दिसंबर 23, 2012

अब यहाँ किताब नहीं मिलते .....

दिल्ली में रहते हुए एक बात की लत सी लग गयी वो थी किताबें खरीदने की । 
मुहल्ले की दुकान बुक पॉइंट से लेकर हर बड़ी और प्रसिद्ध जगह पर किताबों की दुकानों ने न सिर्फ किताबों के लिए ललचाया बल्कि प्रभावित भी किया । एक बार की बात है , मैं और विकास कमरा छोड़ने वाले थे और चाह रहे थे के मुखर्जी नगर में रहने चले जाएँ । कमरा भी मिल गया था और सबकुछ तय भी हो गया था फिर विकास ने कहा के मुखर्जी नगर में कितनी किताबों की दुकानें हैं , ये तो हमारा खर्चा बढ़ा देंगी ! अब सोचते हैं तो लगता है के कितनी मामूली सी बात पर हमने मूखर्जी नगर में रहने का विचार त्याग दिया था लेकिन उस समय जब घर दिल्ली में रह कर तैयारी करने के लिए 2000 रूपय महीने के मिलते थे उनमें से यदि बहुत से रूपय किताब-पत्रिकाओं में ही चले जाएँ तो खाने का संकट आना लाजिमी था । और अच्छा किया कि नहीं गए मुखर्जी नगर, यहीं रहे और पैसे बचा कर किताबों पर लगाए । 

किताबों के मामले में  दिल्ली की स्थिति हमारे शहर से अलग थी । जहां सहरसा में अधिकतम इंजीनियरिंग की तैयारी की किताबें ही मिलती थी वहीं यहाँ पर अलग अलग रुचियों और स्वाद की किताबें । किताबों के स्वाद लेने के बारे में कृष्ण कुमार याद आते हैं पर उनकी बात कभी और .... 
कुल मिला कर सहरसा में रेलवे स्टेशन ही एकमात्र स्थान था जहां साहित्य से संबन्धित कुछ किताबें मिल जाती थी । तमाम सीमाओं के बावजूद सहरसा रेलवे स्टेशन पर बैठकर किताबें पढ़ने का अलग ही आनंद होता था । कितनी बार तो टी टी से झड़प हुई थी । फिर भी सारी किताबें वहाँ नहीं मिलती थी । मैं जब दिल्ली आ गया था तो दो तीन बार मित्र मिथिलेश जो आज एक नामी युवा कवि हैं उनके लिए यहाँ से किताबें भेजी क्योंकि सारी किताबें वहाँ नही मिलती थी । बहरहाल किताबों के मामले में दिल्ली ने न सिर्फ अवसर ही दिये बल्कि एक रुचि भी जगाई ...यहाँ समय समय पर होने वाले पुस्तक मेलों ने तो लगभग हर इच्छा पूरी करने की ठान रखी थी । और ऐसा ही किया कई बार यमुना विहार की उस दुकान ने जहां पुरानी किताबें आधी कीमत पर आज भी मिल जाती हैं । लेकिन दरियागंज में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार ने खासा निराश किया वहाँ हर बार वो किताबें नहीं मिली जो लेनी थी । 

इस बीच एक लंबा अरसा गुजर गया है , यमुना विहार का बुक पॉइंट बंद हो गया । मंडी हाउस के श्रीराम सेंटर में चलने वाली दुकान भी लगभग उसी समय बंद हो गयी । जिस मुहल्ले में रहता हूँ वहाँ भी हमारे शहर सहरसा की तर्ज पर अब केवल प्रतियोगिता की तैयारी करने वाली किताबें ही मिलती हैं । मुखर्जी नगर की बहुत सी किताब की दुकानें बंद हो गयी अब वहाँ फैशनेबल कपड़ों और खाने की दुकानें आ गयी हैं । इधर कोढ़ में खाज की तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में चलने वाली किताब की दुकान को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा बंद करा दिया गया है वहाँ कुछ नया खुलने वाला है और कहा जा रहा है कि किताब की उस दुकान के लिए अन्यत्र कोई जगह उपलब्ध कराई जायी जाएगी । ये दौर एक साथ ही आया है ... हमले किताबों पर ही हो रहे हैं । यूं ऊपर से देखने पर यह कोई बड़ी बात नही लगती लेकिन किताबों का जिस तरह से विचारों की मजबूती , उनके निर्माण एवं परिवर्तन में योगदान रहता है उसे देखते हुए ये सब एक सोची समझी प्रक्रिया ही लगती है और एक हमला भी । किताबों का व्यवसाय बहुत मुनाफे का व्यवसाय भी नहीं है कि इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनी आए और इसका पुनुरुत्थान हो । इस लिहाज से देखें तो हम काफी आगे बढ़ चुके हैं और विचारों की खुराक हमारी किताबें छुट रहीं हैं । 

कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग के एक पुस्तकालय कर्मी से बात हो रही थी , उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कहा जा रहा है कि अब खर्च में कटौती के तहत मुद्रित शोध पत्रिकाएँ खरीदने के बदले 'इ-जर्नल' की खरीद सुनिश्चित की जाए । यहाँ समस्या ये है कि विभिन्न विभागों में जीतने छात्र पढ़ते हैं उतनी मात्रा में कम्प्यूटर नहीं हैं जिससे कि सभी छात्र सुगमता से इ-जर्नल पढ़ सकें । और सब के पास कंप्यूटर भी नहीं है कि उसे घर में बैठ के ही पढ़ा जा सके । 
दुकानों के बंद होने और शिक्षा संस्थाओं के बदलते नजरिए ने पढ़ने की संस्कृति को प्रभावित किया है । इसका प्रभाव दिल्ली में बहुत गहरा रहा है । एक किताब की जरूरत हो तो अब कोई निश्चित ठौर के नही रहने की दशा में सीधे प्रकाशन से लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है ... 
ऐसे समय में एक सुबह जब एक मित्र ने फोन पर अपने विभाग में पुस्तकालय के लिए समाज विज्ञान की किताबों के बारे में नाम बताने को कहा । आश्चर्य कि कोई विभाग अब भी ऐसा सोचता है ... पर ये विभाग दिल्ली नहीं पंजाब के एक जिले में है !

दिसंबर 19, 2012

समाधान मोमबत्ती जलाना भर नहीं है .....

पूरा भरोसा है कि जिस  समय में हम जी रहे हैं वह बहुत जल्द भुला दिया जाएगा । जिस शिद्दत और घनत्व से हम आज ये सब महसूस कर रहे हैं वह काफ़ूर होना है और इस घटना को बहुत तेज़ी से बदलते वक़्त के हाथों में दे देना है । फिर ऐसी ही घटना बिलकुल नयी लगेगी , लगेगा ऐसा तो कभी हुआ ही नही था , ये तो पहली बार हो रहा है । एक शर्म , कुछ न कर पाने की निरीहता और प्रतिक्रिया देने की सहज प्रवृत्ति और भावनात्मक कौतुक से मिली जुली गरम हवा बह रही है । इस सर्दी में भी इस समूहिक शर्म के समय शरीर का पसीने से तर हो जाना स्वाभाविक है । इसके साथ ही तकनीक एवं सामाजिक संचार भी उसके लिए या किसी भी अन्य घटना के पक्ष में कुछ करने का विकल्प दे रहा है और इसी का गवाह बन रहा है मोमबत्ती से रौशन इंडिया गेट । पर यह सब किसलिए ? कब तक ?


बलात्कार आज एक आम फहम शब्द और एक सुबोध सी संकल्पना लगती है क्योंकि यह सूरज उगने जैसी घटना बन गयी है । आज इस शब्द को बच्चों के सामने भी बोला जा सकता है वो भी इसका अर्थ जानते हैं और हम ये कहते हैं कि बच्चे अब मासूम नही रहे । अर्थात यह शब्द आए दिन आए दिन होने वाली घटना से  प्रचलन में आने कर एक अलग सामाजिक स्वरूप को समझा रहा है । भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से यह कोई बहुत बड़ी बात हो ऐसा नही है लेकिन समाज के लिए इस शब्द का बहू-प्रयोग एक खतरे की घंटी है । यह भारतीय समाज की कोई बहुत उम्दा तस्वीर पेश करता हो ऐसा नही है ।

