जनवरी 05, 2013

रेणु के बहाने हिन्दी आलोचना पर एक टीप

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी है 'रसप्रिया' एक बहुश्रुत रचनाकार की बहुत कम चर्चित कहानी । इस कहानी का सबसे बड़ा घाटा यही है कि यह रेणु की कहानी है । जिस क्षण लोग उनकी कहानियों  पर बात करना शुरू करते हैं उसी क्षण आंचलिकता का एक बड़ा सा भूत सारी कहानियों के आगे नाचने लगता है । फिर कितनी ही उम्दा कहानी क्यों न हो उस पर बात कहानी के तरीकों से नहीं बल्कि आंचलिकता के तरीकों से होने लगती है ।


साहित्य की यह विडम्बना रही है कि उसमे निर्णयात्मक होना और फ्रेमिंग कर देना पहले - दूसरे पाठ में ही आरंभ हो जाता है ; यदि आलोचक बड़ा हो तो उसकी बात पत्थर की लकीर की ही तरह काम करती है । बहुत कम बार ऐसा हुआ है कि पाठ को पाठ की तरह से देखकर उस पर बात हुई हो । बड़े आलोचकों ने किसी रचना के संबंध यदि कुछ कह दिया है तो छात्र और परीक्षकों के लिए वह 'आप्त वचन' की तरह हो जाता है । यदि परीक्षा में उन्हे उद्धृत नहीं किया तो उत्तर पुस्तिका किसी काम की ही नहीं है । यहाँ परीक्षा का जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि परीक्षा प्रणाली साहित्य की समझ की जांच करने के बदले यह जांचने में लगी रहती है कि छात्र ने कितना पढ़ा (अंततः कितना रटा ) ! पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने में कोई नुकसान नहीं है लेकिन उस प्रोत्साहन के नाम पर जो साहित्य की समझ को फ्रेम करने की कोशिश होती है वह छात्रों की चिंतनशीलता को सीमित करती है जिससे उनका वैकल्पिक चिंतन गहराई से प्रभावित होता है । यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि छात्र आज साहित्य के सबसे बड़े भोक्ता हैं । उनसे बाहर साहित्य खासकर हिन्दी साहित्य बहुत बहुत छोटा है ।

दूसरी बात आ जाती है भाषा की । छूटते ही कह दिया जाता है कि भाषा सही नही है । यहाँ सही भाषा का तात्पर्य यह है कि एक मानक भाषा नही है । मानक भाषा वह जो चिरकाल से चली आ रही है , जिसके संदर्भों में भले ही परिवर्तन आ गया हो लेकिन उनके शब्द वही है हैं जो आज से कई साल पुराने हैं । सबसे बड़ी समस्या प्रश्नों के उत्तरों और शोध की भाषा को लेकर है । शोध की भ्श को लेकर तो कई बार शिकायत रही है ।  यहाँ यह देखना खास तौर पर जरूरी है कि हर व्यक्ति की भाषा दूसरे से अलग होती है क्योंकि यह उसके अपने समाजीकरण , अनुभव एवं तर्कों से निर्मित होती है । यह है भाषा की साधारण स्थिति और शोध कार्यों के दौरान एक खास भाषा में लिखने का दबाव न सिर्फ शोध की गुणवत्ता को प्रभावित करता है बल्कि एक नयी भाषा सीखने के चक्कर में समय का भी खूब अपव्यय करवाता है । शोध की भाषा भी अंतिम रूप से एक मानक भाषा ही है जो पता नही कब विकसित हुई और कब तक चलती रहेगी । भाषा यदि वैल्यू , जजमेंट आदि से निरपेक्ष हो तो हर भाषा शोध को आगे बढ़ाने में सक्षम है । यहाँ एक बात यह भी गौर करने की है आज के बड़े बड़े आलोचकों की भाषा इस वैल्यू और जजमेंट से निरपेक्ष नहीं है । उनकी भाषा एक वाग्जाल है जहां बड़े बड़े शब्द तो हैं पर वे शब्द विश्लेषण से ज्यादा निर्णयपरक  हैं ।

बहरहाल बात आरंभ रेणु की रचना रसप्रिया से हुई थी और कहा ये गया था कि साहित्य की आलोचना में ज्यादा ज़ोर मानकीकरण  पर रहता है । उससे हल्का सा विचलन भी साहित्य में उसकी स्थिति को दायरे में बांधता है । इसी वजह से एक प्रवृती देखी  न देखी किसी न किसी खांचे में डाल दिया । प्रवृत्तियों के आधार पर साहित्य की खांचेबंदी कोई नई बात नही है और यह कोई देशीय प्रवृत्ति हो ऐसा भी नहीं है । यह दरअसल औपनिवेशिक आलोचना पद्धति है । इसमें कुछ वैज्ञानिक तत्वों को समाहित कर यह दावा कर लिया गया कि यह वैज्ञानिक आलोचना पद्धति हो गयी । जबकि यह वैज्ञानिकता भी पश्चिमी आभिजात्य का अनुकरण है । भारत में यह अनुकरण लंबे समय तक रहे विदेशियों के सहचरी के कारण संभव हुआ । हिन्दी साहित्य में चल रही अधिकांश आलोचना पद्धति किसी न किसी तय आधार के तौर- तरीकों पर ही चल रही है । जिससे आलोचना पर उन आदर्शों का लगातार हावी रहना और साहित्य पर आँका दबाव बना रहना जारी रहता है । यह प्रवृत्ति साहित्य को विशेषीकृत करती है और साधारण रूप से यह आम और साहित्यिक का विभाजन खड़ा करता है । साहित्य इन से एक वर्गीय चेतना निर्मित कर देता है जो स्वयं साहित्य के उद्देश्यों के अनुकूल नहीं है ।

