अप्रैल 24, 2013

बीती हुई गलियों से


अपने शुरुआती तेरह साल मैंने यहीं बिताए थे । समझने – बुझने, सीखने के महत्वपूर्ण वर्ष  । जहां नाना का घर था वहाँ से मोड़ बहुत दूर लगता था , स्वयं वह घर भी काफी लंबा चौड़ा प्रतीत होता था । छुटपने की एक पहचान यह भी लगती है कि उस घर के कुछ कमरे तब कई कमरे लगते थे और उनमें रहने वाले चार परिवारों के लोग किस तरह ठूंस- ठूंस कर रहते थे इसका अंदाजा तब लगा जब अचानक से चारों परिवारों ने एक के बाद एक कई घर बना डाले । फिर उन परिवारों के एक दो प्रमुखों की मृत्यु होने या उनके कमजोर पड़ने ( वस्तुतः ये दोनों ही बातें हुईं ) से तीव्र बिखराव हुआ । अब यदि देखें तो पूर्व के उन चारों परिवारों के सभी सदस्यों को इकट्ठा करना एक गाँव को जमा करने जैसा लगेगा ।
       बचपन में छोटी दूरियाँ बहुत लंबी महसूस होती थी । घर से मोड़ तक आना एक कठिन कार्य लगता था फिर पोखर के पाढ़ पर जाकर दातुन उखाड़ लाना दुरूह-सा था । बारिश में गीली, कच्ची सड़कों से होकर यदि कामरेट ( कॉमरेड से बिगड़ कर बना होगा ) की दुकान जाना हो तो मुझे याद है वो मेरा हजार बार भुनभुनाना । इसमें उन मिट्टी की दीवारों के बीच रपट कर कीचड़ में गिर जाने की ही संभावना नहीं थी बल्कि उन भुतहा दीवारों के बीच के अंधेरे में हमेशा किसी न किसी के होने की आशंका रहती थी । उस समय मैं बहुत डरपोक हुआ करता था । हल्की अलग सी आवाज या सरसराहट डरा देती थी । छोटा सा हरहरा साँप भी बहुत बड़ा दिखता था । ये वही समय था जब मैं साँपों की लंबाई और गहरे रंग से उनको जहरीला या कम जहरीला मानता था । एक बार दातुन उखाड़ने के लिए जैसे ही मैंने हाथ बढ़ाया तो एक काला-सा जीव पीछे की ओर फुदका और मैं अपने पीछे । हम दोनों डरे थे । उसका तो पता नहीं पर मेरे डर ने मुझे दोबारा वहाँ जाने न दिया ।
   अपने नानी के गाँव को मैं कोई विशेष स्थान नहीं मानता पर कुछ महीनों को निकाल दें तो जन्म से लेकर बाद के तेरह वर्ष मैंने वहीं बिताए इसलिए इसका आकर्षण अलग ही रहा है मेरे लिए । कुछ सौ घरों , एक नदी , दो पोखर , एक स्कूल के अलावा कुछ दूर तक फैले खेत और उनमें काम करते लोग यहाँ यही सब है । लोग मेरे इतने परिचित हैं कि किसी को लोग जैसी शुष्क संज्ञा नहीं दे सकता । अपने मकके की फसल को जानवरों से बचाने के लिए गोबर के घोल का छिड़काव करते व्यक्ति को किसान कह देना उस व्यक्ति और उस जैसे अन्य लोगों की जीवंतता को खारिज करना है । यहाँ जब अपने खेत में फसल उगाते हुए लोगों को देखिए तो उनकी व्यक्तिगत पहचान की विशेषताएँ , उनका पूरा परिवार , उनका खेती से बाहर का जीवन भी दिखता है । ये केवल इस जगह की बात नहीं है बल्कि हर जगह की बात है । पर जब उन्हें नाम दिया जाता है तो यह सब दिखता ही नहीं है । यह बात बहुत सारे संबोधनों के साथ नहीं होती । जैसे, छात्र कहते हैं तो उनके प्रति संवेदनशीलता इस कदर है कि तमाम छोटे –बड़े पक्ष उभर आते हैं ; उनका असंतोष , उन पर बढ़ रहे दबाव , लिंग संवेदन आदि । लेकिन किसानों के साथ ऐसी कोई संवेदना नहीं दिखती । बहुत से बहुत कुछ कविताओं में उनके मेहनत की चर्चा कर दी और इतिश्री । अभी भवानी प्रसाद मिश्र की कविता वे आँखें पढ़ी जिसका आधार बहुत सारी अतिरंजनाएं हैं ।
