मार्च 28, 2013

चिनुआ एचबे और थिंग्स फॉल अपार्ट



     
ऐसा बहुत कम होता है जब एक लेखक अपनी एक ही कृति से इस प्रभाव छोड़े कि वह आपके साथ साथ चलता हुआ सा लगे ,उस कृति में आए संदर्भों जैसा कुछ भी दिखा नहीं कि उसको उद्धृत करने को मन मचलने लगे और देखते ही देखते कृति का परिवेश , लेखक और संदर्भ बहुत परिचित से हो जाएँ । चिनुआ एचबे की कृति थिंग्स फॉल अपार्ट को पढ़कर ऐसा ही हुआ । उसके नितांत अफ्रीकी संदर्भ कब अपने हो गए इसका पता ही नहीं चला फिर ऐसा लगने लगा कि नाइजीरिया का यह लेखक सामने के घर में रहता हो । दोस्तों से बातचीत में उन दिनों ( कुछेक संदर्भों में अब भी ) आने बहाने एचबे और थिंग्स फॉल अपार्ट का नाम जरूर आता था ।
      चिनुआ ने थिंग्स फॉल अपार्ट में जिस समाज को सामने रखा वह और हमारा भारतीय समाज दोनों की बनावट कुछ मानों में बिलकुल समान है जिसने इस कृति से तत्काल जुड जाने में आधार का काम किया । साम्राज्यवाद तो ऐसा था जिसने दोनों ही समाजों को एक ही तरह से प्रभावित किया । यहाँ यह बात कहनी जरूरी है कि भारतीय उपमहाद्वीप और अफ्रीका महादेश की अपनी अपनी विशेषताएँ साम्राज्यवाद में भी अलग- अलग थी और यही हाल अलग-अलग साम्राज्यवादी देशों का भी था जो अपने-अपने तरीके से अपने उपनिवेशों का शोषण कर रहे थे । लेकिन मूल रूप में साम्राज्यवाद एक ही तरह से काम कर रहा था जिसका प्रधान कार्य था साम्राज्यवादियों का लाभ । अपनी गति से चल रहे समाज की बनावट में बाह्य तत्व के शामिल होते ही उसकी बनावट के बिखरे के इतिहास को दोनों ही दुनिया साझा करती हैं । यही स्थिति व्यापार और वाणिज्य और सामाजिक संतुलन के सिलसिले में भी है जिसके बिगड़ने की प्रक्रिया लगभग समान ही रही है । चिनुआ की इस कृति को पढ़ते हुए कभी नहीं लगता कि यह हमारे भूगोल के इतिहास का हिस्सा न हो ।
इस पुस्तक में चिनुआ जिन संदर्भों को उठाते हैं और उनका जिस तरह का प्रस्तुतीकरण है वह कभी भी इस ख्याल से बाहर आने ही नहीं देता कि हम भारत के किसी हिस्से के बारे में नहीं पढ़ रहे हैं । उदाहरण के लिए इगबो लोगों के विश्वासों को देखा जा सकता है जिसकी भाषा और भौगोलिक विशेषताओं को छोड़ दिया जाए तो वह भारतीय ग्रामीण और आदिवासी समुदाय के विश्वासों के समान ही लगता है । भारत की भाषाओं में से बहुत सारी भारोपीय परिवार की भाषाएँ हों पर हमारा सांस्कृतिक इतिहास निश्चितरुपेण यूरोपीय तौर तरीकों का नहीं है । चिनुआ , थिंग्स फॉल अपार्ट में एक मुद्रा कौरी का जिक्र करते हैं आगे वे आपसी मोल भाव के लिए कपड़े के भीतर हाथ डालकर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे की अंगुलियाँ पकड़ने के तरीके का भी जिक्र करते हैं । कहना न होगा कि ये सब भारत में भी होता था और कौरी अब भले ही मुद्रा के स्तर से अपदस्थ हो गयी हो पर कपड़े के भीतर हाथ डाल कर मोल भाव का तरीका अब भी अपने यहाँ प्रचलित हैं ।
इन तौर तरीकों और विश्वासों को समान्यतया पिछड़ेपन और अंधविश्वासों से जोड़कर देखा जाता है । उस उपन्यास में भी स्थानीयता पर श्वेतों का हमला इसी परिप्रेक्ष्य में हुआ । स्थानीयता बचाने के प्रयास में नायक और अन्य तरह के लोगों को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी । इन सबके बावजूद यदि स्थानीयता बच पाती तो बड़ी बात थी । भारत के इतिहास में ढाका के बुनकरों द्वारा अपना अंगूठा काटे जाने , ढाका और उस जैसे मुख्य केन्द्रों से उनका पलायन कर जाने से ढाका का भुतहा शहर में तब्दील हो जाने आदि की कहनियों में पूरी सच्चाई न भी हो तो तो भी इतना है ही कि अंग्रेजी शासन के अधीन बुनकरों और दस्तकारों को बहुत बड़ा आघात लगा जिससे , बंगाल का सूत उद्योग पूरी तरह नष्ट हो गया । दोनों ही महाद्वीपों के स्तर पर देखें तो हम कह सकते हैं कि इससे न केवल स्थानीयता बल्कि स्थानीय ज्ञान भी आहत हुआ ।
पिछले वर्ष एक प्रस्तुतीकरण (पता नहीं प्रेजेंटेशन के लिए यह उपयुक्त शब्द है या नहीं) के दौरान अध्यापक ने पूछ लिया कि स्थानीय ज्ञान को बचाने की क्या जरूरत है जब सबका काम मुख्यधारा में आने से हो रहा है और बेहतर तरीके से हो रहा है । वह प्रश्न थिंग्स फॉल अपार्ट के सिलसिले में भी याद आता है । स्थानीय ज्ञान , स्थानीय आवश्यकताओं के अनूरूप होते हैं जो वहाँ उपलब्ध प्रकृतिक संसाधनों पर आधारित होते हैं । उस भौगोलिक क्षेत्र में हम नवीन से नवीन तकनीक पहुंचा दें पर सबके लिए आवश्यक आर्थिक संसाधन उपलब्ध करवा पाना निश्चित तौर पर टेढ़ी खीर है । ऐसी दशा में स्थानीय ज्ञान ही स्थानीय निवासियों के काम आता है । इस पर आक्रमण एक बड़ी आबादी को चकाचौंध में लाकर खड़ी तो करती है पर उनके लिए वहाँ बिखराव के अलावा कुछ रह नहीं जाता है । चिनुआ इस स्थानीयता पर पड़ते दबाव को और उसके विरोध को रेंखांकित करते हैं । यह दबाव स्थानीय संसाधनों का अपने स्वार्थ में उपयोग करने के लिए बाह्य तत्वों द्वारा डाला जा रहा है और इसका औज़ार वही है अपने को श्रेष्ठ साबित करते हुए सभी आपराधिक और गैर आपराधिक हथकंडे अपनाना । इतना सब तो भारत में भी हुआ और कहने को हम अपने साहित्य पर गर्व भी बहुत करते हैं पर साम्राज्यवादी कब्जे और उसकी विभीषिका पर थिंग्स फॉल अपार्ट जैसा सशक्त तो छोड़िए इससे हल्की कृति भी नहीं मिलती –दो चार व्यंग्य नाटिकाओं और निबंधों को छोड़ दें तो ।
ऐतिहासिक तथ्यों के बीच समवेदनाओं का खाली स्थान निरंतर बना रहता है जो घटनकरमों को एक नीरस व एकनिष्ठ रूप देती है । जबकि इतिहास का जीवन भी एक जीवन रहा होगा जिसकी तमाम जटिलताएँ रही होंगी और यदि वे सामने आती हैं तो स्वाभाविक रूप से इतिहास की बहुस्वीकृत मान्यताओं को आघात लगेगा । थिंग्स फॉल अपार्ट का प्रकशन नाइजीरिया की आजादी के तीन साल पहले हुआ था । और इसने इतिहास के तथ्यों के बीच के खाली स्थान को जब समवेदनाओं से भरा तो अफ्रीकी देशों के संबंध में पूरी दुनिया का नजरिया बदला विशेषकर यूरोप का जो पूरे विश्व को अपनी ही संपत्ति समझ कर उसका खून चूसते रहे । सहज रूप से चल रहा कबीलाई जीवन जिसकी अपनी मान्यताएं हैं और उन मान्यताओं का अपना आधार है उसको प्रभावित कर उसे छिन्न-भिन्न करने व उसके संसाधनों पर आधिपत्य जमाकर कबीलाई जीवन को केवल इस लिए बर्बाद कर देना कि वह सभ्यता की यूरोपीय साम्राज्यवादी परिभाषा से बाहर है इसका जबर्दस्त चित्रण किया है चिनुआ ने । यही वजह है कि उन्हें अपनी इस पहली ही किताब से जबर्दस्त लोकप्रियता मिली ।
चिनुआ ने लेखन की एक सर्वथा नवीन पद्धति विकसित की जब मौखिक महावृत्तांतों को साहित्य में उसी रूप में पेश कर दिया । थिंग्स फाल अपार्ट में भी यह कई बार दृष्टिगत हुआ है । उनहोंने अपने लेखन के लिए अंग्रेजी चुनी जिसने उनकी बातों को दूर दूर तक पहुंचाया और इस पुस्तक की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह 50 से ज्यादा भाषाओं में अनूदित हुई।
थिंग्स फॉल अपार्ट को केवल इसलिए नहीं पढ़ा जा सकता कि उसमें साम्राज्यवादी खटकरम का चित्रण है और वह कबीलाई जीवन के बाह्य तत्वों के प्रभाव में आकर टूटने का उपन्यास है बल्कि इसलिए भी कि इसमें चिनुआ ने किस बारीकी से स्थानीय संदर्भों को बरता है और उन्हें साहित्य का स्तर दिया है । वे तमाम लोक बिम्ब और लोकगीत भाषा नहीं समझ आने के बावजूद उपन्यास को गति देते और लेखकीय कुशलता पर मुग्ध कराते प्रतीत होते हैं ।

