जून 28, 2013

अयप्पन की जो तस्वीर मैंने देखी


मुझे नहीं पता कि समूचे भारत में इसकी कोई खबर है भी या नहीं । यह भी मेरी जानकारी से बाहर ही है कि हिन्दी के 'राष्ट्रीय' अखबार और समाचार चैनलों ने इसको कितना महत्व दिया । पर जिस तरह से हम समाचार के संबंध में पढ़ते आए हैं कि उसमें अनोखापन होना चाहिए तो इसमें अपनी तरह का अनोखापन भी है ।  समाचार की दुनिया में ऐसा माना जाता है कि कुत्ते ने आदमी को काट लिया तो सामान्य बात और आदमी ने कुत्ते को काट लिया तो अनोखापन और जब बात में अनोखापन आ जाए तो वह खबर बन सकती है । बहरहाल उस घटना में इस अनोखेपन का मसाला भी था सो उसके खबर बनने की पूरी संभावना दिखती है ।


अयप्पन की जो तस्वीर मैंने देखी उसमें वह कोई बहुत मजबूत युवक नहीं लगता और इतना मजबूत तो कतई नहीं कि वह अपनी गर्भवती पत्नी को अपनी पीठ पर लाद कर लगभग 18 घंटे चलता रहे और उसे अस्पताल तक ले आए । इस असंभाव्यता के बावजूद उसने ऐसा किया । अयप्पन की यदि पहचान बताई जाये तो यह बताना ही पड़ेगा कि वह आदिवासी है । यहाँ मेरा आदिवासी शब्द से परहेज इसलिए है कि हमने जिस तरह से इस शब्द को समझा है वह इस शब्द के प्रयोग को ही कटघरे में खड़ा कर देता है । शायद सबसे बुरी पहचान यही शब्द देता है । इसी तरह इसका अंग्रेजी समकक्ष 'ट्राइबल' भी एक हीनता ही प्रदर्शित करता है ।  अयप्पन एक आदिवासी है और उसका घर केरल के घने वनों के इलाके कोन्नी में है । अबतक शायद किसी ने ये नाम सुना भी न होगा पर अचानक से यह नाम कम से कम केरल के सभी समाचार पत्रों में तो आ ही गया । 


जो तस्वीर अखबारों में छपी उसमें वह पीली कमीज पहने हुए है खूब बढ़ी हुई दाढ़ी है और बिखरे से बाल, नजरें नीचे । तस्वीर देखने से लगता है कि वह बिलकुल ही निरपेक्ष सा है । आम तौर पर होता है कि मिडियाकर्मियों को देखते ही लोग मुखर हो जाते हैं । कष्ट में हैं तो गहरी विह्वलता प्रदर्शित की जाती है ताकि उनकी ओर ध्यान जाए । अयप्पन शायद न जनता हो कि उसने जो किया उसे लोग एक कौतूहल की दृष्टि से देखेंगे । लोगों के लिए भले ही यह एक अनोखी बात हो पर उसने तो केवल अपनी पत्नी की जान बचाई ।


अयप्पन का घर देश के उन्हीं इलाकों में से एक है जहां स्वास्थ्य सेवा स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी नहीं पहुँच पायी हैं । उसकी पत्नी सुधा जब गर्भवती हुई तो उसके लिए वहाँ कोई डॉक्टरी नहीं थी । इन इलाकों में कोई सुविधा ही नहीं है तो सुधा क्या किसी की भी हालत खराब हो क्या फर्क पड़ता है ! देश को भी कोई फर्क नहीं पड़ता ! सुधा को उसके पति अपनी पीठ पर ढ़ोकर बाहर अस्पताल तक पहुंचा तो दिया पर उसका बच्चा नहीं बच पाया । शायद सुधा भी नहीं बच पाती पर समस्याओं से लड़ने की जिद ने उसे बचा लिया । इसके साथ ही यह उस अंधेरे दायरे में हमें ले जाता है जहां अब भी यदि आदमी बीमार हो तो अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है । मीडिया इसे अपने तरह की पहली और एकमात्र  घटना मान रहा है । इसकी यह विशेषता यह सोचने पर बाध्य करती है कि यदि सुधा का पति उससे इतना प्यार नहीं करता तो सुधा का क्या होता ! जो उसके इलाके या उस जैसे कई इलाकों के लोगों का होता आया है वही होता । मौत उसे बता कर आती और कोई कुछ नहीं कर पाता ।


