फ़रवरी 20, 2013

आज की बात


शाम की हवा यूं मचलती है कि अपनी कुव्वत भर मन रोमचित हो उठता है । फिर बात तेजी से लहराते नारियल के पत्तों तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि पहाड़ी रास्ते पर दूर किसी गाड़ी की आवाज़ भी लहराती मालूम पड़ती है । दिन कितना भी गरम क्यों न हो शाम किसी भी अवसाद की गिरफ़्त में आने नहीं देती । इसका चेहरा बनाया जाए तो वह हवा की तेज़ लहरों से ही बनेगा । तेजी से बंता बिगड़ता शाम का चेहरा ! ये बनना - बिगाड़ना इतना तेज है कि , बिगड़ने का सहज एहसास भी नही होता ठीक हमारे ऊपर के होठ की सतह पर बहती गरम हवा सा । शाम की नज़र ज्यों ज्यों ऊपर जाती है सूरज वहाँ टीका मालूम होता है । वह पहाड़ी की चोटी पर अपनी रोशनी फेंकता हुआ अंतिम तसल्ली लेता है कि मैं हूँ अभी पर हवा , मन और शाम में से किसी को उसकी परवाह नहीं ! उसकी क्यों किसी की परवाह नहीं क्योंकि सब अभी तो अपने अपने से बाहर हैं सबसे मिले हुए ।

चाँद दिखे न दिखे ये पहाड़ चारों  ओर अपनी दीवार बनाए हुए हैं एक दूसरे के हाथ थामे से । दूर उस पर उठता धुआँ कभी कभी यह धोखा भी देता है कि वहाँ ऊपर बहुत बड़े लोगों ने बड़ी सी हांडी में कुछ पकाने उपक्रम किया हो । जब धुआँ ऊपर काले पहाड़ों की बस्ती से अपने कई ठिकाने बताता है तो लगता है उन सभी बड़े से लोगों ने किन्हीं और बड़े लोगों के समूह को न्योता दिया है । और मोटाते अंधेरे में जब देखो तो पहाड़ पर एक मोती रेखा दिखाई देती है - लाल लाल । इतना लाल जैसे भोर का सूरज ! उस रेखा को छू लेने का मन करे और उस पर चलने का भी । पर नहीं ! जरा गौर से देखो वे लपटें यहीं से दिखाई देती हैं । तो ये पहाड़ की काली बाँहों पर आग की लाल लाल लपटें हैं । सबकुछ कितना अलग लगता है एक मैदानी आदमी को । लेकिन उसे अनोखा लगने से ये चलन तो बदल  जाएगा । यह तो हर साल होता है जब फरवरी की गरमियाँ शुरू होती हैं तो बांस , पेड़ या सूखे पत्ते आपस में रगड़ खा कर सुलग उठते है और धीरे धीरे जमता है पहाड़ पर लाल लाल लपटों का एक रेखीय तिलिस्म । यूं तो ऐसा भी है कि ऊपर लकड़ियाँ हैं बेशकीमती जो तस्करों का निशाना  बनती हैं फिर किसी को शुबहा न हो सो फूँक दिये जाते हैं बाकी के झाड-झंखाड़ । आगे हाथी मरा भी तो नौ लाख का ! जली हुई लकड़ियाँ एक बेहतर कोयला बन जाती हैं और चुन कर बेच दी जाती हैं उनको जिनका घर कई तरह से निर्भर है इन मोटे पहाड़ों पर ।