किसानी के पेशे के प्रति इतनी संवेदनहीनता उस पेशे के प्रति सम्मान का माहौल बना नहीं पाती ।
इधर के किसानी जीवन से जुड़ा है इस गाँव का मेला । यह रामनवमी पर लगता है । यह मेला तब भी लगता था – सरल , सादा । आज भी वही स्वरूप बरकरार है । मेले के किनारे चार-आठ दुकानें आरी-तिरछी सजी हुई जिनके बीच जमीन पर बिछी दस बारह दुकानें और । कल रात गया तब भी वही देखा -झिलिया-मूढ़ी पसार के बैठी स्त्री रात बढने के साथ वहीं पन्नी पर लेट गयी ।
मैं बहुत दिनों बाद इस मेले में गया था और मेले ने भी मुझे पक्के तौर पर पहचाना नहीं पर मेले की प्रक्रिया वही रही जो पहले की थी । पतली सीटियों की पीं-पीं , तेलही जिलेबी की हवा में उठती महक और रात को मेला देखने आई स्त्रियों-लड़कियों के लाल वस्त्र । कुछ भी नहीं बदला लेकिन मेले का दायरा छोटा हो गया । अब यह सब एक बड़े से खेत में सीमित हो गया । अलबत्ता मूढ़ी-झिलिया खरीदने वाले कम हो गए क्योंकि हर दुकान पर ढेर की ढेर मूढ़ी पड़ी ही थी ।
  छोटे होते मेले ने अपनी शैली नहीं बदली है , अब भी जिन लोगों का गेहूं तैयार होकर घर आ जाये उनके चेहरे की रौनक अलग ही है , उनके घर के लोग पन्नी की पन्नी जलेबियाँ लेकर मेले से लौटते हैं । वहीं जिनका गेहूं अभी या तो खेत में या खरिहान में पड़ा है उनके घर एक ही बार जलेबी गयी है वह भी बस आधा किलो । जरा से बादल दिख जाएँ कि उनके चेहरे की रंगत और फीकी पड़ जाती है । गेहूं की फसल के आधार पर मेले की रौनक देखी  जा सकती है ।  गेहूं की अच्छी फसल के बाद मेले में जलेबियाँ जितनी तेजी से फुरा जाती हैं उसी तेजी से बढ़ता है बीड़ी का धुआँ और उसकी गंध । इस मेले में एक अच्छी बात दिखी पानी के चापाकल लगा दिए गए हैं । पहले यहाँ कुएं का पानी प्रयोग में लाया जाता था । जरा सा कुछ खाया नहीं कि हाथ धोने कुएं के पास वहाँ अफरा-तफरी का माहौल बन जाता था । फिर बाहर गिरते हुए पानी से मामला और अव्यवस्थित हो जाता था और यही हाल पास के एक स्थान दिवारी के मेले की भी होती थी । वहाँ के चापाकल की दशा देखकर आसपास के गावों में दीवारी के कल एक प्रतीक के रूप में प्रचलित हो गया । इधर की मैथिली को खास अपना प्रतीक मिला । मैं भाषा की प्रक्रिया को अपने समाज से अंतःक्रिया करते हुए होता हुआ मानता हूँ । इस दृष्टि से लोक, भाषा के सुदृढीकरण में खासकर नए शब्दों के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाता है । ये केंद्र ही हैं जो उन शब्दों को सीमित और नियंत्रित करते हैं । केंद्र की आधिपत्य स्थापित करने की प्रवृत्ति भाषा के सरल प्रवाह को काट-छांट कर प्रचलित शैली और रूप को नियंत्रण में रखती है ।