चिनुआ आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनका थिंग्स फॉल अपार्ट इस कदर हावी है कि उनके नहीं होने का विश्वास नहीं हो रहा और मन ये सोचना भी नहीं चाहता कि वह नहीं हैं ।     

मार्च 18, 2013

नितांत व्यक्तिगत ....



आज अपने जन्मदिन पर बात करते हुए इतना तो कह ही सकता हूँ कि मेरे लिए यह एक ऐसा विचार है जो दिल्ली में शुरू हुआ और वहीं खत्म हो गया । कोई 2003 के साल की बात रही होगी जब इसे मनाने की शुरुआत हुई थी । उससे पहले तक मेरा और जन्मदिन के मनाने का कोई नाता दूर तक नहीं था । ऐसा भी नहीं था कि उस साल अचानक से यह शुरू हो गया हो । बल्कि उस से पहले के साल भर के दौरान कई दोस्तों और एक दो अग्रजों के जन्मदिन का भोज खा चुका था तो उन भोजों के आभार के तौर पर मैंने भी अपने जन्म के दिन भोज दिया । उस समय हमारा दायरा केवल और केवल बिहार और उसमें भी अपने शहर सहरसा से आए हुए लोगों तक सीमित था सो कोई विधि –विधान नहीं बल्कि पर्याप्त से भी थोड़ी ज्यादा मात्रा में बनाया गया मुर्गा भात और कोई भी मिठाई , बस यही मायने थे हमारे लिए जन्मदिन के । उस समय घर से खर्चे के लिए हर महीने के दो हजार रूपय मिलते थे और जन्मदिन पर हुए खर्चे के बारे में बताया नहीं जा सकता था सो उन्हीं पैसों में कतर-व्योंत करते हुए इस दिन खूब खाया जाता था । वह ठेठ बिहारी दौर था जब हम सब बारीकियों के बगैर जीवन जीते थे । बिहारी कभी बारीकियों में नहीं जाता मसलन खाने के साथ सलाद या 4-5 प्रकार की सब्जियाँ इस सब में अविश्वास रखने वाले लोग हैं हम । मांस मछली खाने बैठ गए अन्य राज्यों के लोगों को देखता हूँ बिना सलाद के खाएँगे ही नहीं पर हमारे यहाँ सब चलता है और बहुत हुआ तो प्याज ले कर बैठ गए । वह प्याज भी किसी विशेष आकृति में काटा हुआ नही बल्कि किसी भी तरह खा लीजिये कभी थाली के किनारों से काटकर तो कभी हाथ से ही तोड़कर , न हुआ तो साबुत प्याज में ही मुह लगा दिया । इससे एक किस्सा याद आया हमारे एक मित्र बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने समस्तीपुर की ओर गए थे वहाँ उनकी सलाद की फरमाइश पर उन्हे 4 टुकड़ों में काट के प्याज पकड़ा दिया गया । मित्र गोरखपुर के हैं और जब भी बिहार के बारे में कुछ बोलना हो तो इसका जिक्र जरूर करते हैं । मेरे उक्त मित्र या कि कोई और इस बारीकी के अभाव को अपने हिसाब से या एक सामान्य व्यवहार के हिसाब से देखते हैं पर हमारा यह असामान्य व्यवहार हमारे अभावों की देन है और अभाव से बड़ा समाजीकरण का औज़ार कोई नहीं है ।
बहरहाल वो तीन चार साल ठेठ बिहारी जीवन के साल थे । मुझे वो बेफिक्री अभी भी बहुत प्यारी लगती है पर उन संगियों के दिल्ली से चले जाने के कारण चाहकर भी उसमें नहीं जाया जा सकता ।
  सहरसा से आए हुए दोस्त वापस लौटना शुरू कर दिए थे जबकि मैंने दिल्ली में रुककर ही एम ए करने का मन बनाया । फिर ऐसे जैसे कि अपने शहर के मेरे दोस्त एक एक कर चले गए और उनका स्थान एमए के दोस्तों ने ले लिया । 2008 का साल एक ऐसा साल था जब मेरे जन्मदिन पर सहरसा के दोस्तों के साथ- साथ एमए  के दोस्त भी शामिल थे । उसके बाद जीवन बहुत तेजी से बदला फिर और नए दोस्त जुडते गए । फिर जन्मदिन मनाने के रस्मों के बारे में पता चलता गया । फिर एक जन्मदिन वह भी था जब उसमें केक भी लाया गया था । आप किसी चीज से परिचित हों तो उसका प्रयोग करने में कोई झिझक नहीं होती पर जब आप उससे अपरिचित हों तो अजीब लगता है । केक काटने के मामले में मेरा भी यही हाल था । इसलिए मैंने एक बहाना गढ़ लिया कि हमारी परंपरा में जन्मदिन के किसी चीज को काटना एक नकारात्मक विचार है जो पसंद नही किया जाता । और यकीन मानिए मैं अपनी इस युक्ति से पिछले साल तक केक काटने से बचा रहा । जबकि हमारे यहाँ जो  लोग अपने बच्चों का जन्मदिन मानते हैं और यदि उनके पास बकरे खरीदने के पैसे हैं तो उसकी दावत जरूर देते हैं ।