अयप्पन जब अपनी पत्नी को पीठ पर बांध कर चला था तब सुबह भी ठीक से नहीं हुई थी और लगातार बारिश भी हो रही थी । जंगल और पहाड़ी रास्ते पर धारासार वर्षा पर अयप्पन के लिए चिंता का विषय केवल जंगली हाथी थे । उसे पता था कि उसकी हिम्मत उसे बारिश और रास्ते के असहयोगों से तो बचा लेगी पर उन्मत्त जंगली हथियों से बचना मुश्किल है । उसे हाथी नहीं मिले । किसी तरह वह रात को अस्पताल पहुँच पाया । छोटे अस्पताल से फिर उन्हें बड़े अस्पताल जाना पड़ा । उसने जब ये बातें पत्रकारों को बताई होगी तो उसके चेहरे पर भी संतोष रहा होगा और देखने सुनने वाले के लिए यह किसी आश्चर्य से कम नही रहा होगा । यह तो वही जनता होगा कि कितना कठिन रहा यह सब ।



इसे एक गाथा के तौर पर मैं भी देख रहा हूँ और मुझ जैसे बहुत से लोग होंगे । हम इस बात से खुश हो सकते हैं कि हमें एक ऐसी प्रेम गाथा मिल गयी  जो हमारे समय में घटित हुई है और इसकि हम जांच कर सकते हैं । अन्यथा हमारी गाथाएँ तो अपने ऊपर संदेह करने का भी अवसर नहीं छोडती । पर क्या यह गाथा हमारे समाज के लिए जरूरी थी । निश्चित तौर पर नहीं । लेकिन हम जिस तरह से काम करते हैं बल्कि हमारी तमाम प्रणालियाँ जिस तरह से काम करती हैं वे इस तरह की गाथाओं के प्रकाश में आने के बाद भी यह ज़ाहिर भी होने देती हैं कि उनका अस्तित्व भी है । अयप्पन जैसे लोग हमारी व्यवस्था के मुखौटे को उतार कर उसे उसके मूल रूप में ले आते हैं जहां लोककल्याण जैसी कोई बात ही नहीं है । अपनी पत्नी से प्रेम प्रदर्शित करना बहुत बढ़िया बात है पर यदि ऐसा करने के लिए इतना संघर्ष करना पड़े तो विरले ही हिम्मत कर पाएंगे । सरकार के लिए तो यह उन्हीं बहुत सारी घटनाओं में से एक है जो शायद कोई महत्व नहीं रखती पर इसके माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली के प्रति उसकी उदासीनता छिप नहीं पाती है । 

जून 19, 2013

खाली जेब और गरीब मानने का चलन



ये दिन ऐसे हैं कि कह सकता हूँ कि गरीबी में काट रहा हूँ  क्योंकि आज तक जो सीखा है उसके भीतर गरीबी की समझ केवल पैसे के न होने से ही बनती है । जेब में पैसे न हो तो गरीब और हों तो जो कह लीजिये पर अभी तक दूसरी स्थिति आई नहीं है । वो दशा बनते बनते रह जाती है और मन  यह महसूस करते करते कि गरीबी के इतर भी कोई भाव हो सकता है । नौकरी सरकारी लेकिन नयी है । सो सरकार को अब तक  विश्वास नहीं हुआ है कि मैं उसी के साथ रहूँगा इसलिए छुट्टियों के दो महीने का वेतन अपने पास ही रख लिया है और वह तभी जारी करेगी जब उसे विश्वास हो जाएगा कि मैं भागने वाला नौकर नहीं हूँ । यह अवधि साल भर की भी हो सकती है और छह महीने की भी । आपसदारी की बात तो ये है कि मैं भी सरकार पर विश्वास नहीं कर रहा हूँ ! मेरा अविश्वास कुछ और बातों को लेकर है । दूसरे, सरकार को यह समझना चाहिए कि आज के भारत में कोई भी उसकी चाकरी छोडने से पहले हजार बार सोचता होगा ।  खैर , जब जेब खाली है तो गरीब मानता हूँ खुद को क्योंकि ऐसा ही मानने का चलन है । ये ऐसी स्थिति है कि कुछ ही पानी बचा हो आपके पास और प्यास तेज हो जाए ! जब केरल पहुंचा था तब अंटी में कुछ खास रह नहीं गया था । पिताजी के हवाले से जो प्राप्त हुआ था वो जहाज के किराए से टैक्सी तक के किराए में चला गया और अपनी कुल संपत्ति सैकड़ों में पहुँच गयी ।