  इस मेले की बातें कुश्ती और लौंडा नाच के बगैर पूरी नहीं हो सकती । मेले में कुश्ती की प्रतियोगिता और उसमें शामिल होने आए दूर दराज के लोग इस समाज की उस प्रवृत्ति को लक्षित करते हैं जिसमें वह अपने कुछ जनजातीय तत्वों को अभी तक बरकरार रखे हुआ है । आपसी ज़ोर आजमाइश का वही आदिम तरीका । नगाड़े की आवाज पर भुरभुरी मिट्टी में अपने अपने इलाके के बलिष्ठ चुनौती देते , ललकारते और एक –दूसरे की तैयारियों का जायजा लेते दिखते हैं । वहीं दर्शक चारों ओर खड़े होकर कभी अपने इलाके के पहलवान के चित होने पर दुखी तो कभी तालियाँ बजाते हैं । ताकत की इस आजमाइश में स्त्रियाँ दशकों में नहीं होती । उनके लिए यह एक निषिद्ध क्षेत्र है जहां शायद उनकी उपस्थिती अनिवार्य रूप से प्रतिबंधित है ।
इधर के इलाके में लौंडा नाच ही चलता है । जो लोग भारतीय परिदृश्य से इस कलारूप को अब समाप्त हुआ मानते हैं वे उत्तर बिहार के कोसी अंचल में आकार देख लें यह कितनी जीवंत है । यहाँ के बैंड-पार्टी का यह अनिवार्य हिस्सा है जो किसी भी पारिवारिक या सार्वजनिक आयोजन में आते जाते रहते हैं । मेक-अप से लिपा-पुता लड़का किसी भी धुन पर एक तरह से ही नृत्य करता रहता है । एक ने बताया था कि यह सब करना सरल नहीं है वह कभी भी नशा किए बिना ऐसा नहीं कर पाता है । बहरहाल मेलों आदि में चलने वाले नाच में एक कथा होती है जिसे नृत्य और गीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है । कथा हमेशा उदात्त ही होती है किसी न किसी धार्मिक कथा से जुड़ी होते हैं । जिसे मज़ाक में लिपटा कर पेश किया जाता है । स्थानीय तंज़ पर जोरदार हंसी छुट्टी है । यहाँ भाषा खुली होती है उसमें कुछ अश्लील छौंक भी पड़ जाए तो कोई विशेष बात नहीं । वैसे इससे ज्यादा अश्लीलता तो हिन्दी की फिल्मों में है ।
  इस मेले को उठते कभी नही देखा मैंने । कई बार तो यह रात में खतम हो जाता था । तड़के उधर बड़ी सहजता से दिशा-मैदान के लिए जाया जा सकता है । मेला खतम होते होते हर बार कुछ नए सपने बुने जाते हैं – अगले साल गेहूं जल्दी तैयार कर लेने के , कुश्ती के ज्यादा दांव-पेंच सीखने के क्योंकि जलेबियों की ओर लगातार ललचायी दृष्टि से देखते बच्चे को देखा नहीं जाता और कुश्ती में हारने वाले को कोई नहीं पूछता है । इसके बावजूद हर साल पचासियों बच्चे मेले में सेव-घोंटते रहते हैं ।
·         सेव घोंटना – स्वादिष्ट पदार्थ को देखकर बहुत ज्यादा लार मुंह में आती है और जब वह न मिले तो लार को वापस गटकना होता है । मैथिली या कहें ठेठी में इसे सेव घोटना कहते हैं । 

अप्रैल 18, 2013

ये बोलते पेड़