    पिछले साल का जन्मदिन बहुत से मानों में अलग था । शायद इसलिए कि हम सब को पता था कि दिल्ली में मेरा ये अंतिम जन्मदिन है । नवोदय विद्यालय समिति का परिणाम तो इस साल आया पर DRDO का परिणाम तो पहले से ही आ चुका था सो लगभग सभी मित्र आए थे । उनमें से कुछ के आने की उम्मीद मुझे भी नहीं थी । आज उस बात को साल भर हो गए हैं मैं यहाँ केरल में अकेले बैठा हूँ । जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि मेरा जन्मदिन मेरे परिवार में कभी नहीं मनाया गया था और यह किसी और ही रूप में शुरू हुआ था इसलिए इस दिन को लेकर कोई विशेष कल्पना आदि नहीं रही । लेकिन आज बार – बार यह एक तरह की रूमानियत में डाल दे रहा है । बार बार फोन की ओर देखना और नहीं तो फेसबुक खोलकर देखना । दो तीन बार तो दिल्ली वाला सिम कार्ड भी लगा कर देख लिया है कि उस पर तो कोई ट्राई नहीं कर रहा ।
दोस्तों का गले लगते हुए जन्मदिन की बधाई देना बहुत याद आ रहा है । यहाँ आज मेरा जन्मदिन मेरे तक ही सीमित है पर दिल्ली में आज का दिन मेरे दोस्तो के जीवन में पूरी दखल की शक्ल में रहता था । अपना ग्रुप उधर बहुत बड़ा था और जाहिर है इतने बड़े ग्रुप में हर किसी की हर किसी से बन नहीं सकती । और इसका नतीजा ये था कि मेरे जन्मदिन के अलावा ऐसा शायद ही किसी का जन्मदिन रहा हो जहां सभी इकट्ठा हुए हों । और लगता है कि अब यह इकट्ठा होना रुक जाएगा ।
आज यहाँ विद्यालय में 12वीं के छात्रों की विदाई है सो खाने पीने का उत्तम प्रबंध है और खाकर मजा भी आया सो इस मामले में निराश नहीं हुआ पर दोस्तों के बीच आज विशिष्ट बन के घूमना नहीं हो पाया ।
दिल्ली में किसी साल आज के दिन ही आरंभ हुई एक बात का अंत किसी को पता लगे बिना पिछले साल आज ही के दिन हो गया । ऐसा नहीं है कि हम सब दोस्त फिर से नहीं मिलेंगे पर मेरे जन्मदिन पर तो पक्के तौर पर नहीं मिलेंगे ।    

मार्च 16, 2013

तीसरी भाषा हो या पहली !







1 बलिदानी सैनिक दूसरों सैनिक को बोलता है कि हमारा हाथ में अभी भारत का रक्षा ।
2 हम भारत को हमारा दुलहल जैसा सोचकर रक्षा करो ।
3 जब इफन का घर गया तो सब समय टोपी दादी की कहानियाँ सुनकर बैठेगा ।
4 हमको किसी चीज की प्रोजेक्ट मिलता है तब हम कंप्यूटर के सामने आकार उसको खोज करता है ।
5 हमारे दुर्घटनाओं में हमारा साथ रहता है उनलोगों को सच्चा मित्र कहता है
       
                         ये पाँच वाक्य और इस जैसे कई अन्य जिनसे प्रतिदिन सामना होता है और सप्रयास स्वयं को हंसने से रोकना होता है अन्यथा जिस तरह से हम सीख कर आते हैं उसमें अपनी भाषा से जरा सा भी विचलन देखते ही अपनी श्रेष्ठता और बोलने वाले की हीनता का समारोह मानना बहुत स्वाभाविक है । इतना ही नहीं भाषा ठीक करने के बहाने एक भाषायी सामंतवाद झाड़ते हैं बिना इस बात का खयाल किए कि सामने वाला इसे किस तरह ले रहा है । इस बात की पूरी संभावना भी है कि यह शुद्धिकरण बाद के दिनों में नही बरकरार रहेगी ।
                               
कुछ भी हो उपरोक्त पंक्तियों पर नहीं हंसा जा सकता क्योंकि ये पंक्तियाँ उन छात्रों की है जिन्हें ये भाषा सीखनी है और शुरुआत में यह भी चलेगा । छठी कक्षा से शुरू हो चुकी हिन्दी 10वीं – 12वीं तक आते आते भी शुरुआती हिन्दी जैसी ही रह जा रही है । जहां यह तीसरी भाषा हो वहाँ यह स्थिति कोई अनोखी हो ऐसा कहना मेरी मंशा नहीं है क्योंकि इस भाषा का अपना वातावरण कम से कम यहाँ तो नहीं मिलता । इसके बावजूद निचली कक्षाओं में हिन्दी पढ़ने वालों की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती । वे छोटी कक्षा में एक ऐसी भाषा पढ़ते हैं जिसका यहाँ के जीवन में स्थान तीसरा है अर्थात गैर – जरूरी । इस स्थिति में उसे सीखने की ज़िम्मेदारी एक खानापूर्ति में बदलने में देर नहीं लगती । परिणामस्वरूप छत्रों के बड़ी कक्षाओं में आ जाने के बाद भी भाषा अपनी टूटी- फूटी शैली के साथ बनी ही रहती है जिसकी बानगी ऊपर की पंक्तियों में मिल रही है ।
   