सुबह के सपनों को हल्की ठंडक झकझोरती है फिर पायताने से कब का नीचे गिर चुकी चादर याद आती
  है और शुरू होती है सपनों को वापस पकड़ने की दौड़ ! हर बार सपना ही जीतता है । आज नींद तब खुली जब बारिश ने सपने  को छलनी कर दिया  । जर्जर सपने को जहां से पकड़ो वहीं से भसक जाते । ये अब तक की थी तो दूसरी बारिश पहली धारासार बिलकुल आषाढ़ के दिनों सी । होते होंगे आषाढ़ के दिन अन्यत्र पर यहाँ तो यह फागुन का सच है । सुना है जब कहीं काल बैशाखी का तांडव हो रहा हो तो यहाँ वर्षा रानी का गंभीर नृत्य होता है चहुं ओर लहलहाती हरियाली के बीच ! बारिश ने अवकाश दिया है तो भाग भाग के अपने काम कर लो नहीं तो एक छाता खरीद कर उसे अपने शरीर का एक हिस्सा बना लो शाम के टॉर्च की तरह क्योंकि , यहाँ की बारिश और साँप दोनों जोरदार होते हैं ! बाहर जो पहाड़ खड़े हैं उनसे मोटी भाप उठ रही है झक सफ़ेद और धार्मिक धारावाहिकों में दिखाये गए स्वर्ग के दृश्यों की झलक से । चारों ओर उठती सफ़ेद भाप उन काली लकड़ियों की निःश्वास हैं जिन पर कुछ घंटे पहले लाल लाल लपटें नृत्य कर रही थी रेंग रेंग कर , एक दूसरे से लिपटे हुए । उन लपटों की प्यास का पानी  मिल चुका था इसके बाद भी बहुत सा पानी बच ही रहा है । वह देखिये शुरू हो गया है बारिश के दिनों में दिखने वाला 'वॉटर फॉल' । उस ऊंचाई से गिरते पानी की आवाज़ इतनी दूर नहीं आती पर उसका झाग , उसके छींटे मन पर पड़ रहे हैं।
         
पहाड़ी इलाके जितने ऊंचे होते हैं सड़कें उतनी ही पतली जैसे एक मोटी रस्सी को पहाड़ के गिर्द कस दिया गया हो । किसी ऊंची जगह से देखें तो उस पर चलने वाली गाडियाँ रस्सी पर रेंगती चींटियों की कतार सी लगेंगी पर असल में ये गाडियाँ बहुत तेज़ भागती हैं । जैसे रोज़ रोज़ बजने से हॉर्न  के गले फट गए हों वैसी आवाजें निकालती पीछे से डराती  निकल जाती हैं । दूर से ही वो पुल दिख जाता है । नीचे नदी है । पुल से नदी और आस पास के पहाड़ों का सौंदर्य हरियाली , पानी और धूप की चमक से बनता है । तभी पैरों को महसूस होती है पुल की धड़कन जो किसी भरी वाहन के गुजरने से तेज हो जाती है । पुल का दूसरा सिरा जैसे किसी गुफा में छोडता हो । उस ओर अंधेरा बहुत है । नदी किनारे के लंबे ऊँघते पेड़ों से लिपटी लताओं का मोटा और उलझा ताना - बाना सूरज की किरणों की कड़ी परीक्षा लेता जान पड़ता है तभी तो वे सब सुस्ता रही हैं । दायीं ओर थोड़ी सफाई है या कहिए तो एक चमचमाती सड़क है पर दोनों ओर वही जंगल और उसकी वजह से अंधेरा । इक्का दुक्का मोटर साइकिल सवार । इस क्षण गाय के रंभाने की भी आवाज़ हो तो हाथी की चिंघाड़ सी लगती है । इधर जंगली हाथी हैं । उस दिन देखा था एक को बहुत तेज़ी से सड़क पार करते हुए । इस सड़क पर लंबी दूरी तक बढ्ने का अपना मोह है पर बहुत सारा साहस भी कम पड़ जाता है । किसी जंगली फूल और काजू के पके फलों की मादक महक हो और सहसा नीचे से ऊपर आता हुआ बहुत लंबा टेक (सागवान) का पेड़ फिर उस जैसे पचासियों । उनमें चेहरे उभरने लगते हैं । वहाँ लगता है कोई तिलिस्म है जो अपने आस पास बना हो ।

वापसी का अंधेरा कई जीवों की आवाज से भरा है । ये इतने छोटे होते हैं पर इनकी तेज़ आवाज़ तो सुनिए ... । ये यहाँ बचे रहेंगे । आगे इनकी पीढ़ियाँ भी बची रहें क्योंकि , शहर को बसने - बढ्ने के लिए जो साजो सामान चाहिए वो यहाँ कम हैं । घर बनाने के लिए पैसे जुटाने से ज्यादा कठिन है यहाँ बालू जुटाना । कहते हैं यहाँ के साँप बहुत पतले होते हैं पर उससे भी ज्यादा जहरीले । डँसा नहीं कि निपट गए । वो तो ठीक है पर ये पतला साँप जब एक मेंढक खा ले तो कैसा लगेगा ?