कितना अच्छा होता कि हम सब न कुछ बोल पाते और न ही सुन पाते । सहज रूप से एक दूसरे को या कि और अधिक लोगों को देखते हुए सारे कार्यकलाप करते जाते तो बहुत सारी स्थितियों में फँसने की आवश्यकता ही न पड़ती । किसी से कुछ बोलना ही नहीं होता तो चुगली हो जाने या अपनी बात के गलत तरीके से इस्तेमाल होने या गलत बोल दिए जाने की स्थिति ही न आती । कभी किसी बात के लिए कठघरे में खड़े होने की जरूरत ही नहीं पड़ती । झगड़े झंझटों से शर्तिया मुक्ति मिल जाती । पेड़ों को देखिये कितने मजे में खड़े रहते हैं सब बिना कोई आवज किए चुपचाप खड़े रहते हैं किसी को किसी से कोई शिकवा नहीं और यदि है भी तो वह ज़ाहिर न हो पाती ।
        बोलने की आदत ने जितना हमारा काम आसान किया उससे ज्यादा जीवन को जटिल कर दिया ।  इसने अभिव्यक्ति को एक माध्यम तो दिया जिससे कि हम मन में चल रही अपनी तमाम उठापटकों को शब्द दें और दूसरों तक पहुंचा सकें पर इसी दशा ने जो जटिलताएँ दी उसमें जितनी बार घिरा हूँ उसे महसूस कर लगता है कि न ये बोला होता , वो न बोला होता । बोलना जितना भी व्यक्ति सापेक्ष हो इसकी पूरी प्रक्रिया उतनी ही समाज सापेक्ष हो जाती है । मैं जब बोलता हूँ तो हमेशा वह नहीं बोलता जो मैं सोचता हूँ या कि जो मुझे बोलना चाहिए बल्कि यह कि अपने आस पास को देख के बोलता हूँ या तो उनकी बातों से संगत बातें या उनसे सीधे तौर पर मुखतलिफ़ ।
  कई लोग इससे सहमत हो सकते हैं कि बोलने से उनका नुकसान हुआ है । सैद्धांतिकी, विमर्श , बोलने का समाजशास्त्र आदि हमें जो भी बताएं पर सामान्य जिंदगी में उनका कोई लेना देना उस हद तक नहीं है जिस हद तक कि बड़े-बड़े विद्वान उसे मानते हुए अपनी दुकान चलाने के लिए शोर मचाते हैं ।
बोली गयी बात एक ऐसा उत्पाद है जिस पर किसी का स्वाभाविक अधिकार रहनहीन जाता फिर उसे समेटने, लपेटने, ओढ़ने-बिछाने का कार्य भी बोलने वाले की हद  से बाहर हो जाता ही है । आपकी बोली हुई बात कब शिकायत और एक मजबूत हथियार बनकर आपके सामने खड़ी हो जाए यह तय कर पाना कठिन है । उस दशा में अपना मन ही यह मानने को तैयार नहीं होता कि ये हमने ही कहा है । मुझे याद है एक बार मेरी माँ ने अपनी सहजता में किसी के द्वारा किसी के विरोध में कही गयी बात को उसके सामने ज्यों का त्यों रख दिया । बोलते वक्त बहुत कम लोगों को अंदाजा रहता होगा कि कोई भी बात कितना और किस किस दिशा में असर करेगी । ये अंदाजा मेरी माँ को भी नहीं था फिर जिन लोगों ने आपस में एक दूसरे के लिए कुछ का कुछ बोला था उन दोनों ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोल दिया .... इसका नतीजा ये हुआ कि माँ ने उस दिन से लोगों से खुद को काट लिया । ये तय है कि मेरी माँ के द्वारा किया गया कार्य चुगली (वैसे भी चुगली करने और बोलने में ज्यादा अंतर नहीं है ... मैं अपने बहुत से मित्रों को जनता हूँ जो अपनी स्थिति श्रेष्ठ करने के लिए किसी और की काही गयी  बातों को चुगली की शक्ल देकर पेश करते हैं । उन्हें स्वाभाविक रूप से इसका फायदा मिल भी जाता है ) की श्रेणी में आता है पर उनके स्वभाव को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वो चुगली नहीं करती । फिर भी करने वाले से ज्यादा बोलने वाले का दोष हो गया ।