नवोदय की व्यवस्था है सो रहने - खाने चिंता नहीं है और इसी ने एक बेफिक्री भी दे रखी है कि चलो जी कुछ सौ रूपय भी हों तो जीवन चल सकता है खाने और रहने के अलावा चाहिए ही क्या ! और वह मिल ही रहा है । लेकिन बचपन में एक कहानी पढ़ी थी संस्कृत की किताब में उसमें एक चूहे ने अपने बिल में बहुत सारा धन जमा कर रखा था ।  वह अनायास अपनी बाहें फड़का कर चलता था । उसे लगता था वह सबसे धनी है । जंगल में चोरों को इसकी भनक लग लग गयी फिर एक दिन चूहे के बाहर निकलते ही चोर सारा धन लेकर चंपत हो गए । धन के चोरी हो जाने के बाद चूहा बहुत दिनों तक घर से बाहर ही नहीं निकला और जब निकला तो उसकी चाल की सारी अकड़ गायब थी । संस्कृत में पढे ज्ञे पाठ से संस्कृत में केवल एक टर्म याद आ रहा है - धनीनंबल्ल्वांलोके । इसका अर्थ जो भी हो पर इस कहानी से यह समझ आया था कि पैसे की कमी हो जाने से व्यक्ति की अकड़ खत्म हो जाती है - उस चूहे की तरह । 


कुछ तो यहाँ काम के घंटे  इस तरह के हैं और दूसरा यह भी कि प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो ही जाती है सो बाहर बाजार की ओर रुख बहुत सोच विचार के पहले नहीं होता । पर जब बाजार की ओर जाना होता है तो बाजार बहुत आकर्षक नहीं लगता । जो जरूरत की सामाग्री है वही लेकर आना हो तो इधर उधर देख कर भी एक अपरिग्रह सा बना रहता है क्योंकि  मन अनावश्यक भटकता ही नहीं । मन को पता है कि बाहर जेब में उतने ही पैसे हैं जितने में आवश्यक सामाग्री आ जाए । सो मन बहुत सारी चीजों को प्राप्त कर लेने की दृष्टि से देखता ही नहीं । मुझे पता है कि यह मेरे मन की स्थायी स्थिति है जो बहुत हद तक परिस्थितियों के दबाव में बनी है पर ऐसी स्थिति यदि लगातार बनी रहे तो मन बहुत नियंत्रित हो सकता है । मन पर इस तरह का नियंत्रण एक तरह से सब इच्छाओं के निरोध की स्थिति है । पर क्या सभी इच्छाओं का दमन हो सकता है ? यदि ऐसा है तो वह बाहर से तो बहुत अच्छी स्थिति होगी पर आंतरिक रूप से बड़ी जटिल दशा होगी । मन को पता होगा कि यह बाहर के लिए बनाया गया झूठ है ।  ठीक उसी तरह जैसे आँख बंद कर लेने से भी  दृश्य दिखते रहते हैं बाजार का लोभ भीतर बना ही रहता है । हठ से किए जा रहे योग कि तरह !