फ़रवरी 19, 2013

अपनी तरह का नहीं पर ...


हर जगह का अपना स्वाद होता है यह उसकी हवा और वहाँ के खाने तक में पता चलता है । जाहीर है ये सब उसके वातावरण और उपलब्ध संसाधन पर ही आधारित होगा । फल ज्यादा पैदा होते हों तो खाने में फल की प्रधानता और यदि सूखे अन्न ज्यादा हुए तो उसके विभिन्न रूप मिल जाते हैं । यही हाल कुछ अनाजों की कमी को लेकर भी है जैसे राजस्थान में धन की न्यूनतम उपलब्धता के कारण वहाँ छठे-छमासे चावल खाया जाता है । मेरे कम से कम दो दोस्त हैं जो जो मेरी रसोई में चावल खाने से पहले दो बार कह चुके हैं कि उनके यहाँ चावल तीज-त्योहारों पर ही खाया जाता है ।और वह भी इस तरह नहीं कि पनि में उबाल कर भात बना लिया बल्कि कायदे से दूध चीनी डालकर चावल को पकाया जाता है ।
            पिछले कुछ दिनों से केरल में हूँ । जब दिल्ली में था तो नितांत उत्तर भारतीय खाना और अब हबकी यहाँ हूँ तो विशुद्ध दक्षिण भारतीय व्यवस्था । यहाँ चावल ज्यादा है , नारियल ज्यादा है साथ ही मसाले ज्यादा हैं । जो काली मिर्च देश के उत्तर में इतनी विशिष्ट है उसकी लता यहाँ किसी भी पेड़ के तने पर चतरी मिलेगी यही हाल लोंग और इलायची का भी है । हाँ तेजपत्ते के पेड़ तो बिहार में भी देखे हैं । यहाँ रहते हुए अभी महीना भी नहीं लगा है सो खाने –पीने में एक समंजस्य बनाने जैसा पहला और महत्वपूर्ण काम निरंतर चल रहा है । पहला इसलिए कि हवाई अड्डे से जब टॅक्सी ली थी तभी अंदाज़ा हो गया था कि खाने के समय तक पहुंच ही जाऊंगा और हुआ भी ऐसा ही । इस संस्था के भीतर आकर जो पहला काम किया वह था भोजन । उबले मोटे चावल की भात (चौर ), सोयाबीन जैसे किसी अनाज की मसालेदार घूघनी , केले की भुजीया और सांभर । दिल्ली की बात छोड़ दें तो बिहार में हम अधिकतर ऐसा ही चावल प्रयोग में लाते हैं जिसे उसना चावल कहा जाता है । उसना इस लिए क्योंकि धान को उसनने (उबालने) के बाद सूखाकर चावल निकाला जाता है । सांभर का मसला वैसा ही है जैसा उत्तर भारत की कोई बहुत रस वाली तरकारी हो । जो सांभर यहाँ मिलते हैं उनमे दाल नहीं होती है सब्जी और मसालों से ही ये तैयार होती है । सो चावल और सांभर से लगभग परिचय था ही । सामने थी दो बिलकुल नयी चीजें – सोयाबीन के आकार वाले किसी अनाज की घूघनी और केले की भुजीया । भुजिया भी ऐसी कि केले का छिलका उतारे बिना ही उसे काट दिया गया था । उस अजीब स्वाद वाली घूघनी और भुजिया को किसी भांति भीतर ठूँसा पर चौर और सांभर नाद तक चांप दिया । अब बारी थी पीने के पानी की । गरम पानी मिला पीने को वह भी हल्की लालिमा के साथ । स्वाद में कोई अंतर नहीं था पर गरम और हल्का लाल पानी ? पुछने पर पता चला कि पानी को एक पेड़ पदीमुखम की छाल के साथ उबाला जाता है जिससे उसमें मौजूद अशुद्धियाँ समाप्त हो जाती हैं उस पेड़ की छाल के कारण ही इसका रंग लाल हो जाता है । यह पूरी प्रक्रिया एक आयुर्वेदिक प्रक्रिया है ।
 अगले दिन सुबह के नाश्ते पर मैस पहुंचा तो तसले में सफ़ेद सा पाउडर और केले के गुच्छे रखे थे । वह सफ़ेद चूर्ण पुट्ट कहलाता है । पुट्ट को चावल से तैयार किया जाता है । चावल और कच्चे नारियल को दरदरा पीस कर बांस की पाइप में भरकर भाप से पकाया जाता है । एक सहकर्मी ने बताया कि , इसे फिश करी या किसी भी नॉन-वेज करी के साथ खाया जाए तो बहुत मजा आता है । बहरहाल वहाँ केले को पुट्ट में मथ के खा लिया स्वाद ठीक ही था । आगे दोपहर के खाने में पुनः सांभर चावल साथ में नारियल की भुजिया ।  चावल के अलावा हरेक व्यंजन में करी पत्ता । रात के खाने में भी चावल सांभर । बस भुजिया और सुखी सब्जी बदलती रही ।