यूं तो भाषा का सामान्य प्रकार्य अपनी बातों को को समझाना है और यदि संदेश समझ में आ रहा है तो भाषा का काम पूरा हुआ । इस लिहाज से यदि डेंखेन तो भाषा संबंधी सारे झगड़े ही न खत्म हो जाएँ ससुरे ।

अभी प्रिंसिपल से बात हो रही थी । उनका कहना था कि एर्णाकुलम नवोदय कुछ खास विषयों में अच्छे अंक पाता है और हिन्दी उन्हीं विषयों में से एक है । इसका अर्थ था कि मैं भी 12वीं कक्षा का अध्यापक होते हुए इस अधिक अंक पाने की परंपरा को आगे बढ़ाऊँ । छत्रों को हिन्दी में ज्यादा अंक मिलने की बात को तो मैं इस तरह से देखता हूँ कि यह एक अहिंदी प्रदेश है और यहाँ के छत्रों की हिन्दी की जांच नहीं बल्कि उसका प्रोत्साहन होता है । इस क्रम उनकी भाषा संबंधी तमाम त्रुटियाँ नज़रअंदाज़ कर उत्तरों की भावना पर अंक दिए जाते हैं । यह बात मैंने जब छोटी कक्षाओं में हिन्दी पढ़ने वाले दो अध्यापकों से कही तो वे नाराज हो गए । वे कहने लगे कि यहाँ के छात्रों की हिन्दी उतनी भी खराब नहीं है । फिर वे आपस में बात करने लगे । स्थिति के अनुसार जाहीर है वे मेरी बुराई कर रहे होंगे पर भाषा मलयालम थी । यहाँ के छात्रों के हिन्दी के उत्तरों से गाइड को निकाल दिया जाए तो एक वाक्य भी नहीं निकल पाता जो पूर्ण हो । पाठ के आधार पर यदि इनसे अपने मन से उत्तर देने कह दिया जाए तो दो चार शब्दों से आगे नहीं बढ़ पाते हैं । कुछ तो बोल भी नहीं पाते । ये हालत तब है जब ये 10वीं 11वीं  12वीं  के हैं । छोटी कक्षाओ के विद्यार्थियों की बात मुझे नहीं पता पर स्थिति बहूत बदली हुई होगी इसकी तो कल्पना भी नही कर सकते ।

कौन पढ़ता है हिन्दी
    पहले ही दिन मुझे प्रिंसिपल ने आधिकारिक तौर पर बताया कि 10वीं के बाद जो छात्र हिन्दी पढ़ रहे हैं उनमें से एक दो को छोडकर सभी उसमें डाल दिए गए हैं । ऐसा इसलिए कि उन्हें बाकी लोगों में से सबसे कम अंक आए थे और उनके लिए किसी दूसरे विकल्प में जाने का अवसर नही रह गया था । विषय संबंधी तमाम चिंतन, दर्शन से ऊपर ये वास्तविकता है हमारे विद्यालयों की और इसी तरह महाविद्यालयों की भी । सैद्धान्तिक रूप से सारे विषय समान हैं पर व्यवहार में ये कोई अर्थ नहीं रखते । क्योंकि छत्रों के आगे की  आर्थिक सफलता में हिन्दी बहुत मदद नहीं करती । फिर याद आते हैं हमारी हिन्दी के वे विद्वान जो अपने प्राध्यापक और उससे भी ज्यादा बन जाने के बाद आए दिन लिखते रहते हैं कि हिन्दी में बाजार बढ़ रहा है इस लिए इसकी मांग बढ़ रही है । भैया जो लोग पीछे रह जाते हैं वे हिन्दी पढ़ते हैं । यह केवल हिन्दी का प्रश्न नही है बल्कि अन्य सभी विषयों का है जिनको अनुत्पादक मानकर निम्न श्रेणी में दल दिया जाता है । हिन्दी दिवस के दिन और उस पखवाड़े के दौरान बड़े ज़ोर शोर से हिन्दी को गया जाता है उसके नए नए क्षेत्र में प्रवेश के गीत गाये जाते हैं पर क्या यही हालत साल के 365 दिन बने रहते हैं । वे वक्ता फिर अगले साल ही नजर आते हैं ।

हिन्दी पढ़ने की जरूरत ही क्या है ?
     
               हम जिस समय में रह रहे हैं वह निस्संदेह हिन्दी का नहीं है और यही नहीं इस तरह के बहुत से अन्य विषयों का भी नहीं है । क्योंकि इन विषयों की उपयोगिता उत्पादकता की दृष्टि से संदिघ्ध है । हिन्दी पढ़ के बहुत से बहुत हिन्दी के प्राध्यापक बन जाएंगे और मास्टर । प्राध्यापक आटे में नमक के हिसाब से बनते हैं और जो बनते हैं वे तमाम जोड़ घटाव के धनी होते हैं क्योकि लोग बहुत हैं और स्थान कम । एक दो क्षेत्र और हैं जैसे अनुवादक और संचार माध्यम का क्षेत्र लेकिन ये दोनों क्षेत्र भी बिना अङ्ग्रेज़ी के हिन्दी वालों के लिए अपने दरवाजे नही खोलते । फिर जब सबकुछ इतना ही कठिन है तो क्यों पढ़ाया  जाए यह विषय ? इसे एक विकल्प के रूप में रखना उन छात्रों के साथ एक खिलवाड़ है जो इसमें डाल दिए जाते हैं । इसके बदले कोई ऐसा विषय पढ़ाया जाए जो कम से कम उनके लिए एक पेशेवर अवसर तो पैदा कर सकें ।
आज के दौर में या कि किसी भी दौर में साहित्य , औदात्य आदि की बात बेरोजगारी के सामने बेमानी है । भरे पेट वालों का सौंदर्यशास्त्र हो सकता है पर भूखों का नही । और हिन्दी की आर्थिक अनुत्पादकता ने इसे व्यक्ति की इज्जत से भी जोड़ दिया है । हालांकि इन बातों को अति उत्साह में खारिज करने वाले लोग बहुत हैं पर वो तभी तक जब तक कि बाहर की वास्तविकताओं से उनकी बेखबरी है या अपनी सफलता के अलावा एक दो और हिन्दी के लोग उन्हें सफल दिखते हैं । 