 ऊपर ही स्पष्ट कर दिया है कि यह चेतन पर जड़ की विजय की तरह से केवल क्षणिक बाह्य बदलाव है फिर भी इसने बाजार को देखने की एक दृष्टि तो दी ही है । मन पूर्ण है तो बाजार मेरे लिए निरर्थक है । मतलब यदि यह पहले से ही तय है कि क्या और कहाँ से खरीदना है तो बाजार की पूरी रौनक और उसके रंग और उसका आकर्षण मेरे लिए निरर्थक है । जरूरत का समान खरीदते ही पूरा बाजार आसानी से मेरे लिए नहीं के बराबर हो जाता है । चला आता हूँ चुपचाप एक अनावश्यक हाय-तौबा से बचते हुए । यह स्थिति मजबूर करती है उन दिनों को याद करने के लिए जब जरूरत न होने पर भी व्यर्थ में कुछ भी खरीदने के लिए बाज़ारों में यहाँ-वहाँ भटकता था । दो तीन साल पहले हम कुछ दोस्त चाँदनी चौक से सदर बाजार और फिर नयी सड़क यूं ही भटकते रहते थे और कितनी ही बार बेकार और अनावश्यक समान खरीद लाते थे । ऐसे ही मैंने एक साग काटने की मशीन खरीदी जो बिना एक भी दिन प्रयोग में आए हुए छज्जे पर पड़ी है वहाँ बिहार में ।


पर्चेजिंग पावर एक गर्व देता है जिसकी हीनता मैं पहले भी महसूस किया करता था क्योंकि बेरोजगारी थी और आमदनी कुछ थी नहीं । वहीं दोस्तों में इसको लेकर एक उन्मुक्तता थी जिसे वे लगातार ज़ाहिर भी करते चलते थे । उन क्षणों में अपने को मैं बहुत स्पष्टवादी पाता रहा हूँ जो सीधे स्वीकार करता था कि उसकी जेब में पचास रूपय हैं । ये रूपय किस मूल्य के हैं ये तो हम सभी जानते हैं पर इसके होने भर से के आत्मविश्वास होता था  कि कुछ तो है पास में ! कम पैसों में काम चलाने का ढंग सीखने की जरूरत नहीं थी ।  मेरे बचपन  के बिहार सरकार के किसी कर्मचारी के बच्चों के लिए यह अनुभव आधारित ज्ञान था जो वे सहज ही सीख लेते थे । हमारे घर स्थिति अभी भी कमोबेश वैसी ही है पर बाकी घरों का अब कह नहीं सकता क्योंकि वह सब बहुत दूर हो गया । बहरहाल एडजस्ट करना सीखने की जरूरत नहीं थी । अपने दोस्त सभी यू जी सी की फ़ेलोशिप पाने लगे थे सो उनका अंदाज तो अलग रहता ही था क्योंकि उनके पास एक क्रय शक्ति थी और उसी के अधीन उनहोंने मुझ पर भी थोड़े बहुत खर्च करने की नैतिक ज़िम्मेदारी ले ही ली थी । पर यह एक हीनता का भाव देती थी जिसे मित्रों पर ज़ाहिर तो नहीं ही होने दी अलबत्ता मैं यारबाशियों में कम शामिल होता था । लगातार तो कभी नहीं । अपने दोस्तों की फ़ेलोशिप से बने उनके पर्चेजिंग पावर का अनुभव है और फिर कुछ आए दिन के अनुभव तो हैं ही जो ये बताते हैं कि बाजार के पास व्यंग्य की शक्ति है ।