ये एक नयी घटना नही है और न ही बहुत दिनों बाद घटी है । लेकिन इस पर यह आक्रोश नया है । यह क्यों है इसकी व्याख्या के लिए यह समय नहीं है । बहुत सी घटनाएँ हमारे यहाँ होती रहीं हैं इस से भी वीभत्स पर जो खबर नही बन पायी वह रह गयी दाब कर । और जो खबर बनी भी जिस पर बहुत हाय तौबा मची भी वो भी किसी अंजाम पर पहुँचने से पहले ही दफन हो गयी । ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है । किसी निष्कर्ष पर पहुँचने की हालांकि यह एक जल्दबाज़ी है पर ऐसा कहा जा सकता है कि हम बहुत जल्दी भूलने वाले डरपोक लोग हैं जो अपनी दो रोटियाँ बचाने की जुगत में किसी मुद्दे पर टिके रहने से डरते हैं फिर जितना डरते हैं उतना डराया जाता है । डराने की प्रक्रिया और इसके तौर तरीके स्थान, काल ,वातावरण और व्यक्ति  के अनुसार होते हैं । हमारा समाज डरने वाले  और डराने वाले के दो स्पष्ट विभाजनों में लिपटा है और निश्चित तौर पर यह विभाजन आर्थिक-राजनीतिक-आपराधिक शक्ति और इसकी हीनता से जुड़ता है । आज जो प्रदर्शन कर रहे हैं वे कौन लोग हैं -घर से खाये हुए ही न ! पर ये बस खाये हुए हैं इनकी इससे कोई बड़ी शक्ति हो ऐसा नही है । शक्तिशाली को पता है कि ये बहुत से बहुत एक जगह जमा होकर प्रदर्शन कर सकते हैं, और वह भी कुछ ही समय के लिए । बस नज़र रखने और चुप्पी साधने से काम चल जाता है सरकारी तंत्र का । दुर्भाग्य से इनमें से कोई तंत्र में जा नही पाता और जो जाता है वो काजल की कोठरी से ही आता है !
बलात्कार एक सामाजिक बुराई है तो इससे निपटने के लिए समाज में ही जाना होगा । ज़ाहिर है यह न सरकार कर सकती है , न पुलिस और न ही न्याय व्यवस्था । इस घटना पर जितनी तीव्र और तीखी प्रतिक्रिया हो रही है उसका एक चौथाई भी यदि इस विषय पर सूचिन्तित ढंग से काम करे तो बात बन सकती है ।

आज जो भी बातें हो रही हैं उससे लगता है कि सुराज आ गया है लोग सचेत हो गए हैं , पुरुष आज से बल्कि अभी से स्त्रियॉं को बराबरी की दृष्टि से देखेंगे  जिसने भी इसको तोड़ने की कोशिश की उसे राष्ट्र -राज्य से कड़ी से कड़ी सजा मिलनी तय है , सोशल मीडिया पर जो कवितायें लिखी जा रही हैं उससे पीड़ितों में उत्साह का संचार होगा और वे हिम्मत से उठ खड़ी होंगी । पर क्या ये इतना सरल है ? सबसे पहले तो उसके घर से निकलने को ही लीजिये । माँ - बाप क्या ताना देने का एक भी मौका छोड़ेंगे जब वो कहीं भी अकेले चली जाएगी ? जहां जाएगी वहाँ कितने संवेदनशील लोग हैं जो उसकी परिस्थिति को समझेंगे ? उसे कौन नौकरी देगा ? किससे उसकी शादी होगी ?