    चावल सांभर यहाँ मेरा प्रधान आहार है कभी कभी कढ़ी मिल जाती है पर यहाँ की कढ़ी अपनी प्रकृति में पतली है और स्वाद में खट्टी । सारी बातों का निचोड़ इस बात में कि मुख्य भोजन को लेकर कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही बस लगातार चावल खाने की एक नयी व्यवस्था में ढलने की प्रक्रिया जारी है ।
         ये बात ठीक है कि यहाँ का खाना मेरी जीभ पर चढ़े स्वाद के अनुरूप नहीं है पर खाना खिलाते हुए लोगों के चेहरे पर जो भाव देखता हूँ वह मेरी रुचि और बढ़ा देता  है फिर कोई स्वाद न भी जंच रहा हो तो चेहरे से ज़ाहिर नहीं होने देता । यहाँ लोगों को लगता है कि मुझे यहाँ का खाना रास नहीं आ रहा होगा । उनके चेहरों को देखकर लगता है कि जब तक मैं खाता हूँ तब तक वे इस अपराधबोध में रहते हैं कि मुझे उत्तर भारतीय प्रकार का खाना उपलब्ध नहीं पा रहे हैं । दिन भर में मुझे खाने को लेकर 4-5 बार तो पूछा जाता ही है और हर बार पूछने वाले एक प्रकार की निरीहता होती है पूछने वाले के चेहरे पर । जबकि मैं कई बार बता चुका हूँ कि मुझे उत्तर भारतीय खाना मिलता तो वह बढ़िया बात होती पर मैं इन व्यंजनों से भी अपरिचित नहीं हूँ और इनमें भी स्वाद है । और ये मेरी जरूरत है कि मैं अपनी स्वाद इंद्रीयों को इनके लिए तैयार करूँ ।
  यहाँ जब खाने के बारे में कई बार पूछा जाता है तो मुझे उत्तर भारत याद आता है जहां हम किसी दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर से आए लोगों से यह पूछने तक की जहमत नहीं उठाते कि उन्हें वहाँ का खाना कैसा लग रहा है । मेरे कई मित्र हैं जो उत्तर भारत के नहीं हैं दिल्ली में रहते हुए मैंने उनसे कभी इस तरह के सवाल नहीं किए ऊपर से राजस्थान के जिन दो मित्रों का जिक्र ऊपर किया है उनसे , उनकी खाने संबंधी भिन्नता को जानते हुए भी कई बार चावल खाने का दबाव बनाया क्योंकि वह पकाने में आसान होता है ।
  खान पान को लेकर हम उत्तर भारत में कितनी तसल्ली में जीते हैं कि खाना ही तो है पसंद आएगा ही । हो सकता है कि मैं इस तरह से एक सरलीकरण की जल्दबाज़ी कर रहा हूँ पर पिछले दस सालों से दिल्ली में रहते हुए अपने किसी गैर उत्तर भारतीय की खान – पान संबंधी सुविधा का ख्याल नहीं किया और न ही अपने आस पास के लोगों को करता पाया । ऐसी संभावना है कि , कुछ लोग इस बात का ख्याल रखते भी होंगे पर दस साल के दौरान का आसपास भी एक विस्तृत आसपास होता है वह भी दिल्ली जैसे महानगर में जिसमें ऐसे लोग नही टकराए ।
बहरहाल यहाँ जो मछली मैस में खाने को मिली उसे खाकर तो मछली से विरक्ति हो जाए और कम से कम यह बात तो टी हो गयी कि मैं मैस की मछली नहीं खाऊँगा । अब तक जो मछली खाई थी वह झोर में डालने से पहले तली जाती थी पर यहाँ तो बिना तले ही किसी सब्जी की तरह पका दी गयी ढेर सारे साबुत मसलों के साथ ।
यहाँ के खाने में चावल , नारियल आदि की ही तरह विभिन्न मसले ठीकठाक मात्रा में प्रयोग किए जाते हैं । मसालों की इतनी मात्रा का प्रयोग यदि अन्यत्र किया जाए तो बीमार होने की तैयारी मानी जाएगी । पर राहत की बात ये है कि ये मसाले साबुत प्रयोग किए जाते हैं ताकि उसके गुण व्यंजन में और बाकी पदार्थ आप निकाल सकें -सार सार को गही रही , थोथा देत उड़ाय
सप्ताह में एक बार रोटी जैसी चीज भी मिलती है । रोटी जैसी इसलिए कि वह तेल या घी के साथ पकाई जाती है दूसरे उसके फूलने जैसा कुछ पता नहीं चलता । यहाँ ताज़ी, रसीली और कुरकुरी जलेबी नहीं मिलती । पता करते करते पाया कि फ्रिज में पैकेट में बंद इमरती मिल रही है जिसके भीतर के रस ने चीनी के दानों की शक्ल ले ली है । 