बोलने में मज़ाक का एक बड़ा हिस्सा है और इसी तरह इसका असर भी ज्यादा होता है । आपकी अपनी गलती से आपका नुकसान हुआ हो फिर भी यदि आपका किसी ने मज़ाक उड़ा दिया तो आपको अपनी गलती नहीं दिखेगी बल्कि मज़ाक करने वाला सबसे बड़ा अपराधी नजर आएगा । ऐसा जैसे उसी ने सारा किया धरा हो और आप बेवजह घसीट लिए गए हों । पर गलती तो आपकी है ही । ये बात बहुत सरलता से न आपका मन मानेगा और नहीं आप इसे बहुत जल्द महसूस कर पाएंगे । जब ऐसा होता है तो यह आपके अंतरवैयक्तिक संबंध पर बहुत असर डालता है । आपके अंदाजे से बहुत पहले ही सम्बन्धों की टूटन स्पष्ट होने लगेगी ।
  ये लिखते हुए मुझे लगता है कि मेरी शैली शिवशंभू के चिट्ठे जैसी हो गयी है – जिसको कहा जाए उसे सीधे सीधे । शायद उन सब तक बात पहुंचाने का यही रास्ता हो । उनके बोले गए शब्द बड़ी आसानी से यथार्थ मान लिए जाते हैं फिर वो बातें एक बहुत लंबा रास्ता तय करते हुए अपने ही आस पास पहुँच जाती है । अजीब स्थिति तब होती है जब आपके बोले गए शब्द घूम फिर कर मगर बदले हुए स्वरूप में आप तक पहुँचते हैं । वे ऐसे परिवर्तित होते हैं कि हठात आप कह दें कि ये तो आपने कहा ही नहीं । पर जब इसकी पूरी तहक़ीक़ात-ओ- दरियाफ्त करेंगे तो आपको लगेगा कि आपने गोबर की ढेरी में ढेला मारा है । एक अनावश्यक सी छीछालेदर के अलावा हासिल होने जैसा कुछ रह नहीं जाता है ।
अभी हाल का प्रसंग है । कुछ दोस्तों में आपसी खींचतान चल रही थी । उन सब के अलावा हम सब भी चाहते थे कि ये सब बहुत जल्द खत्म हो जाए सो अपने अपने प्रयास कर रहे थे । मुझे यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है  कि प्रेमचंद की एक कहानी की तरह ही सभी पक्षों को खुश कर के मनमुटाव खत्म करवाने का तरीका हम सबने अपनाया पर एक पक्ष तो इतना ज्यादा खुश हो गया कि उसे अपनी गलतियों का आभास ही नहीं रहा । उसके लगा कि ये सब तो उसके ही खिलाफ किया जा रहा है वह तो पूर्णतया मासूम है । उसने इसे ही हथियार बनाकर अपनी स्थिति को ऊंची करने की कोशिश की इसी कोशिश में में कब उसने मध्यस्थों का विश्वास खो दिया उसे पता ही चला ।
धूप जितनी तेज थी उससे भी बढ़कर लग रही थी । मौसम को छेड़ने की हिम्मत किसी में कहाँ थी ।

अप्रैल 06, 2013

एफ एम चैनल पर गलियाँ और सानिया भाभी


हम मित्रों की एक आदत है कि जो भी कुछ नया हो वो एक दूसरे से जरूर साझा किया जाए । बहुत सारे या लगभग सभी ऐसा ही करते होंगे लेकिन हम शायद मित्रों से साझा करने के लिए ही नया नया खोजते रहते हैं । संगीत और वीडियो के मामले में ऐसा खूब होता है । परसों मित्र ने अपने फोन को स्पीकर से जोड़ कर ध्यान से सुनने के लिए कहा । हालांकि आवाज इतनी स्पष्ट और तेज थी कि उसके लिए ध्यान देने कहना समझ नहीं आया ।