मार्च 09, 2013

सी वन दो सौ तिरेपन यमुना विहार


किसी ने पूछा नहीं कि मुंह से अपने आप निकल जाता है सी वन दो सौ तिरेपन यमुना विहार । यह एक तरह से स्थायी पता सा हो गया है । दोस्त लोग जहां दिल्ली में अपने रहने की जगह को रूम या कमरा कह देते वहीं मैं हमेशा घर ही कहता । वो दो कमरे की संरचना मेरे लिए बस रहने का स्थान हो ऐसा नहीं । एक मुकम्मल पहचान और मेरे दिल्ली में होने की स्थायी जगह जहां कितनी भी रात को चले जाओ अपना बिस्तर जरूर इंतजार करता मिलेगा । पिछले 6 साल से मेरी तमाम बातों में , यारबाजी में वो घर बराबर महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है । किसी रात जब सबको या बहुत से लोगों को रुकना हो तो भी उसने कभी खुद को पीछे नहीं किया उसकी विस्तृत छाती पर बिस्तर को फैला कर सो जाते और मिलते सुबह के बीत जाने के बाद ।  
    मैं दिल्ली छोड़ चुका हूँ इसके बावजूद मेरी पहचान बनकर बहुत से जगहों मसलन बैंक में , बीएसएनएल के दफ्तर में दर्ज है । यहाँ भी मैं उस घर के पते से जाना जाता हूँ बावजूद इसके कि वह घर किराए का है । यारों का चलन है कि वो किराए के घर को घर नहीं बल्कि कमरा या रूम मानते हैं या फिर घर वो है जो हम सब के पिता ने अपननी अपनी जगहों पर बना रखे हैं । पर यह तो बड़ी ज्यादती है उन दीवारों से जिनहोने बिना किसी उज्र के अपने साये में रखा या रखते आ रहे हैं । मैं उस घर में आया , रहने लगा और लगातार बना ही रहा फिर एक वो भी सुबह हुई जिस सुबह मैंने दिल्ली छोड़ दी । पर उस सुबह भी इस बात को लेकर निश्चिंत था कि वापस तो इसी घर में आऊँगा कम से कम तब तक जब तक छोटा भाई दिल्ली नहीं छोडता है । सो उन दीवारों से बिना अंतिम विदा लिए चला आया । अभी कल भाई से बातें हो रही थी और बातों बातों में ही उसने बताया कि कि वह इस घर को छोड़कर लक्षमी नगर शिफ्ट हो जाएगा । तब से एक उदासी बराबर बनी है । उदासी केवल इतनी भर नहीं है कि वह घर जिसके पते से तमाम चिट्ठियाँ आती थी हाल के सारे पहचानपत्रों पर उसी का पता है और बहुत सी परीक्षा के प्रवेश पत्रों पर भी वही घर अंकित है वह एक ही झटके में अर्थहीन हो जाएंगे बल्कि उस घर ने मुझे एक पहचान दी मैं उसका शुक्रिया किए बिना चला आया । 31 जनवरी की रात उस घर में बिताई मेरी आखिरी रात थी । उस वक्त इसका गुमान भी नहीं था का कि मैं वापस इस घर में नहीं लौट पाऊँगा ।
दिल्ली में बहुत से घरों में देखा ही कि किरायेदार बदलते ही घर की पूरी दशा ही बदल जाती है फिर आप की कोई पहचान वहाँ रह नहीं जाती । एक बार हिम्मत कर के चला भी जाऊँ तो कहीं से यह नहीं पता चल पाएगा कि सेट टॉप बॉक्स के आने से पहले मैंने कितने ही महीने चोरी से केबल जोड़ के टी वी  चलायी थी । और यही घर था जहां दो दो महीने घर चले जाने के बावजूद अखबार वाले को मना नहीं किया जाता था क्योंकि मना करते ही वह अपने बकाया रूपय मांग लेता । और जब बिहार से लौटता तो गैलरी में अखबारों का जखीरा पड़ा होता । फिर इसी घर के गेट पर जब अखबार वाले दुबे जी पैसा मांगने आते और मैं अगले महीने आने की बात कह देता तो वे कहते कि दो –चार ट्यूशन क्यों नहीं कर लेते न हो तो मैं ही ढूंढ दूँ ...। पर यही घर था जिसमे घुसते ही सारी बाते भूल के हम फिर से शेर हो जाते थे ।
    यही वो घर था जिस पर लिखी एक लघुकथा ने पुरस्कार जीता था और मेरी अब तक की छपी हुई रचनाओं में इसका ही पता है । यूं तो अब फेसबुक पर ही लोग मिल जाते हैं पर वहाँ भी आज तक पते में यही घर दर्ज है । यही वो घर है जहां माँ इलाज कराने आई थी और यहीं हम दोनों भाइयों में छोटी-मोटी मुठभेड़े होती थी और शायद यही घर है जिसने मुझे बदलते हुए देखा ...
 इस घर के साथ कभी लगा ही नहीं कि हम उसके मकान मालिक न हों । और न ही आंटी ने ऐसा कभी महसूस होने दिया । हाँ जब भी कोई आता तो अपना दरवाजा खोल के झाँकती जरूर पर वह बस इस तसदीक के लिए कि कोई चोर तो नहीं आ गया । कितनी ही बार तो उनहोनने आर्थिक मदद की वह भी इस आश्वासन के साथ कि और चाहिए तो और ले लो । दिल्ली में और भी बहुत से मकान मालिक देखे पर ऐसा कहीं नहीं था कि हमने यदि सफाई नहीं की तो आंटी खुद ही हमारा बाथरूम तक साफ कर दे । ये सब केवल यह नहीं है कि हमे बहुत आराम था उस घर में बल्कि ये सकारात्मक सोच की बात है जो निश्चित तौर पर मुझे या मेरे भाई को आगे सफाई के लिए प्रेरित करता था । आंटी ने अपने पति के गुजर जाने के बाद जिस तरह से मध्य प्रदेश से दिल्ली आकार अपना रोजगार किया , भैया को पढ़ा लिखा के बड़ा किया और घर खरीदकर दिया वह प्रेरक है पर इस तरह के लोगों से प्रेरणा लेने का चलन कभी नहीं रहा है न अपने यहाँ । आंटी आज भी भैया और भाभी के काम पर जाने के बाद उनके दोनों बच्चों की देखभाल करती हैं और बिला नागा सर्दी हो या गर्मी 2.30 बजे छत से सूखे कपड़े लाने जाती है । इधर तो कई बार देखा कि उनकी सांस फूलने लगती थी । फिर मन में सोचता कि ऐसे ही किसी दिन आंटी मर न जाए । मैं उनके मरने पर उनके पास रहना चाहता हूँ पर अब तो यह भी नहीं सोच सकता कि मैं नहीं मेरा भाई तो है वहाँ । अब तो ये एक खबर ही होगी वह भी गलती से किसी को पता चल जाए तब ।
बहुत सारी भावुकताओं के बीच ये घर ही था जो सबसे जोड़े खड़ा था जहां बिजली चले जाने के बाद एक सघन पड़ोस का अहसास होता था । बार बार गैलरी में आ गए बच्चों की
  चिड़ी देने की झुंझलाहट आज बेकार जान पड़ती है ।
  यह कुछ कुछ उस घर की मातमपुर्शी सा आभास दे रहा है । ऐसा लग रहा  है कि वह घर न रहा । पर भैया तुम सलामत रहो । तुम रहे तो फिर से कोई रहने आएगा । एक नयी शुरुआत होगी । कुछ नए रिश्ते बनेंगे तुम्हारे साथ । हम भी यूं ही कभी भटकते हुए आ जाएंगे गर्मी की किसी शाम को 6 बजे के बाद सप्लाय के ठंडे पानी से नाहने । पर इतना दुख तो जरूर रहेगा कि अब वो नाहना केवल मन में होगा ! 