रसप्रिया संदर्भ :

यह कहानी भारतीय जातीय संरचना को समझने के लिए एक औज़ार हो सकती है । हालांकि इसको समझने के लिए साहित्य में अन्य कहानियाँ हैं परंतु इसका जिक्र इसलिए क्योंकि यह कहानी केवल जातीय समझ नहीं देती बल्कि इसके माध्यम से पता चलता है कि कहानी उत्तर बिहार में कहीं घटित हुई है । दावे के साथ कहा जा सकता है कि इस  भाषा और संदर्भों को न समझने वाला व्यक्ति भी कह देगा कि यह बिहार में कहीं घटित कहानी है । इसका कारण यह है कि हमारी आलोचना पद्धति  ने हमे इस तरह तैयार किया है कि हम आँख मूँद कर रचनाकारों की कहानियों का मजमून बता सकते हैं । इस पद्धति ने परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों को  बड़ा फायदा  पहुंचाया ।
कहानी का प्रधान चरित्र 'पंचकौड़ी' मिरदँगिया एक बच्चे को बेटा कहते कहते रुक जाता है उसे याद आता है कि किसी और स्थान पर एक ब्राह्मण के बच्चे को उसने बेटा कह दिया था तो गाँव के लड़कों ने उसे घेरकर मारने की पूरी तैयारी कर ली थी ।
तथाकथित जातीय श्रेष्ठता ने एक ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है जहां पर अनुभव और ज्ञान संदर्भ से परे हो जाते हैं । रेणु जब ऐसा लिख रहे हैं तब से आज तक के समय में लगभग चालीस साल का अंतर है लेकिन यह आज भी बड़ी सामनी घटना लगती है । जातीय भेदभाव को आज भी उसी गहराई के साथ देखा जा सकता जो काफी पहले था । पहले यह वर्चस्व से जुड़ा था और आज यह बदलकर राजनीतिक हो गया है । लेकिन तात्विक रूप में आज भी यह 'उच्च' से 'निम्न' की ओर घृणा के रूप में आज भी जीवित है । इसमें मुसलमानों के प्रति घृणा और शामिल हो गयी है ।

रेणु लिखते हैं -
        गाँव के लड़के मिरदँगिया को घेर कर कहते हैं  'बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा ? मारो साले बुड्ढे को ! मृदंग को फोड़ दो !'
जातीय समीकरण को बरकरार रखने का आजमाया हुआ तरीका कि जिसने भी इस व्यवस्था को तोड़ने की कोशिश की उसे हानि पनहुचायी जाए । हानि का असर उसे बार बार अपने कार्य की याद दिलाता रहेगा और दूसरों के लिए एक सबक का काम भी करेगा ।  हानि को ज्यादा असरकारक बनाने के लिए उसके रोजगार के साधन मृदंग को फोड़ देने की बात की जाती है । हालांकि यह कहानी आगे प्यार और धोखे से भी जुड़ती है तथा खत्म होती लोक कला भी प्रकारांतर से इसमें आती है लेकिन यहाँ केवल जातीय पक्ष को देखा गया है ।

यह कहानी अपने संदर्भों में आज भी जिंदा है... वर्तमान उत्तर बिहार में जातीय संरचना राजनीति के ढांचे को आधार देने का कार्य कर रही है । इस पर बहुत लिखा पढ़ा जा चुका है । देखने की जरूरत ये है कि यह समाज को किस तरह से प्रभावित कर चुकी है । अब जतियों की पहचान राजनीतिक दलों के साथ होने और न होने से है और हर चुनाव के बाद प्रभावकारी जाती का बदल जाना और नहीं बदलना ही केंद्र में रहने लगा है । अब छठ में होने वाले नाटक में किस जाती के लड़के कुर्सी पर बैठ कर नाटक देखेंगे और दारू पी कर हँगामा करेंगे ये भी चुनाव से तय होने लगा  है । रेणु नहीं हैं साहित्य में पर जातीयता है ही ... उनकी कहानियों में जो आया आया अब नए संदर्भों में कहानियाँ लिखने का समय है ।    

1 टिप्पणी:

  1. बेनामी6/1/13

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