फ़रवरी 06, 2013

ये रहस्यमय जगह


जो भी रंग है यहाँ वो गहरा है .... पेड़ों की हरियाली से लेकर लोगों के चेहरों और चमड़े के रंग तक में ये गहराई देखी जा सकती है ! इस गाढ़ेपन ने इस इलाके को एक अलग पहचान दी है मेरी नजर में इसकी यह पहचान है इसके चप्पे चप्पे का रहस्यमय होना एक तरह से हर कोई रहस्य में जी रहा सा लगता है कभी कभी तो बाहर रह रहे लोग भी एक -दूसरे से अंजान बने से खड़े रहते हैं अपने इलाके की तरह भरपूर बातचीत करते कभी नहीं देखा किसी को सड़क पर यूं तो ये एक कस्बा ही है या उससे भी छोटा ही होगा पर यहाँ लोगों को महानगरों की तरह के अजनबी पने में जीते देख रहा हूँ इतनी बड़ी जगह के लिए फिल्म मालामाल वीकली का संवाद याद जाता 'मुंह में रखे तंबाकू भर का तो गाँव है अपना ' लेकिन यहाँ बहुतों को सारी जगहों का नहीं पता एक बार को ये मान भी लेता कि भाषा समझ पाने के कारण ऐसा हो रहा होगा लेकिन जब एक सहकर्मी के साथ बाहर गया तब भी यही आलम था जबकि सहकर्मी सिर्फ केरल के हैं बल्कि वो बकायदा मलयालम के ही अध्यापक हैं बहरहाल बहुत सी पूछताछ के बाद ही जरूरी जगहों तक पहुँच पता हूँ यहाँ और इसमे भाषा की कोई भूमिका इसलिए नहीं मानता क्योंकि ज़्यादातर लोग हिन्दी बोल भले ही पाएँ पर समझ जरूर लेते हैं दूसरे अङ्ग्रेज़ी को भी किसी ने खा नहीं लिया है ये जगह मुझे ऐसे लोगों से भरी लगती है जो अपने में मगन हैं बिना किसी उत्तर भारत सुलभ अतिरिक्त उत्साह के यहाँ देखता हूँ लोग बस के इंतजार में खड़े रहते हैं चुपचाप , बस आती है और उसमें घुस कर चल देते हैं जबकि उधर तो कितने ही किस्से बसों में चढ़ने से पहले हो जाते हैं और दिल्ली की बसों में तो देश भर के किस्से चलते रहते हैं
अपने रहस्यमयी आवरण के बावजूद ये जगह मुझे डराती नहीं है कि मैं यहाँ अकेला रहता हूँ या कि कभी घूमते घूमते दूर निकाल गया तो ये नहीं लगता कि अब क्या होगा जबकि मुख्य सड़क के दोनों ओर ठीकठाक घने जंगल हैं पर अबतक उन जंगलों की खूबसूरती ही देखी है इस जगह के बहुत से हिस्से को अब जानने लगा हूँ लेकिन जैसे ही मैं ये सोचता हूँ कि ये कस्बा नए रंग दिखा देता है आज ही की तो बात है किसी ने बताया कि आगे चलते जाओ एक किलोमीटर के बाद नदी आएगी एक क्या उससे लगभग तिगुनी दूरी तय कर ली फिर भी नदी नहीं आई लेकिन रास्ते भर की बेहतरीन खूबसूरती ने मन को ऐसा सम्मोहित सा कर दिया था कि वापस लौटने का मन ही कर रहा था छोटे से लेकर ताड़ के पेड़ की तरह सर उठाए नारियल के पेड़ , नीचे केले के नए पत्ते फिर किसी गिरिजाघर में लगे विदेशी फूल की छटा , पहाड़ी से ताकते बादलों के टुकड़े उन पर डूबते सूरज की लाल किरण के साथ अरब सागर की ओर से आती हवा आदि मिलकर जो रोमांच पैदा कर रहे थे वह इस जगह को और रहस्यमय कर देने के लिए काफी था जिसका सम्मोहन कभी खत्म हो
