसायिक हँसी टांग कर । मौसम बिक रहा है और इसने अपने साथ साथ यहाँ सबकुछ बिकाऊ बना दिया है । पहाड़ है पर पहाड़ी चेहरे नहीं और जो हैं वे खूबसूरत और गुदाज खरगोश या भेंड का बच्चा पकड़े हुए - फोटो खिंचा लो 'लेम' के साथ ! मैदानी चेहरे अपने यहाँ की भीषण गर्मी से राहत पाने आए हैं ! उथली, तेज बहाव वाली ब्यास नदी का ठंडा पानी सबकुछ भुला देने के लिए काफी है । पर दूसरे तरह से देखा जाए तो यह बिक चुका सौंदर्य है और औपनिवेशिक सौंदर्यबोध ! अभी थोड़ी देर पहले तक 'माल रोड' पर बस सैलानी ही सैलानी थे । इस-उस नामवाले होटलों के कमरों से निकल कर आए ये लोग ही इस शहर के वाशी लगते हैं । आज ये हैं कल कोई और उस सड़क पर चल रही भीड़ का हिस्सा होगा । पर इन घरों को पता है कि भीड़ तो जरूर रहेगी या तो सुंदरता के नाम पर या नहीं तो बर्फ के नाम पर । जब से आया हूँ तब से देख रहा हूँ जर्रे जर्रे को पता है कि उसका मोल क्या है और नहीं पता है तो उसका मोल कैसे बनाया जा सकता है । अखरोट की लकड़ी के यादगार मिल रहे हैं , चाभी का छल्ला मिल रहा है जबकि सब जानते हैं ये सब ऐसे ही पड़े रह जाते हैं । और जब कूडेदान में डालने की बारी आती है तो कोई भी लकड़ी हो कोई फर्क नहीं पड़ता । यहाँ या तो होटल हैं या दुकानें । एक मुख्य क्रिया जो लगातार चलती रहती है वह है -बिक्री ! बेशक लोग खरीद रहे हैं पर उससे ज्यादा बेचा जा रहा है । आज हम आसपास के दर्शनीय स्थानों पर पैदल ही घूम आए पर इतने के लिए ही कल शाम जब एक टैक्सी-ड्राइवर से बात की थी तो उसने तीन हजार का खर्चा बताया था । शहर से जरा से बाहर के होटल वाले अपने आगे या पीछे को हिस्से में सेब के पेड़ लगा रखे हैं उसके नीचे खाने की मेज और कुर्सियां ! सेब के पेड़ के नीचे खाने का मजा खाने की बिक्री के लिए विस्तृत अवसर का निर्माण करता है । हिमाचल प्रदेश के फल अन्य राज्यों में बिकते हैं पर यहाँ वे छोटे - छोटे पियो-फेंको कप में मिल रहे हैं और कीमत किसी भी स्थान से ज्यादा । इस शहर में आज दिन भर भटक कर पता चल गया कि इसका अपना कोई स्वाद नहीं है । हो सकता है कभी इसका अपना स्वाद रहा हो पर अब तो वही दाल है और वही पनीर ! बनाने का तरीका भी वही । और उन्हें बेचना है तो नदी के किनारे हल्के पानी में कुर्सी डाल दी जाती है , उस कुर्सी पर बैठा इंसान क्षण भर के लिए ही सही लेकिन परंपरागत सामंत जरूर दिखता है । पतली पतली सड़कों पर जाम है और गाड़ियों से निकलता धुआँ ! सड़कें अन्य राज्यों में भी खराब हैं और इससे बहुत ज्यादा खराब हैं पर यहाँ सड़क की खराब हालत के लिए जगह जगह खेद व्यक्त किया गया है और जहाँ सड़क की मरम्मती हो रही है उसके तुरंत बाद सहयोग के लिए धन्यवाद दिया गया है । खेद और धन्यवाद बाजारू कृत्रिमता से ज्यादा कुछ नहीं है । जो भी दिख रहा है सब बिक रहा है मोल लगाओ और आँखों , झोले या कमरों में भर लो । भीड़ शाश्वत है लोग बदलते हुए । पहाड़ के आसपास है तो किताब की अबतक देखी एकमात्र दुकान पर योग और आध्यात्म ही बिक रहा है । मन कर रहा है मैं भी कहीं से जाकर रात भर नींद खरीद लाउं !

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