ये सब बताता है कि यह समय इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाने का या प्रदर्शन कर आक्रोश और ऊर्जा को खत्म करने का नही है बल्कि किसी और बात पर विचार करने से पहले समाज में स्त्री - पुरुष की बराबरी लाने या कम से कम उसे एक जीव समझने के लिए जरूरी काम करने का है । यह घटना केंद्र में हो पर यह केवल आम आंदोलन या प्रदर्शन का आधार बन कर न रह जाए ।
यह सब इतना सरल नहीं है क्योंकि लंबे समय से पुरुष वाद में समजीकृत मन भले ही वह स्त्री का ही क्यों न हो बाहर आने से डरता है । ऐसे में बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है ।  बलात्कार की घटना से पहले की जो बहुत सी घटनायें होती हैं उन्हें नज़रअंदाज़ करने से बचना होगा । हमारे यहाँ कहावत है ' लत्ती चोर , पत्ती चोर तब सीनियर चोर ' । आए दिन मेट्रो, बस, महाविद्यालय ,विद्यालय , सड़क , मैदान आदि जगहों में हम कितनी जगह स्त्रीयो को देते  हैं ? बाहर जाने दीजिये घर की संरचना में ही क्या हम ऐसा कर पाते हैं ? ऐसा करने वालों में लगभग हम सभी आते हैं और इन्हीं 'हम ' मैं बहुत सारे इन प्रदर्शनों में भी हैं , टिप्पणीकारों में भी हैं  । हमने स्त्री की अस्मिता को जिस तरह से समझा और आत्मसात किया है वही त्रुटिपूर्ण है । वह बताता है कि जो है पुरुष है, स्त्री कुछ  है ही नहीं । यही गैर बराबरी उन पर अधिकार करने के लिए प्रेरित करती है बल्कि हिम्मत देती है ।
एक आंदोलन में चले जाने भर से काम बनने वाला होता तो अब तक बहुत से हो चुके और बहुत से और होते रहेंगे । जरूरी अपने आस पास स्त्रियॉं को स्पेस देना है ,उनके अस्तित्व को स्वीकार करना  है । वरना इंडिया गेट या मुनीरका में प्रदर्शन कर के लौटते हुए मेट्रो के' महिला बोगी ' के पास हम खड़े होते रहेंगे और रात को उन सब को याद कर अपने- अपने लिंग सहलाते रहेंगे ! 

दिसंबर 15, 2012

नाटक देखते देखते ...

ये हाल ही में अलग अलग समय पर देखे गए नाटकों कुछ कुछ लिखा गया है । इसमें कोई परस्पर संबद्धता हो ऐसा न मैं दावा करता हूँ और न ही ऐसा है । ये शायद नाटकों को मैं जितना समझ पाता हूँ उतना ही बताता है ।