मार्च 07, 2013

संविधान , धर्म और स्त्री अधीनता


 वह उसे प्रतिदिन नहीं तो मौके – बेमौके जरूर पीटता है , क्या पहनना है और घर से बाहर कदम नहीं रखना है से लेकर किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है किसके यहाँ नहीं यह भी वही तय करता है । फिर भी सीता मौसी को देखा जाये तो सप्ताह के एक दो दिनों को छोडकर हर दिन के स्वामी को जन्म-जन्मांतर तक उसी व्यक्ति को पति बनाने के लिए व्रत रखकर खुश करती रहती है । यदि सचमुच व्रत करने का फल मिल जाए तो यह बात कल्पनातीत नहीं है कि उसे जन्म-जन्मांतर तक कितना कष्ट भोगना है । उसकी पिटाई , उसकी अस्तित्वहीनता और उसे मिलने वाले दुत्कार निरंतर चलते ही रहेंगे उसके खत्म होने की स्थिति बस उतनी ही अवधि की होगी जबतक कि अगले जन्म में उसकी शादी फिर उसी व्यक्ति से नहीं हो जाती । इतना सब होने के बावजूद वह व्रत आदि करके उसी पति को मांग रही है । हम तमाम आर्थिक आत्मनिर्भरता की कमी को इसका कारण बता दें पर यह समुचित कारण बनकर उभर नहीं पाता । पति की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ आदि तमाम तरह के व्रत वे भी पूरे होशो-हवश में करती हैं जो विश्वविद्यालयों में वरिष्ठ प्राध्यापकों तक पहुँच गयी हैं । इस तरह से सीता मौसी अकेली स्त्री नहीं है उनके ही ससुराल में बहुत सी अन्य स्त्रीयां हैं जो अपने पतियों से पिटती हैं । इस तरह से उसे या उस जैसी अन्य स्त्रियों को अपनी दशा अनोखी नहीं लगती । फिर कोई वजह ही नहीं बंता कि , पति को इसका कारण माना जाए । पति तो बस माध्यम है उनका तो भागे ( भाग्य ही ) खराब है
                दिल्ली में हमारी गली में रात के 11 बजे के बाद प्रतिदिन चीख पुकार होती थी (आज भी होती होगी) फिर गली में भाग-दौड़ होती कोई भाग रहा होता और कुछ कदम उसके पीछे दौड़ रहे होते । एक दिन गेट खोलकर देखा तो एक सिपाही जो शायद तभी तभी ड्यूटी से वापस आया था वह बानियान और खाकी पेंट में एक कमजोर सी दिखने वाली औरत को पीट रहा था , उसका बच्चा उसके पैरों से चिपका जा रहा था । जल्द ही हमारी मकान मालकिन ने गेट बंद केआर वापस आने का आदेश दे दिया । बाद में उनहोने ही बताया कि वह व्यक्ति दिल्ली पुलिस में सिपाही है इसलिए कोई उससे नहीं उलझता । मैंने भी कुछ नहीं किया अलबत्ता दिल्ली महिला आयोग को लिखा जरूर और हम सब गली वालों की तरह उसने भी कुछ नहीं किया । एक दिन उस स्त्री को भी गली भर की सुहागिनों के साथ बैठकर सुहाग के लिए कोई पूजा करते हुए देखा वो भी भारी मेक-अप के साथ ।
                यह बहुत ही रोचक सी दशा हुई कि जिसके हाथों रोज़मर्रा की मौत मिले उसकी ही लंबी आयु और उसे ही बार बार पाने की प्रार्थना की जाए । इसके पीछे समाज में नए सदस्यों के होने वाले प्रशिक्षण कुछ मदद करते प्रतीत होते हैं । लड़कियों को बचपन से ही इस तरह से सिखाया जाता है कि आगे चलकर सबकुछ बड़े स्वाभाविक ढंग से झेलने लगती है । उनकी तैयारी ही इस तरह कारवाई जाती है कि वह अन्तः एक दोयम दर्जे के नागरिक के हैसियत तक पहुँच जाती है । इस संबंध में लीला दुबे का लेख पितृवंशीय भारत में हिन्दू लड़कियों का सामाजीकरण देश भर में इस तरह के प्रशिक्षणों की सूचना देता है जो स्त्री को स्त्री बनाए रखने में आगे मदद करते हैं ।
प्राचीन भारतीय लेखन और धार्मिक साहित्य मिलकर स्त्री की असपष्ट और भ्रामक तस्वीर बना देते हैं फिर स्त्री को जीवन पर्यंत इसी उलझे स्वरूप में रखकर उसके साथ व्यवहार किए जाते हैं । एक तरफ तो यह कहा जाता है कि शास्त्रों में उसे देवी कहा गया है । वो देवी प्रसन्न होने पर किसी की भी इच्छा पूरी कर सकती है और यदि क्रोधित हो गयी तो भयानक विनाश ल सकती है जो केवल एक के विनाश तक सीमित नहीं है बल्कि समूहिक विनाश भी कर सकती है । तात्पर्य यह कि वह बहुत शक्तिशाली है । परंतु अगले ही लेखन में यह छवि बनाई जाती है कि उसका मन स्थिर नही रहता , वह मुक्ति या निर्वाण के रास्ते से भटकाने का कार्य करती है । अपरिपक्वता और लालच आदि उसमें कूट कूट कर भरे होते हैं । मेरे घर में स्त्रियों पर होने वाली बातचीत के समय मेरे पिता सहज ही शास्त्रीय मुद्रा धरण कर लेते हैं और शास्त्र से एक श्लोक कह उठते हैं-
              त्रिया चरित्रम पुरुशस्य भाग्यम
              देवो न जानती कुतो मनुष्यम     ।
और यदि किसी स्त्री से खुश हो गए तो –
               खन देवी नागिन
               खन अनुरागिन
               खन खन कन्याकुमारी   ।
इन दोनों तरह की छवियों को स्पष्ट ही स्त्रियों ने स्वयं नहीं गढ़ा अर्थात स्वयं अपने लिए नहीं लिखा । ऐसे समाज में जहां उन पर तमाम प्रतिबंध हों वहाँ उनकी शिक्षा दीक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती तो उनके लेखन को स्वीकार कर लेने की बात तो बहुत दूर है । यह सब उसके ऊपर एक तरह की श्रेष्ठता के अहंकार में लिखा गया है और लंबे समय तक दूरियाँ तय करते हुए सामाजीकरण दर सामाजीकरण यह आज के स्वरूप तक पहुंचा है ।
   लंबे समय से चूंकि कथित तौर पर स्त्री को हीं लिंग का माना जाता रहा है अतः उसे बहुत से अधिकारों और विशेषाधिकारों से वंचित रखने की परंपरा रही जिन अधिकारों और विशेषाधिकारों को पुरुषों का माना गया । इसी ने उन्हें पुरुषों के अधीन रखने की सैद्धांतिकी का निर्माण किया जहां कोई भी पुरुष योग्य से योग्य पत्नी के अस्तित्व को अपने से नीचे ही मानता है ।
भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह अधीनता मुख्य रूप से बहुसंख्यक हिंदुओं में है लेकिन यह यहाँ के इस्लाम और इसाइयों में भी देखे जा सकते हैं । एक तरह से स्त्री अधीनता की यह स्थिति भारत भर का सच है जिसमें धर्म का बहुत बड़ा योगदान है । भारतीय संविधान यह घोषित तो कर देता है कि कानून के सामने स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं पर वह अपनी ही एक व्यवस्था से पुनः बांध जाता है और समानता संबंधी जो बात स्त्रियों के जीवन में आमूल परिवर्तन ला सकती थी वह प्रभावहीन होकर रह जाती है । संविधान में व्यक्ति को अपना धर्म मानने और उसके अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता है यही स्वतन्त्रता स्त्रियों के लिए घातक हो जाती है क्योंकि भारत में परिवार और वैयक्तिक कानून में धर्म का ही बोलबाला है । यहाँ धर्म स्त्रियों को यह अधिकार नहीं देता कि वह विवाह के बाद कहाँ पर रहेगी यह तय है कि वह पिता का घर छोडकर पति के घर आएगी इस लिए उसे बचपन से तैयार किया जाता है । फिर माइका उसे उसके भावी जीवन के लिए तैयार करता है । धर्म की व्याख्या समय समय पर बदलती रहती है जो अपने आप में आए कट्टर पंथी तत्वों के हिसाब से स्त्रियों पर तमाम तरह की पाबन्दियाँ लगाने का कार्य करती है ।
       सीता मौसी का ससुराल या कि भारत का कोई अन्य स्थान धर्म के चंगुल से मुक्त नहीं है अतः उन पर धर्म के अधीन आचरण करने का दबाव लगातार बना ही रहेगा । और कुछेक स्त्रियों के मुक्त होने को हम बहुत बड़ी उपलबद्धि मान कर बैठ जाएँ तो यह हमारी खुशी है ।   