विश्वविद्यालय के बस स्टॉप पर बहुत देर तक खड़े रहने के बाद भी कोई बस नहीं मिलती थी तो सड़क पर दौड़ती चमकती गाड़ियों को देख कर कोसने को जी चाहता था । वह एक कठिन व्यंग्य जैसा ही होता था अपने लिए । जैसे किसी ने आँखों में उंगली डालकर दिखाया हो कि देखो उसका नाम गाड़ी है जिससे तुम वंचित हो यदि वह तुम्हारे पास होती तो तुम अब तक घर पहुँच गए होते । शायद यही मेरे उस मित्र ने भी महसूस किया हो जब कोई उसे कहता है कि तुम्हारे पास वैसा फोन क्यों नहीं है जिसमें सारी सुविधाएं रहती हैं और ऐसा ही मेरे भाई ने जब उसे लोग कहते हैं कि उसको अब तो एक गाड़ी ले ही लेनी चाहिए । पर यहाँ रुकना पड़ेगा । बाजार का मुझ पर किया गया व्यंग्य मेरे दोस्त और मेरे भाई से अलग तो नहीं पर सापेक्षिक अंतर लिए तो जरूर है । जैसे जिसके पास बस में देने के पैसे नहीं है उसके लिए बस एक व्यंग्य हो सकता है । मेरे नानीगाँव से कई बार यह कोशिश हुई कि गाँव से स्टेशन तक की सीधी यातायात सेवा हो जाए । कई जीप वालों ने तिपहिया वालों ने ज़ोर लगाया ।  कुछ दिनों तक गाडियाँ चलायी भी लेकिन कुछ दिनों के बाद बंद कर देनी पड़ी । इसका कारण था सवारी की कमी । लोग उन गाड़ियों के सामने से पैदल ही निकल जाते थे क्योंकि गाड़ी में बैठकर स्टेशन जाना उनके लिए एक सुविधा थी जिसका उपभोग करने के लिए उनके पास 10 रूपय नहीं थे । तब मैं बहुत छोटा था फिर भी उन वाहन मालिकों का व्यंग्य समझ ही सकता था । व्यंग्य की यह शक्ति बाजार के चरित्र में निहित है और इसी ने बाजार को जरूरतों को पूरा करने वाली व्यवस्था के बदले आज का चरित्र प्रदान किया है ।


अभी गरीबी को केवल इसी तरह समझा है जिस तरह समझाया गया । लेकिन इधर के दिनों में इसे दूसरी तरह से समझने के लिए भले ही बाध्य हुआ हूँ लेकिन समझ में बदलाव की खुशी है । रामकृष्ण परमहंस का अपरिग्रह या कि कबीर का साईं इतना दीजिये आदि भोग कर पहली बार समझ पाया । जेब खाली होने पर अब बेचैनी नहीं होती । आवश्यकता को जेब से तय होते देख रहा हूँ । मन बाजार में यूं ही फिरने को भी नहीं करता । अब जो हालात हैं उसमें मैं पैसे नहीं होने को एक स्थिति मानने लगा हूँ । लेकिन यहाँ भी एक पल ठहर कर तय कर लेना होगा कि यह जो स्थिति है वह केवल तब है जब मेरे खाने रहने की कोई चिंता नहीं है उस तरफ से बेफिक्री है । उस दशा की केवल कल्पना ही की जा सकती है जब जेब भी खाली होती और रहने खाने का भी कोई इंतजाम नहीं होता । पर एक बात यह भी है कि अब यदि वह दशा भी आएगी तो मन में उसके प्रति घबराहट कम ही होगी ।

जून 12, 2013

हम्माम में आँखें


सबकुछ ठीक चल रहा था और चलता ही जा रहा था ! रुकने का नाम ही न ले ! आखिर कितने दिनों तक कोई इतने ठीक होने की उम्मीद करता अखिर किसी भी बात की एक हद होती है सो ठीक चलने की भी होनी चाहिए । क्यों ! आखिर उनके काम का तरीका भी यही था कि सबकुछ ठीक चलता रहे । यह तरीका लगभग हम सभी स्वीकार चुके थे । सो अब अपने लिए तो कोई आश्चर्य की वस्तु नहीं रह गयी थी फिर भी उनकी लिए तो थी ही जो नए नए मिलते थे और जिनकी बिलकुल नयी आमद हुआ करती थी । इन नयों की हालत ठीक वैसी ही जैसे कि अपनी तरह का पहली बार धनी होने वाला । खूब बातें होती उस ठीक चलने पर । फिर एक दिन ऐसा हुआ कि लगा अब तो सब बंद हो जाएगा । जो अब तक ठीक चलते हुए आ रहा था वह रुक जाएगा । जिन साहब का यह सब ठीक चल रहा था संकट तो उनके लिए था । अपने लिए तो ये तब भी खालिस मनोरंजन था और अब भी । पर जिसकी ज़िंदगी ही वही हो !