1... शायर शटर डाउन ..........  त्रिपुरारी शर्मा द्वारा निर्देशित नाटक । आरंभ में लगा कि क्या देख रहा हूँ, क्या कहा जा रहा है .... और एक बार को ये भी लगा के टीकम जोशी बांध नही पा रहे हैं दर्शकों को । फिर चीजें जुड़ती गयी एक से एक ... ये दरअसल अकेलेपन, लोगों के बीच बढ़ती दूरियाँ , बढ़ते अपरिचय का नाटक था । इसीलिए एक पात्रीय भी था । और ज़ाहिर है इस अकेले पन को दिखाने के लिए शहर ही केंद्र में होता और था भी । शहर क्या इतनी ही अकेली जगह होती है ? माना कि शहर में अपरिचय है और दूरियाँ हैं पर क्या ये दूरियाँ इस वजह से नहीं हैं के हम अपनी चीजें जहां से छोड़ के आए उस जगह को भूल नही पाये ? इसी शहर में यदि कोई मुझे नही पहचानता है तो मैं ही कितनों को जानता हूँ ? मैंने ही कितनों की ओर हाथ बढ़ाए हैं ? शहर में जो लोग वर्षों से रह रहें हैं वो तो कभी इस तरह की शिकायत नही करते क्योंकि उनका जो है यहीं है । इसलिए अकेलेपन के लिए शहर को जिम्मेदार बनाना उचित नही प्रतीत होता । और जो व्यक्ति का अकेला पन है उसे तो कहीं भी महसूस किया जा सकता है चाहे वह कितना ही प्यारा गाँव क्यों न हो ।   आजकल के बड़े निर्देशकों में एक चलन देखता हूँ -वे एक पात्रीय नाटक कर रहे हैं और कलाकार ला रहे हैं नामचीन ... आज थे टीकम जोशी । टीकम टीवी के प्रसिद्ध नाम हैं । प्रसिद्ध कलाकार अपने नाम पर बहुत भीड़ खींचते हैं वरना भूमिका के साथ तो निर्वाह कोई भी माँझा हुआ कलाकार कर देगा ।
नाटक देखते देखते कई बातें याद आ रही थी.... ;आलेख कमलेश्वर की कहानी 'खोयी हुई दिशाएँ ' से मेल खाता हुआ सा , टीकम के अभिनय में मिस्टर बीन की छाप , और अकेलेपन का मजा लेने वाले हिस्सों में अंग्रेज़ लेखक 'जी के चेस्टर्टन' के लेखों का मज़ा । पर इन सब को मंच पर निभा जाना अपने आप में प्रशंसनीय है । टीकम जोशी ने मंच पर जो प्रतिभा दिखाई वो उनके उन सब हिस्सों से अलग थी जो अबतक टीवी पर देखी या फिर हालिया प्रदर्शित तुगलक से बिलकुल अलग ....
वैसे एक बात जो कहनी जरूरी है वो यह कि ये नाटक बीते हुए समय का लग रहा है... भले ही इसमें हमारे समय से संवाद करने के लिए कुछ दृश्यों को डाला गया है पर इस नाटक का अकेलापन और अपरिचय काफी पुराना लगता है । लगता है हम बिलकुल पूर्व उदरवादी चरण के शहरीकरण में चले गए हैं जहां नए प्रकार की बसावट है , लोग एक स्थान छोड़ के दूसरी जगह आए हैं और यह नयी नयी व्यवस्था अभी पचि नही है । तब से एक या दो नयी पीढ़ी जरूर आ गयी हैं फिर भी अकेलेपन को समझने के हमारे औज़ार वही पुराने ही हैं ।  अब  ये अकेलापन कई गुना बढ़ गया है और अकेलेपन की कोई एक ही वजह नही रही  , अब तो यह  बीमारियों की कोटी में  आ गईं है ... अब तो हम पार्क में बैठकर आखबार पढ़ने से भी बढ़ चुके हैं .... वह अकेलापन दूसरा था और आज का दूसरा है । पहले काम के साथ तालमेल न बैठा पाना था अब अब काम से फुर्सत नहीं है अकेलेपन तक पर विचार करने को ।
इसके बावजूद नाटक में गज़ब की कसावट थी एक मजबूत आलेख और दमदार अभिनय जो नाटक के लिए जरूरी होता है  ...

2 अंत में पुरानी रंगभाषा ही काम आई ! लगभग एक सप्ताह में अनुराधा कपूर की दूसरी प्रस्तुति थी ।  उनके निर्देशकपने से ऊब जाने से बचाने के लिए अभिनय किया सीमा विश्वास ने !
सीमा के अभिनय शैली के विस्तार ने पहले कुछ ही मिनटों में जो बाँधा कि भई मैं तो निकल नहीं पाया !
गिरीश कर्नाड के टैगोर के नाट्यलेखन पर लिखने के बाद उनकी कथा 'जीवितो मृतो' पर जैसे सोच लिया गया था कि उनके नाट्य लेखन को महान साबित करना है । इस लिहाज से टैगोर चुने गए शायद ! नाट्य रूपांतरण गीतांजली श्री का था । टैगोर की एक संपूर्ण समझ से किया गया रूपांतरण लगा । और सीमा ने अपने हिसाब से जो इम्प्रोवाइज उससे नाटक किसी काल विशेष का नहीं बल्कि काल से ऊपर उठकर वर्तमान के लिए भी बन कर आ गया । फिर लगा कि  कोई मरता है तो क्या सब छुट जाता है ।
हालाँकि कितना भी उम्दा कलाकार हो सुना है निर्देशक को फिर भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है तो इस सुनी हुई बात पर अनुराधा ने बहुत मजबूत काम किया जिसमें वाकई कोई नई रंगभाषा घने की जिद न थी ।यहाँ नयी रंग भाषा का जिक्र इसलिए कि हाल ही में अनुराधा कपूर ने रानवि के छात्रों के साथ एक चलता फिरता नाटक तैयार किया जो लगभग आम जन जीवन की तरह जीवंत लगे ऐसी  सोच के साथ बना हो पर वह वैसा नही था । उसे नयी रंग भाषा कह कर प्रचारित भी किया गया था ।  'सीमा विश्वास' ने साबित किया कि नाटक केवल कथ्य और मंच सज्जा और निर्देशकों के तौर तरीके ही नही हैं  बल्कि उससे अलग वह एक कलाकार केन्द्रित विधा भी है जिसमें अंततः कलाकार को ही दर्शक से संवाद बिठाना है ।  सीमा का रेंज गजब है बॉस । जब जो चाहा दर्शक को महसूस कराया ! कभी कभी वहाँ भी और बाद में भी लगा कि उनको कोई निर्देशक क्या निर्देशित करेगा ! भाव समझा दो और कर लो एक सशक्त नाटक तैयार ।
टैगोर की कथा नहीं पढ़ी पर अब लगता है वह सामने ही तो घटी थी