मार्च 01, 2013

तो आप जीत नहीं सकते


आपको डर नहीं लगता ?
ये उन बहुत से सवालों में से एक है जो मुझसे कई बार पूछा गया । बचपन का समय होता तो शायद क्या पक्के तौर पर कह देता हाँ मुझे डर लगता है । डरपोक बच्चे के के तमाम गुण थे उस समय । मैं रात को एक कमरे से दूसरे कमरे में नहीं जा सकता था , अंधेरा होते ही न पता नहीं क्या हो जाता था ऐसा लगता था कि कोई पीछा कर रहा हो और मौका मिलते ही वह मुझ पर हावी हो जाएगा और न जाने क्या क्या । उन्हीं दिनों रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बचपन के बारे में पढ़ा यह उन्होने खुद ही लिखा था और कोर्स में लगे होने की वजह से पढ़ना ही था अन्यथा न तो मैं स्वयं इतना ज़हीन था कि कोर्स के अलावा भी  किताबें पढ़ने की कोशिश करता और न ही हमारे माता – पिता का इस ओर ध्यान था कि वो ये देखें कि हमारा बच्चा क्या पढ़ रहा है । अपने देश में सामान्य तौर पर माँ-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति उदासीन ही होते हैं और मेरे माँ-बाप अनोखे हों ऐसा भी नहीं है । खैर , विश्वकवि का किस्सा बीच में ही छुट गया ... उन्होने जो लिखा था उसे आज लगभग बीस साल बाद उसी तरह बताना तो संभव नहीं पर मजमून याद है ... शाम होने के बाद जब अपने कवि एक बड़े कमरे के पास से गुजरते हो उन्हें लगता कि उनके पीछे कोई है और इसी खयाल से उनकी पीठ सनसन करने लगती । पढ़ते ही मुझे लगा कि चलो मैं अकेला नहीं हूँ डर तो टैगोर को भी होता था । आगे जब कोई बड़ा मेरे डर का मज़ाक उड़ाता तो मैं कह देता कि टैगोर को भी डर होता था पर पता नहीं क्यों लोग इस पर और हंस पड़ते थे । एक बार गाँव से मेरे चाचा आए रात के खाने के बाद ऐसे ही बातें हो रही थी और कहीं से मेरे डर की बात छिड़ गयी । चाचा ने मेरे लिए एक रख दी , यदि मैं अपने घर से एक कीलोमीटर दूर स्टेट हाइवे पर चला जाऊन तो वो मुझे एक जींस की दो पैंट देंगे ... । पैंट का लोभ तो बहुत हुआ पर हिम्मत नहीं पड़ी । मैं हिला तक नहीं और ऊपर से डर पर इतनी बातें हो चुकी थी कि और डर लगने लगा ।
ऐसे ही एक दूर के रिश्तेदार हमारे घर आए वे अपने को ओझा कहते फिरते थे । घर में जगह कम होने की वजह से उन्हे मेरे बिस्तर पर ही जगह दी गयी । उस रात उन्होने जो अजीबोगरीब किस्से भूतों के, डायनों के सुनाये कि मत पूछिए । अगले कई महीनों तक वो विभिन्न चरित्र कहीं किसी अकेली जगह में , रात के अंधेरे में मेरे मन में आ जाते और ऐसा लगता कि ये अभी बाहर आ जाएंगे । हालात ये हो गए थे कि मैं रात को बिस्तर ने नही हिलने के कारण बिस्तर गीला करने लगा था ।
फिर पता नहीं कब वो दौर आया जब ये समझ में आ गया कि ये सब हमारे वहम हैं , हमारी कल्पनाएं हैं । फिर मैं अंधेरे में कहीं भी जाने लगा था । मुझे नहीं पता कि सबके साथ इसी तरह होता है या नहीं । ऐसा होता होगा नहीं तो मान लीजिये किसी व्यक्ति के बच्चे को भय हो रहा हो और वह व्यक्ति उसका डर भागने के बजाय खुद ही भयभीत होकर खड़ा रहे तो कितनी हास्यास्पद दशा हो जाएगी । ऐसा होता भी है पर उस समय कारण दूसरे होते हैं । मुझे लगता है कि ये भूत , डायन आदि के भय उम्र बढ्ने के साथ धीरे धीरे खत्म हो जाते हैं ।
अभी तीन साल पहले मध्य प्रदेश के भीमबेटका गया हुआ था । बिना किसी तैयारी और सुविधाओं के गया था और वहाँ सुविधाएं हैं भी नहीं । गुफाओं तक जाने के लिए के लिए यदि आपकी अपनी सवारी है तो ठीक नहीं तो ऊपर के 3 – 4 किलोमीटर पैदल ही जाने पड़ते हैं । मई महीने की चिलचिलाती धूप में पहाड़ी पर पैदल ! आज सोचता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं ! दूर दूर तक कोई नहीं था पत्ते इस कदर सूख गए थे कि जरा सी हवा के चलने से वो खड़खड़ाने लगते , यहाँ तक कि मक्खी की भिनभिनाहट भी बहुत तेज सुनाई देती थी ! पर पता नहीं मन ने ऐसा क्यों ठान रखा था कि आज तो उन पाषाण युगीन गुफा चित्रों को देखना ही है । मैं चलता रहा । तभी मोबाइल पर एक दोस्त का फोन आया । उसके बजने की आवाज़ उस वीराने में इतनी तेज़ थी कि मैं डर के मारे चौंक पड़ा । पर उन एक दो मिनटों के बाद सारा भय जाता रहा । आज सोचता हूँ तो एक अलग सी अनुभूति होती है कि एक दिन मैंने उन पाषाण युग के चित्रों को अकेले देखा दूर – दूर तक कोई नहीं था । उस दोपहरी के एक एक क्षण याद हैं । वहाँ से भोपाल तक आने के लिए भी ठीकठाक जद्दोजहद करनी पड़ी थी ।