फ़रवरी 10, 2013

तीन याद कवितायें


                                                         कुछ याद कवितायें

1
एक शाम का धीरे धीरे गिरना
हवा में नारियल तेल के जलने की गंध
कम होती रोशनी में भी चमकता लाल फूल
यहीं देखा है -उन आँखों सा सुंदर ...
पेरियार के किनारे बार बार जाना
उस भरपूर साथ की नरमी जैसा है
सीढ़ियाँ चढ़ते -उतरते
शाम की हवा
कानों पर तुम्हारी हल्की फूँक सी
गुदगुदी वापस भर देती है
नजरें टिक जाती है नदी के बदन पर
उम्मीद में
तुम आओगी नदी के रास्ते ही
अभी अभी नहाकर निकली सी
यह चमत्कार अब तक नहीं हुआ
वापसी में कदम सुस्त ही होते हैं .....

2
यह मैदान में पड़ी एक रात है
पीछे स्कूल की पीली-सरकारी-मातमी रोशनी
उससे भागना इसलिए भी जरूरी था कि
उसमें दम  तोड़ती है मुस्कान ,
वहाँ किसी की याद नहीं आती

अंधेरा वो रस्ता है
जहां तुम्हें रोक सकता हूँ
कह सकता हूँ - दो-चार कदम और चलो
फिर थाम लूँगा तुम्हारे कदम
 कुछ पोशीदा बातों के बाद
तुम्हारी वापसी का रस्ता यही होगा

मालूम है ये अंधेरा भी धोखा है
पर ये सच है
अबकी मिलेंगे तो
कुछ यूं भी मिलेंगे हम -
रोशनी में छिपकर , अंधेरे में खुलकर ...

3
शब्दों की धार के बीच हमतुम
डूबते से बहे जा रहे हैं
जैसे साँप से खेलता बच्चा
ये जो इतने चेहरे हैं
सब पर दिखता है
तुम्हारे चेहरे की छांह और
होठों का गहरा रंग
जल्द से जल्द छीन लेने का अधैर्य
बावजूद इसके
पलकें, तुम्हारी  पलकों पर ही
गिरकर लेती है एक भरपूर आराम ... ।

तुम कहती हो ' अभी नहीं एक और कोशिश करेंगे '
पीछे के लोग पीछे हैं पर ठहरे तो नहीं
आखिर तुम भी इसी देश में हो
जहां लड़कियां बैंक में बड़ी होती हैं

शहर छोडने से पहले
मिलना चाहिए था तुमसे
इसे समय पर छोडते छोडते
टालते जाने की आदत बन गयी है मेरी
अपने दरम्यान
कितनी डरपोक कमजोरियाँ है
जो लाचार कर जाती हैं ....