यहाँ आने से पहले भाषा को लेकर एक बड़ा सवाल मेरे मन बराबर बना था माना कि केरल अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों की तरह नहीं है बल्कि अपेक्षाकृत उन्मुक्त है पर उस कस्बे 'नेरीयमंगलम ' के लोग इस मामले में दुराग्रही हुए तो ? पर यह स्थान देश के किसी भी ऐसे स्थान की तरह है जहां हिन्दी को समझ लेने वालों की संख्या बहुतायत में है कुछ ऐसे भी लोग हैं जो हिन्दी समझ भी नहीं सकते पर भाव समझाने में कोई कसर नहीं छोडते ऐसे लोगों में हमारे गार्ड साहब भी शामिल हैं जो मलयालम में ही समझा गए कि मैंने जो नया सिम कार्ड लिया है उसके मुताल्लिक फोन कंपनी का फोन आया था ऐसी ही स्थिति उस किराने की दुकान वाली बुढ़िया की भी है जो हमारे रहने के स्थान के पिछवाड़े में अपनी दुकान चलाती है उसकी दुकान उसकी ही तरह जीर्ण-शीर्ण हो चली है और वहाँ कुछ सामानों का मिल जाना चमत्कार से कम नहीं है मैं जब वहाँ पहुंचा तो दुकान खाली थी मैंने इधर उधर देखा तो कहीं से एक अजीब सी आवाज आई और उसके बाद जो आकृति प्रकट हुई उसे देखकर डर के भागने का मन कर गया एक तो अजीब सी बूढ़ी फिर उसकी डरावनी आवाज तीसरे केवल मलयालम वाली किसी तरह छू -छू कर मैंने सामान बताए जब मूल्य की बात आई तो हम दोनों की स्थिति हास्यास्पद हो गयी किसी तरह उस वृदधा ने मुझे समझा दिया कि जो सामान लिया है वो कितने रुपयों का है पूरा हिसाब समझाने के बाद उसके चेहरे पर जो खुशी थी उसे किसी भी तरह से बता पाना कठिन है अब याद आया ! मेरे पास तो कैमरा भी था मैं उसकी एक तस्वीर तो ले ही सकता था
इस कस्बे से शहर को निकलो तो भी बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो पीछा नहीं छोडती मसलन पसीना छुड़ा देने वाली धूप , उसी तरह के चुप्पा लोग और गहरा रहस्य खूबसूरत  हरियाली भी साथ ही चलती है शहर के बहुत पहले से ही सोने के आभूषण बनाने वाली कंपनियों के विज्ञापन शुरू हो जाते हैं उसके बाद गौर किया तो देखा स्त्रियाँ ठीकठाक सोना पहन कर घर से निकलती हैं ।शहर में हर तीसरी  दुकान सोने की है लोगों से बात करने पर पता चला कि यहाँ से बहुत से लोग खड़ी देशों में काम करने जाते हैं और वहाँ से जब वो पैसे भेजते हैं तो खर्चा - पानी काट के जो पैसे बचते हैं परिवार वाले उसका सोना खरीदते हैं अभी परसों ही तो बी बी सी पर पढ़ा था कि केरल में कितनी ही महिलाएं शादीशुदा होते हुए भी विधवा सा जीवन जी रहीं हैं और इसने कई मानसिक बीमारियाँ पैदा कर दी हैं कुछ पुरुषों के भी साक्षात्कार थे जो कह रहे थे कि घर आने पर उनके बच्चे उन्हें नहीं पहचानते हैं कितना मार्मिक सा लगता है ये सोना इसके बाद ! सड़क , बस अड्डे और बसों में बहुत से लोग लॉटरी का टिकट बेच रहे थे जिस बस में मैं था उसमें कई लोगों ने उन्हें खरीदा भी इस भौगोलिक खूबसूरती , सोने की दुकानें , खाड़ी देशों में गए लोग और अमीर बन जाने की चाहत में लॉटरी के टिकट खरीद रहे लोग केरल की वही छवि नहीं रहने देते जो मैं ले के आया था फिर नेरियामंगलम के लोगों में व्याप्त आपसी अपरिचय कुछ समझ में आता हुआ सा प्रतीत होता है , ये सब अनायास नहीं लगता   

2 टिप्‍पणियां:

  1. चलो तुम्हाए साथ-साथ कुछ-कुछ हम भी उन जगहों को जानने लगेंगे कुछ अपरिचय तो कम होगा ही. अच्छा लगा पढ़ कर. लिखते रहो. बताते रहो..

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  2. हम तो जानने लगेंगे शचीन्द्र पर इनके आपसी संवादों की कमी उत्तर भारतीय वातावरण से बिलकुल अलग है .... जिसकी कई व्याख्या हो सकती है .... समाजशास्त्रीय भी ॥

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