अभी उस दिन फिर एक छात्र  ने पूछ दिया कि मुझे डर लगता है या नहीं । मुझे पता भी चला कब बड़ी सहजता से उत्तर निकल गया – नहीं । तो उसने कहा कि फिर आप जीत नहीं सकते । मैंने पूछा मैं क्यों नहीं जीत सकता तो जवाब मिला कि डर के आगे जीत है और चूंकि आप डरते नहीं इसलिए आपके जीतने पर संदेह है । उसके हिसाब से यदि जीतना है तो डर होना जरूरी है । ड्यू के विज्ञापन की इस पंक्ति ने उसकी बिक्री पर क्या प्रभाव डाला नहीं पता पर छोटी उम्र के लोगों को एक मुहावरा तो दे ही दिया । जहां कहीं डर की बात आई कि चिपका मारा – डर के आगे जीत है ! यहाँ तक तो फिर भी ठीक है लेकिन ये छात्र तो उससे भी एक कदम आगे पहुँच गया है । अब यदि डर नहीं है तो जीतना कठिन है । यदि डर के आगे जीत है वाले मुहावरे को सही माना जाए तो ये तर्क भी पूरी तरह वैध नजर आता है । पर क्या डर इतनी सहज अन्विति है भी ?
मेरे अपने अनुभव जो हैं उस आधार पर मैं यदि देखूँ तो डर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं । वे तमाम किस्से – कहानियाँ हमें आज भी वहीं के वहीं जमे हुए हैं । यदि भूत –प्रेत शाश्वत होते हैं तो आज कल के तकनीक-दक्ष भूतों के किस्से क्यों नहीं मिलते ? जबकि अकालमृत्यु की मात्रा और प्रतिशत दोनों बीते हुए समय की तुलना में आजकल काफी ज्यादा हैं । इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये उस समय की संकल्पना है और किस्से हैं जब आबादी बहुत कम थी या लोगों के बीच उतना संपर्क नहीं था । फिर एक किस्सा अपनी आगे वाली पीढ़ी में निविष्ट कर पिछली पीढ़ी चली गयी और ये क्रम बहुत हाल तक बना रहा । जब संयुक्त परिवार टूटे तो किस्से कहानियों की परंपरा को भी झटका लगा और वर्तमान समय में देखें तो यह बिलकुल गौण ही मालूम पड़ती है ।
जब मैं अपने नानी के यहाँ रहता था उस दौरान उस गाँव के एक बुजुर्ग थे गुणानंद । उनका अपना आम का बगीचा था और इत्तिफाक़ से हमारे नाना के आम के पेड़ भी वहीं पास में थे । गर्मियों में जब आम बड़े होने लगते तो उनकी रखवाली जरूरी हो जाती फिर घर के बुजुर्ग और बच्चे ही उनकी रखवाली करते थे । गरम होकर पिघलते हुए उन दिनों में गुणानंद हम बच्चों को बहुत से किस्से सुनाते । उसी तरह डोमि ठाकुर जिन्हें हम ठाकुर बाबा कहते थे फिर मेरे नाना की माँ वो बुढ़िया भी गज़ब किस्सागो थी । इनलोगों ने जो किस्से सुनाये उनमें भूत –प्रेत भी थे और डायन भी । निश्चित तौर पर मेरे मन में दर ने उन्हीं दिनों आकार लिया होगा । आज ये तीनों नहीं हैं और उस गाँव में बुजुर्ग आज भी हैं साथ ही बच्चे भी पर किस्से कहानियों का सिलसिला जाता रहा । अलबत्ता हर साल गर्मियों में आम जरूर आते हैं । अब बच्चों के माँ – बाप के मन में भूत-प्रेत की जो छवि बनी है वे उसी से काम चलाते हैं । हाँ निकट के समय में किसी की मृत्यु हुई हो तो उसका डर बच्चों पर स्वाभाविक रूप से हावी हो जाता है ।
परंपरा से चले आ रहे किस्सों को सहारा बना कर और उसमें अपनी आवश्यकता के अनुरूप परिवर्तन कर माँ – बाप और आस पास के लोग ही बच्चों में डर भरते हैं । अपने देश में पालन-पोषण का सबसे सामान्य अर्थ लिया जाता है – किसी तरह बच्चे का पेट भरना चाहिए और किसी तरह बच्चा सामान्य कार्यकलाप में व्यवधान न उत्पन्न करे , यह भी कि कोई जिद भी न करे । इन सभी स्थितियों से निबटने के लिए माता-पिता भय का ही सहारा लेते हैं । बचपन की शुरुआत में ही भय कभी कभी इतना गहरे से मन में जम जाता है कि बड़ी उम्र तक नहीं निकलता । मैं अपनी एक रिश्ते की नानी को जनता हूँ जिनका पुलिस का डर आज तक नहीं गया ।
माता पिता किसी तरह से बच्चे को बड़ा तो कर देते हैं पर वह बहुत दिनों भय से नहीं निकल पाता । फिर वह बड़ों से भी डरने लगता है , बहुत से ऐसे लोग देखे जो तरह तरह की डर के शिकार हो जाते हैं यहाँ तक कि डर के मारे कक्षा में प्रश्न तक नहीं पूछ पाते ।
मैं अपनी बात करूँ तो कभी कभी आज भी डर जाता हूँ ... पर यह डर निश्चित रूप से भूत प्रेत या डायन का नहीं होता है ।     
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