फ़रवरी 06, 2013

ये रहस्यमय जगह


जो भी रंग है यहाँ वो गहरा है .... पेड़ों की हरियाली से लेकर लोगों के चेहरों और चमड़े के रंग तक में ये गहराई देखी जा सकती है ! इस गाढ़ेपन ने इस इलाके को एक अलग पहचान दी है मेरी नजर में इसकी यह पहचान है इसके चप्पे चप्पे का रहस्यमय होना एक तरह से हर कोई रहस्य में जी रहा सा लगता है कभी कभी तो बाहर रह रहे लोग भी एक -दूसरे से अंजान बने से खड़े रहते हैं अपने इलाके की तरह भरपूर बातचीत करते कभी नहीं देखा किसी को सड़क पर यूं तो ये एक कस्बा ही है या उससे भी छोटा ही होगा पर यहाँ लोगों को महानगरों की तरह के अजनबी पने में जीते देख रहा हूँ इतनी बड़ी जगह के लिए फिल्म मालामाल वीकली का संवाद याद जाता 'मुंह में रखे तंबाकू भर का तो गाँव है अपना ' लेकिन यहाँ बहुतों को सारी जगहों का नहीं पता एक बार को ये मान भी लेता कि भाषा समझ पाने के कारण ऐसा हो रहा होगा लेकिन जब एक सहकर्मी के साथ बाहर गया तब भी यही आलम था जबकि सहकर्मी सिर्फ केरल के हैं बल्कि वो बकायदा मलयालम के ही अध्यापक हैं बहरहाल बहुत सी पूछताछ के बाद ही जरूरी जगहों तक पहुँच पता हूँ यहाँ और इसमे भाषा की कोई भूमिका इसलिए नहीं मानता क्योंकि ज़्यादातर लोग हिन्दी बोल भले ही पाएँ पर समझ जरूर लेते हैं दूसरे अङ्ग्रेज़ी को भी किसी ने खा नहीं लिया है ये जगह मुझे ऐसे लोगों से भरी लगती है जो अपने में मगन हैं बिना किसी उत्तर भारत सुलभ अतिरिक्त उत्साह के यहाँ देखता हूँ लोग बस के इंतजार में खड़े रहते हैं चुपचाप , बस आती है और उसमें घुस कर चल देते हैं जबकि उधर तो कितने ही किस्से बसों में चढ़ने से पहले हो जाते हैं और दिल्ली की बसों में तो देश भर के किस्से चलते रहते हैं
अपने रहस्यमयी आवरण के बावजूद ये जगह मुझे डराती नहीं है कि मैं यहाँ अकेला रहता हूँ या कि कभी घूमते घूमते दूर निकाल गया तो ये नहीं लगता कि अब क्या होगा जबकि मुख्य सड़क के दोनों ओर ठीकठाक घने जंगल हैं पर अबतक उन जंगलों की खूबसूरती ही देखी है इस जगह के बहुत से हिस्से को अब जानने लगा हूँ लेकिन जैसे ही मैं ये सोचता हूँ कि ये कस्बा नए रंग दिखा देता है आज ही की तो बात है किसी ने बताया कि आगे चलते जाओ एक किलोमीटर के बाद नदी आएगी एक क्या उससे लगभग तिगुनी दूरी तय कर ली फिर भी नदी नहीं आई लेकिन रास्ते भर की बेहतरीन खूबसूरती ने मन को ऐसा सम्मोहित सा कर दिया था कि वापस लौटने का मन ही कर रहा था छोटे से लेकर ताड़ के पेड़ की तरह सर उठाए नारियल के पेड़ , नीचे केले के नए पत्ते फिर किसी गिरिजाघर में लगे विदेशी फूल की छटा , पहाड़ी से ताकते बादलों के टुकड़े उन पर डूबते सूरज की लाल किरण के साथ अरब सागर की ओर से आती हवा आदि मिलकर जो रोमांच पैदा कर रहे थे वह इस जगह को और रहस्यमय कर देने के लिए काफी था जिसका सम्मोहन कभी खत्म हो