3.हालाँकि ये एक खुश होने वाली बात है कि हिंदी का एक कवि रंगमंच के क्षेत्र में हस्तक्षेप की कोशिश कर रहा है लेकिन इसे हस्तक्षेप कहना उचित नहीं होगा !
अभी अभी निकला हूँ व्योमेश शुक्ल के रूपवाणी समूह की 'कामायनी' पर प्रस्तुति देख कर । कविता एक अलग विधा है और निर्देशन दूसरी विधा और ऐसा कहना कोई बहुत बड़ा रहस्योद्घाटन नहीं है । व्योमेश अच्छे कवि हो सकते हैं परन्तु उनकी आज की नाट्य प्रस्तुति संतुष्ट करने वाली नहीं थी ! एक तरह से मैं इसे नाटक के दायरे में उनका प्रवेश ही मानता हूँ इस लिहाज से बहुत कसी हुई प्रस्तुति की अपेक्षा नहीं थी लेकिन ये कॉलेज स्तर के वर्कशॉप के उपरांत का अभियान लगा !
कामायनी का पाठ एक गंभीर पाठ है और उसकी मासूम और चंचल प्रस्तुति पाठ की गहनता से कभी तालमेल नहीं बिठा पायी । कविता का मंचन कठिन नृत्य अभ्यास और विस्तृत निर्देशकीय क्षमता की माँग करता है ताकि कथ्य को सम्यक रूप से पहुँचाया जा सके ! यदि ऐसा न हो रहा हो तो विभिन्न नाट्य सामग्री का सहारा लिया जा सके ! पर ये न देख पाया !
लड़कियों ने यथासंभव बेहतर देने की कोशिश की पर स्वयं व्योमेश ही कमजोर कड़ी साबित हो रहे थे । कुछ और नहीं तो पंक्तियाँ किसी अच्छे रिकॉर्डिंग स्टूडियो में रिकॉर्ड करा लेते ! आखिर पैसे की कौन सी कमी है ।
इन अकादमियों के लिए कार्यक्रम करने वाले समूह की चयन प्रक्रिया क्या है इसे सार्वजनिक करने की आवश्यकता है ।