अचानक से अखबारों में खबर आयी कि अमेरिका में इन्टरनेट पर जो भी किया जा रहा है उन सब को कोई देख रहा है । यह कोई और नहीं बल्कि वहाँ की खुफिया एजेंसी है जो सरकार के इशारे पर और सुरक्षा के नाम पर ऐसा कर रही है । वह भी आज से नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से । अमेरिका में तो भैया गज़ब हँगामा हुआ है और हो रहा है । आखिर जो सब चल रहा था वो व्यक्तिगत नहीं रह पाया था जिसकी आश्वस्ति के बाद ही लोग ऐसा या वैसा कर रहे थे ।

फर्ज़ कीजिये कि आप फेसबुक पर हैं और लोग यह समझ गए हैं कि आप वहाँ क्या करते हैं तो आप वहाँ से तुरंत भाग कर किसी अन्य साइट पर चले गए । आप अकेले ही नहीं गए बल्कि कई और को भी ले गए जो आपकी उस गतिविधि के धारक हैं । आप इस उम्मीद में गए कि चलो यहाँ तो अपन मजे में बहुत कुछ करेंगे और जनता को जब तक पता चलेगा तब तक हम नया ठिकाना तलाश लेंगे । जनता तो जब आती तब आती । आपकी फूटी किस्मत पर डाका डालने सरकार ही पहुंची हुई है वहाँ इस सूचना के साथ कि साहिब जो जितना गुप्त है वह उतना ही असुरक्षित ।

... तो इस ठीक चलती इन्टरनेट की दुनिया में अचानक से कुछ गलत होने जैसा मामला आ गया । बड़ी बड़ी कंपनियों ने फटाफट कह डाला कि हमारे यहाँ सब सुरक्षित है । पर उनके बयानों से असर का तत्व निकाला ओबामा प्रशासन ने । जी वो कहते हैं कि देश की सुरक्षा के लिए ऐसा तो किया ही जा रहा है । कंपनियों की घोषणा के बाद कुछ लोग मान चुके थे कि चलो हम जो कर रहे थे उसे खुफिया विभाग ने नहीं देखा होगा । पर सरकारी घोषणा के बाद तो सबकी हालत पतली हो गयी । अपने पति रॉबर्ट के बदले किसी भारतीय से स्काइप पर वीडियो चैट करने वाली मिस सुज़ेन और विदेशी के नाम पर भारत में सोशल नेटवर्किंग साइट पर बहुत सारी स्त्रियों में लोकप्रियता बटोरने वाले मार्क या अंटोनी की हालत देखने लायक है । उन्हें लगता है कि अब वे किसी को वीडियो चैट पर आमंत्रित करेंगे तो कोई नहीं आएगा । आएगा या आएगी भी तो जहां तक वे पहुँच चुके थे वहाँ तक तो शायद ही अब जा पाएँ । क्योंकि बड़ा भाई देख रहा है । अब कितने ही ढीठ बन जाओ पर कोई देख रहा हो ऐसी हालत में ढीठ होना भी नहीं चल पाता न ।   

अव्वल बात तो यह है कि देश की सुरक्षा के नाम पर तो इस विश्व में कुछ भी जायज है और इसे बड़ी बड़ी अदालत भी झुठला नहीं सकती । अमेरिका में बवाल मच रहा है । लोग व्यक्ति की निजता का हवाला दे रहे हैं । पर एक बात देखने की हैं कि देख लिए जाने का डर किन लोगों को है । जहां मन में चोर है वहीं डर खड़ा है । मतलब भैया कुछ तो है जिसके किसी के देख लिए जाने का डर है ।

इस खबर को आए हुए बहुत दिन नहीं हुए हैं और हर दिन नए नए देश इसमें जुडते जा रहे हैं कि अमुक देश भी अपने नागरिकों के सारे खटकरम चोरी चुपके से देख रहा है । अब तो भारत का भी नाम आ गया । अपना देश भी हमारी इंटरनेटी गतिविधियों पर नजर गड़ाए हुए है । यहाँ तो हालत और खराब है । अमेरिका तो खैर इतना खुला समाज है कि वहाँ इससे बदनामी नहीं होगी पर अपना देश तो खैर अपना ही देश है । किसी दिन कोई ऑफिसर स्काइप पर नजरें गड़ाए बैठा हो और उसे अपनी ही पत्नी दिख जाए चैट पर ! भैया उसकी नाइट ड्यूटी तो खराब हो ही जाएगी और जिंदगी भी !


