जनवरी 03, 2013

असफलताओं के भारी प्रतिशत के निहितार्थ

इस समय बहुत कुछ नजरों के सामने से गुजर भले ही जाए पर उस पर विचार करने का समय नहीं मिल रहा है । लेकिन चीजें और घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं । समाज अपनी गति से चलता है और उसी तरह से अपने आसपास होने वाली घटनाएँ । अभी हाल ही में सीबीएससी द्वारा आयोजित  शिक्षकों की पात्रता  परीक्षा CTET का परिणाम घोषित हुआ । कुल 7,96000 अभ्यर्थियों में से मात्र 1% ही उत्तीर्ण हो पाये । यह वही परीक्षा है जिसकी उत्तीर्णता के आधार पर केंद्र और कुछ राज्य सरकारों के विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है ।

इस परिणाम का विश्लेषण करें तो सबसे पहले ये ही नजर आता है कि शिक्षक बनने वाले इतने अभ्यर्थी इस योग्य भी नहीं कि पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण कर सके । और देश की शिक्षा की गुणवत्ता का क्या हाल है ? जब से इस परीक्षा की शुरुआत हुई तब से उत्तीर्णता का प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं रहा है ।  इसे शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी मानने वाले बहुत से लोग हैं । और लोगों ने तो बी एड डिग्री देने वाली संस्थाओं पर सवाल उठाए हैं ।
एक तरह से देखा जाए तो ये सब ऊपरी तौर पर सच हैं लेकिन इसे गहरे रूप में देखे जाने की जरूरत है जो इसके पीछे की तमाम बातों को उघड़ने का मौका देता है ।
मानव संसाधन मंत्रालय ने शिक्षकों के लिए तो इस प्रकार की परीक्षा की अनिवार्यता तो कर दी लेकिन एक शिक्षक बनने के लिए जरूरी गुणों का विकास करने की कोई व्यवस्था हो इसके लिए तैयारी नहीं की । देश में हर साल एक लाख के आसपास लोग बीएड करते हैं और उनसे अपेक्षा यह होती है कि अब वे शिक्षकीय कार्य के लिए तैयार हैं । देश के ज़्यादातर विश्वविद्यालयों में यह कोर्स साल भर का ही है । इस दौरान एक व्यक्ति शिक्षक बन जाए इसकी संभावना बहुत कम है । वह भी ऐसी दशा में जब आज भी शिक्षक बनना सबसे बाद का विकल्प माना जाता है । जब कहीं भी सफलता नहीं मिली तो शिक्षक बनना भारत में एक सर्व-स्वीकृत विकल्प है । शिक्षा के लिए व्यक्ति को तैयार करने के लिए सबसे पहले तो साल भर का समय बहुत ही कम होता है।  दूसरे इसके लिए जो सबसे जरूरी पक्ष हैं बच्चे उनको समझना बहुत आसान नहीं है ।  निजी एवं राज्य सरकारों के बीएड महाविद्यालयों की बात तो जाने दें केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कराये जा रहे ये पाठ्यक्रम भी बच्चों को समझने लायक समझ पैदा कर सकें ऐसी दशा में नहीं हैं ।

शिक्षक पात्रता परीक्षा के स्वरूप को भी समझने की आवश्यकता है । यह परीक्षा उन सभी बातों की जांच करे जो प्रशिक्षण के दौरान सीखे गए हैं इसकी संभावना नहीं है । इसमें अब तक  कुछ खास विषयों पर ही फोकस रखा गया है जैसे गणित , विज्ञान एवं समाज विज्ञान । इन विषयों के वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं जिसके आधार पर ये कहा  जाए कि अभ्यर्थियों की समझ की जांच भी हो गयी होगी वह सही नहीं । इससे ज्यादा से ज्यादा उनके  रटंत ज्ञान को परख लिया जाता है । हमारे शिक्षा संस्थान अपनी अपनी जटिलताओं में ग्रस्त होकर अन्य विषय की ओर देखने की जहमत भी नहीं लेते । कल्पना करना कठिन नहीं है कि 10वीं में यदि किसी ने गणित पढ़ना छोड़ दिया है और 6-7 साल बाद उससे इस परीक्षा में गणित के प्रश्न पूछे जाएँ तो किस प्रकार उत्तर कर पाते  होंगे !

इस परीक्षा ने एक तरह से कोचिंग संस्थाओं के लिए नए रास्ते खोल दिये । जिस परीक्षा में फेल होने का प्रतिशत इतना ज्यादा हो उसमें सफल होने के लिए कोचिंग का रुख करने वाले छात्रों की संख्या का अनुमान लगाना भी कठिन है । हर छोटी बड़ी जगह पर इसकी तैयारी कराई जाने लगी है । आए दिन नयी संस्था के इस क्षेत्र में उतरने की सूचना दीवारों पर चिपके उनके पोस्टर से मिलती है । यहाँ एक बात यह ध्यान देने की है कि इतनी बड़ी संख्या में तैस्यारी करने वालों के आने के बाद भी बहुत कम लोगों का सफल होना इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली के साथ साथ इनके औचित्य पर भी प्रश्न चिन्ह लगता है ।

इस परीक्षा में असफलता को केवल  छात्रों की असफलता कह पाना कठिन है । यह देश में सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था और उसके निर्धारकों की असफलता ज्यादा है । क्योंकि आनन फानन में बिना जरूरी अवसंरचना के इस प्रणाली को लागू कर दिया गया। यह तय करने की जरुरत नहीं समझी गयी कि देश भर में शिक्षा की सरंचना एक  सी नहीं है तो एक से प्रश्न कैसे पुछे जा सकते हैं । दूसरे रटंत प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देकर कोई व्यक्ति शिक्षक बनने के योग्य हो गया यह क्यों मान लिया गया ? शिक्षक बनने के लिए जरूरी अभिरुचि का अभाव भारत के शिक्षकों में आम है क्योकि यह केवल ज्ञान का नहीं बल्कि व्यवहार और बारीक मानवीय समझ एवं संवाद आदि जरूरी स्किल का क्षेत्र है जो अपने देश में ज़्यादातर मामलों में न ध्यान  दिये जाने के कारण विकसित ही नहीं हो पाते । ऊपर से इस क्षेत्र का बहुत कम बाजार भाव आरंभ से ही किसी को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाता । जब अंतिम विकल्प के रूप में इसे चुना जाता है तब तक व्यक्ति अपने को खास तरीके से ढाल चुका होता है फिर उसे साल भर में शिक्षक बनाना किसी के लिए टेढ़ी खीर है । पक्के घड़े पर मिट्टी का  चढ़ना सरल नहीं है ।

इस परीक्षा में इतनी बड़ी मात्रा में असफलता विद्यार्थियों को तैयार करने वाली हर संस्था पर प्रश्न उठाती है जिनसे गुजर कर वे रोजगार पाने की पंक्ति में खड़े होते हैं । वहाँ न तो अंतरानुशासनिक होने का अवसर है, न ही प्रश्न उठाने का और न ही अलग प्रकार से सोचने की । बीएड कराने वाले संस्थान सिरे से आज की आवश्यकताओं के अनुरूप छात्र तैयार करने की दशा में नहीं हैं । बड़े बड़े संस्थान जो तय किया जा चुका है उसी पर चल रहे हैं । एक तो शिक्षकों का अभाव है और योग्य शिक्षक तो और बहुत कम हैं । ऐसे में सारी ज़िम्मेदारी एक छात्र पर ही रहती है और वह भी गिरते संभालते कुछ कुछ करता ही जाता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

स्वागत ...

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...