दिसंबर 02, 2012

कहने को बहनें बहुत खुश हैं

बहनों को अपने घर की संरचना में देखने का आदि मन उस से बाहर उन्हें  देखकर पहली बार पहचानने से इंकार कर देता है । लगता है न ये वो नही है जो हमारे घर में बड़ी हुई थी । शायद वो उनका भी सुनहरा दौर रहा होगा । एक स्त्री हमारी माँ  भी है पर उन्हे देख के ये कभी नहीं लगा के ये हमारे घर आने से पहले एक अलग ही व्यक्तित्व रही होंगी । क्योंकि उनको जब से देखा है एक जैसा ही  देखा है । शायद उनके बारे में ये सोचता भी नहीं यदि बहनों को उनके ससुराल में नहीं देखता ।
पहले सारा घर उनका था , उनकी तरह से चलता हुआ । उनके मेहनत की छाप तह किए गए कपड़ों तक में दिखती थी । हर आने जाने वालों की प्रशंसा उनके लिए ही होती थी । उनसे जलन होती थी । उस समय वही बहन घर से बाहर जब कोचिंग जाती थी तो लड़के तरह तरह की भंगिमाएँ करते रहते थे और बाद में हम घरवालों में से किसी ने देख लीया तो डांट बहन के हिस्से में ही आती थी । आज लगता है कि उन्हें हमने उसी समय से दराज में रखना शुरू कर दिया था । तभी शायद चाचा जी गर्व से कहते फिरते हैं कि हमारे घर की बेटियों ने कभी 'ताक-झांक' नहीं की । इस लिहाज से उनके व्यकित्व का एक पक्ष तो विकसित ही नहीं हो सका । उनके प्रेम पर प्रतिबंध था पर क्या उनके मन पर भी बंधन रहा होगा ? मुझे बार बार उनका अमरूद खाता हुआ हँसता हुआ चेहरा ही नज़र आता है । वैसे यदि वो प्रेम करती तो वो  भी हमारे मुहल्ले में अपने नाम से जानी जाती । मैं जब ऐसा लिख रहा हूँ तो मुझे लगा रहा है कि मैं भी चाचा बन रहा हूँ उन्हीं की तरह बोल रहा हूँ । पर यदि वो प्रेम करती तो उनको आज मैं मजबूत कहता हालांकि उनको कमजोर करने की हर एक व्यवस्था घर ने और पड़ोस ने कर रखी थी । उन्होने भी इस स्थिति को स्वीकार कर लीआ था इसीलिए विरोध की बात नही उठी । उनका विरोध उनके मन की इच्छा किसी और रूप में बाहर आई होगी पर मुझे इसका इल्म नही और उस दौरान इतना शऊर भी नही था कि ये सब पहचान पाऊँ । और घरवाले तो जान बूझ के नही जानते ऐसी बातों को । इसके बावजूद घर में बहनों की धूम बनी रहती थी । उनकी हंसी भले ही धीमी थी पर घर के दायरे में खूब गूँजती थी । स्वच्छंद चिड़ियों  की चहचहाहट बनी रहती थी । उनकी शादियों के बाद क्रमशः ये सब कम होता गया । हमें लगता था कि ये सब बस हमारे घर से कम हुआ है । बहुत सी कहावतों में ये सुन राखा था कि बेटियाँ इस घर के बाद उस घर में खिलखिलाती रहती हैं तो लगा था कि ये सच होगा । 
  हाल में जब उनसे उनके ही घरों में मिलना हुआ तो लगा के वो जो इनकी स्वच्छंदता थी शायद तभी खत्म हो गयी थी जब हमारे घर में इनकी चहचहाहट बंद हुई थी । इनकी हर गतिविधि पर किसी न किसी नज़र रहती है कम से कम सास तो कुंडली मार के बैठी ही रहती है । दिन भर किसी न किसी का हुकुम बजाओ जरा सी देर के लिए पलक मारा नही कि बच्चा रोने लगा । दिन भर में बहन तो कहीं थी ही नही । जिन दराजों में हमने उन्हें तब बंद करना शुरू किया था वो अब उनका घर बन गया था । इन दराज़ों के दायरे उनके मन को कितना छीजते होंगे । आज लगता है कि इन दायरों से बाहर निकलने का कोई भी मौका देने से पहले सास ससुर क्यों हज़ार बार सोचते हैं । 
अब तक स्त्री पर चिंतन को समझने का आधार किताबी किस्म का ही रहा था घर के वातावरण ने भी कोई बहुत मदद नहीं की पर बहनों को देख के लगा कि जो सब सिद्धान्त है वह  व्यवहार से कितना दूर है । और जो भी सिद्धान्त बना है उसके अनुप्रयोगों को खोजना  हो तो लगता है किसी और ग्रह पर जाना पड़ेगा ... खैर बहनें हमारे यहाँ भी अपने मन का नहीं करती थी पर उस समय वो जो भी थी आज नही हैं ... मुझसे कम उम्र में ही उनके चेहरे की झुर्रियां मायूस करती हैं । कहने को वो बहुत खुश हैं सुख से जी रही हैं .....
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