वह किसी एफ एम चैनल के किसी कार्यक्रम के एक हिस्से की एक रिकॉर्डिंग थी । प्रस्तोता ने किसी एक व्यक्ति को फोन मिला कर उससे तीन गानों में से किसी एक के संगीत निर्देशक का बताने पर उसके मोबाइल फोन खाते को 150 रुपयों से रीचार्ज करने की बात कही । वह व्यक्ति सहज ही तैयार हो गया । उसे जो तीन गाने सुनाये गए वो अरब या रूसी मूल के रहे होंगे या फिर चैनल और प्रस्तोता ने खास तौर पर तैयार कराये होंगे । जाहिर ही है कि वह व्यक्ति नहीं बता पाया । इसके बाद असली खेल शुरू हुआ । प्रस्तोता द्वारा कहा गया कि क्योंकि वह व्यक्ति किसी भी गाने के निर्देशक नाम नही बता पाया इसलिए उसके मोबाइल के खाते से 900 रूपय काट लिए जाएंगे । अभी नहीं होंगे तो बाद में उसके रीचार्ज कराते ही काट लिए जाएंगे । इसके बाद उस व्यक्ति का धैर्य जवाब दे गया । उसने तरह तरह की गालियाँ देनी शुरू कर दी । उन गालियों को किसी भी पैमाने पर रखें तो वीभत्स की श्रेणी ही मिलेगी । फिर प्रस्तोता ने उस व्यक्ति को गुस्सा न होने की सलाह देते हुए उसके मित्र का नाम बताया जिसने प्रस्तोता का उसका नंबर दिया था । इसके बाद तो उस व्यक्ति का गुस्सा और बढ़ गया उसने अपने उक्त मित्र को ठीक ठाक मात्र में गाली देते हुए अपने बैंड बजने की बात स्वीकार कर ली और सम्पूर्ण निर्लज्जता के साथ एक जोरदार हंसी भी हंसी ।
इसके बाद मित्र ने किसी सानिया भाभी की रिकॉर्डिंग सुनाई । सानिया भाभी की आवाज की सायास मादकता और उनके संवादों में स्पष्ट आमंत्रण और द्विअर्थी में से व्यंग्यार्थ की ओर झुकाव उन्हें  सविता भाभी का रेडियो संस्करण बना देते हैं ।
इस तरह के काम एफ एम चैनलों पर पहले भी होते थे पर तब और आज में एक अंतर आ गया अब गालियों के लिए बीप का प्रयोग नहीं किया जाता कम से कम इस चैनल ने तो नही किया । उक्त चैनल अपने को आप के जमाने का चैनल कहता है बाप के जमाने का नहीं । गालियों का अस्वीकार पुरातनपंथी होना है और गालियों की सार्वजनिक प्रस्तुति कूल होने की पहचान । कूल होना मतलब गालियां देना या इसको स्वीकार करना यह इन आज के जमाने एफ एम चैनलों के बहुत सारे सरलीकरणों में से एक है । कूल होना बुरा नहीं है पर इसके बनने के क्रम में एक बात को बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा कि ये गालियां फलित कहाँ हो रही हैं । उनका सीधा असर सुनने वाले की माँ ,बहन और अन्य स्त्री संबंधियों पर ही होता है । बोलने वाला और सुननेवाला दोनों गालियों के असर से मुक्त होता है । गालियां तत्वतः एक शाब्दिक बलात्कार हैं जिनसे यह ध्वनित होता है कि गाली देने वाले को बस मौका मिलने की देर है इसलिए तब तक वह शब्दों से काम चला रहा है अन्यथा वह अपने पुरुषत्व का प्रयोग वहाँ कर ही आता । गाली देने वाला सामने वाले पुरुष को यह मान कर चलता है कि वह अपने घर की स्त्रियों की यौन सुचिता का रक्षक है अतः वह उसकी इस भूमिका पर शब्दों के माध्यम से हमला करता है । गाली देने वाले का सामाजीकरण अनोखा नहीं है बल्कि यही सबका समाजीकरण है सब इसी तरह से सोचते हुए चलते हैं ।