यहाँ आने से पहले भाषा को लेकर एक बड़ा सवाल मेरे मन बराबर बना था माना कि केरल अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह नहीं है बल्कि अपेक्षाकृत उन्मुक्त है पर उस कस्बे 'नेरीयमंगलम ' के लोग इस मामले में दुराग्रही हुए तो ? पर यह स्थान देश के किसी भी ऐसे स्थान की तरह है जहां हिन्दी को समझ लेने वालों की संख्या बहुतायत में है कुछ ऐसे भी लोग हैं जो हिन्दी समझ भी नहीं सकते पर भाव समझाने में कोई कसर नहीं छोडते ऐसे लोगों में हमारे गार्ड साहब भी शामिल हैं जो मलयालम में ही समझा गए कि मैंने जो नया सिम कार्ड लिया है उसके मुताल्लिक फोन कंपनी का फोन आया था ऐसी ही स्थिति उस किराने की दुकान वाली बुढ़िया की भी है जो हमारे रहने के स्थान के पिछवाड़े में अपनी दुकान चलाती है उसकी दुकान उसकी ही तरह जीर्ण-शीर्ण हो चली है और वहाँ कुछ सामानों का मिल जाना चमत्कार से कम नहीं है मैं जब वहाँ पहुंचा तो दुकान खाली थी मैंने इधर उधर देखा तो कहीं से एक अजीब सी आवाज आई और उसके बाद जो आकृति प्रकट हुई उसे देखकर डर के भागने का मन कर गया एक तो अजीब सी बूढ़ी फिर उसकी डरावनी आवाज तीसरे केवल मलयालम वाली किसी तरह छू -छू कर मैंने सामान बताए जब मूल्य की बात आई तो हम दोनों की स्थिति हास्यास्पद हो गयी किसी तरह उस वृदधा ने मुझे समझा दिया कि जो सामान लिया है वो कितने रुपयों का है पूरा हिसाब समझाने के बाद उसके चेहरे पर जो खुशी थी उसे किसी भी तरह से बता पाना कठिन है अब याद आया ! मेरे पास तो कैमरा भी था मैं उसकी एक तस्वीर तो ले ही सकता था
इस कस्बे से शहर को निकलो तो भी बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो पीछा नहीं छोडती मसलन पसीना छुड़ा देने वाली धूप , उसी तरह के चुप्पा लोग और गहरा रहस्य खूबसूरत  हरियाली भी साथ ही चलती है शहर के बहुत पहले से ही सोने के आभूषण बनाने वाली कंपनियों के विज्ञापन शुरू हो जाते हैं उसके बाद गौर किया तो देखा स्त्रियाँ ठीकठाक सोना पहन कर घर से निकलती हैं ।शहर में हर तीसरी  दुकान सोने की है लोगों से बात करने पर पता चला कि यहाँ से बहुत से लोग खड़ी देशों में काम करने जाते हैं और वहाँ से जब वो पैसे भेजते हैं तो खर्चा - पानी काट के जो पैसे बचते हैं परिवार वाले उसका सोना खरीदते हैं अभी परसों ही तो बी बी सी पर पढ़ा था कि केरल में कितनी ही महिलाएं शादीशुदा होते हुए भी विधवा सा जीवन जी रहीं हैं और इसने कई मानसिक बीमारियाँ पैदा कर दी हैं कुछ पुरुषों के भी साक्षात्कार थे जो कह रहे थे कि घर आने पर उनके बच्चे उन्हें नहीं पहचानते हैं कितना मार्मिक सा लगता है ये सोना इसके बाद ! सड़क , बस अड्डे और बसों में बहुत से लोग लॉटरी का टिकट बेच रहे थे जिस बस में मैं था उसमें कई लोगों ने उन्हें खरीदा भी इस भौगोलिक खूबसूरती , सोने की दुकानें , खाड़ी देशों में गए लोग और अमीर बन जाने की चाहत में लॉटरी के टिकट खरीद रहे लोग केरल की वही छवि नहीं रहने देते जो मैं ले के आया था फिर नेरियामंगलम के लोगों में व्याप्त आपसी अपरिचय कुछ समझ में आता हुआ सा प्रतीत होता है , ये सब अनायास नहीं लगता   
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