सानिया भाभी एक तरह से एक समय में प्रसिद्ध हुई सेक्स कार्टून सविता भाभी का रेडियो संस्करण प्रतीत होती है । जो सीधे शब्दों में पुरुषों को आकर्षित करने वाले संवाद बोलती हैं ।
दो महीने पहले जब दिल्ली छोड़ रहा था तो दिसंबर मे हुए बलात्कार के बाद स्त्री के अधिकारों के पक्ष में गज़ब के प्रदर्शन चल रहे थे । तमाम जन-माध्यमों के द्वारा भी इसके लिए मुहिम चलाये जा रहे थे । पर आज देखें तो यह बिलकुल दूसरी दुनिया की ही बात लगती है । वहाँ केरल में था तो एक खबर सुनी थी कि एक रेडियो चैनल धड़ल्ले से अपने आपको मर्दों वाला चैनल बता कर अपने को स्थापित करने की कोशिश कर रहा था । ये सब उसी दिल्ली में हो रहा है जहां उस घटना के बाद स्त्री के प्रति संवेदना जागृत करने के बहुत से प्रयास अपने अपने स्तर पर सभी चलाने लगे ।जिसको जहां मौका मिला उसने वहीं से इसमे योगदान करने की कोशिश की । लेकिन ये सारे बदलाव जैसे कि मैं पहले से मानता आ रहा था ऊपरी बदलाव थे । आज दिल्ली में जितने भी एफ एम स्टेशन चल रहे हैं वे बड़ी पूंजी से संचालित हैं और ये बड़ी पूंजी एक ही साथ दो दो काम कर रही है । एक तरफ तो उनके चैनल के माध्यम से बहुत अच्छी बातें की गयी मुद्दे को बहुत तरीके से उठाया गया पर दूसरी ही तरफ अपने स्टेशन पर श्रोताओं को बांध कर रखने के लिए बिना ज्यादा विचार किए ही ऐसे कार्यक्रम पेश करते हैं जो सीधे सीधे स्त्री को उसी चौखटे में बांध देते हैं जो पुरुषवादी मान्यता के अनुरूप ही है ।
जर्मन रेडियो स्टेशन डायचे वेले ने अपने बंद होने के उपरांत स्वयं को ऑनलाइन लाकर श्रोताओं से संपर्क बनाए रखा । इसी कड़ी में उसने अपने फेसबुक पृष्ठ पर पिछले दिनों एक प्रतियोगिता चलायी कि दिसंबर की उस घटना के बाद के प्रदर्शनों के पश्चात किस प्रकार के परिवर्तन आए । एक भी प्रविष्टि ऐसी नहीं थी जो वास्तविकता को प्रदर्शित करती हो । सबने उस घटना के बाद हुए परिवर्तनों को बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखा । उनके आधार पर देखा जाए तो ऐसा लगेगा कि भारत से तो स्त्री के शोषण का सर्वनाश ही हो गया । अब कहीं भी उसके यौन का मर्दन करने की घटनाएँ नहीं होती , पुलिस हमेशा मदद करने के लिए तैयार है , घर में यौन शोषण खत्म हो गया । इस लिहाज से तो यह आदर्श दशा आ गयी । किसी ने वह प्रतियोगिता जीती भी होगी पर क्या सचमुच ऐसा हो गया ?
दिल्ली में एफ एम चैनलों के माध्यम से एक बहुत बड़ी आबादी का मनोरंजन होता है जिससे उन पर निश्चित तौर पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है जो केवल एक दो जगह रात को पहुँच कर महिलाओं के सुरक्षा की जांच कर लेने भर से ही पूरी नही हो जाती । उस ज़िम्मेदारी के मनोरंजन के समग्र तौर तरीकों से परिलक्षित होने की अपेक्षा है । जबकि एक तरफ नितांत स्त्री विरोधी होकर जो संदेश ये एफएम स्टेशन दे रहे हैं वह निश्चित तौर पर उनकी भूमिका को कटघरे में खड़ा करती है । 
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