अपने देश में जिस तरह से सब कुछ निजी कृत हो रहा है उस तरह से यह भी एक दिन बाजार में बिकने आ ही जाएगा । श्रीमती यादव कुछ हजार रूपय में अपने पति के सारे नए पुराने सत्कर्म निकलवा लेगी और कुचधूम मचा करेगा घर में । अमेरिका जैसे देश में इतनी उन्मुक्तता तो है ही कि लोग एक दूसरे को उन हालत में देखसुन कर भी मज़ाक से ज्यादा कुछ नही बनाएँगे और जीवन भी सामान्य हो जाएगा पर भारत में तो ऐसा न कभी चले । माता-पिता कुंडली से पहले लड़के य लड़की के इन्टरनेट डाटा मंगवाएंगे । आज जो पति-पत्नी एक दूसरे की गतिविधि नहीं जान पाते उनके लिए तो भैया ये वरदान होने वाला है । बस सर जी इसे बाजार में उतार दो और तमाशा देखते जाओ । 

जून 11, 2013

ये जो सपने हैं ....



बचपन में यदि गलती से भी सोने की कोशिश में हाथ ये छाती पर चला जाता तो जो भी बुजुर्ग आस पास होते तुरंत यह कह कर झिड़क देते थे कि छाती पर हाथ रख कर सोने से सपने आते हैं । तब तो नहीं खैर पर अब सोचता हूँ कि ऐसा वे किस विश्वास के साथ कहते थे ! क्या उनहोने कोई शोध किया था इस पर या कोई ऐसी व्यवस्था की थी जिससे पता चल सके कि अमुक व्यक्ति या बच्चा अभी अपनी छाती पर हाथ रखे हुआ है इसलिए सपने देख रहा है ? कितना भी सकारात्मक हो कर सोचता हूँ तो इसकी संभावना कोसों दूर तक नजर नहीं आती । ये उनके पास उनके बुजुर्गों द्वारा हस्तांतरित ज्ञान होगा । यह ज्ञान पीढ़ियों से चलता आ रहा होगा । इस क्रम में कई फेरबदल भी हुए होंगे जैसे कि हमारे यहाँ आज के बुजुर्ग यह कहते हैं कि ' छाती पर हाथ रख कर सोने से ज्यादा सपने आते हैं ' ! उन्होने यह देख लिया होगा कि इसका कोई संबंध यूं तो नही दिखता है पर जब इतने लंबे समय से चला आ रहा है तो यह गलत नहीं होगा । इसमें थोड़े बहुत तो बदलाव हो सकते हैं पर यह कथन अपनी जगह अटल है ।

छाती पर हाथ रखने में भले ही डांट मिलती हो पर इस बात ने सपनों के प्रति बहुत आकर्षित किया । जो सपने याद रह जाते उसको सुबह बताने में खुशी होती । कई बार सपने बे सिर पैर के से लगते । एक दिन यूं ही चला जा रहा था कि आस पास की चीजों को देख कर लगने लगा कि मैं तो इन्हें जानता हूँ इन्हें कहीं देखा है । याद आया सपने में । हू ब हू वही सब । राई रत्ती का भी हेरफेर नहीं । उस दिन सपनों के प्रति जिज्ञासा बढ़ी । फिर कई बार ऐसा हुआ कि किसी भी नयी जगह जाता तो मन में टटोलने की कोशिश जरूर करता कि क्या वहाँ कोई ऐसा दृश्य है । पर अबतक केवल दो ही ऐसी जगहें गया हूँ जहां का कोना कोना सपने में देखा हुआ था । उन्हीं दिनों मेरी नानी मेरे मामा की बीमारी के सिलसिले में पटना में थी । मामा लगभग ठीक हो गए थे और वह अपनी पटना यात्रा का अंत गंगा स्नान से करना  चाहती थी । वो किस घाट पर गयी ये मुझे नहीं पता पर उन्होने वहाँ जो भी देखा वह सब अपने सपने में एक दिन पहले ही देख चुकी थी । यहाँ तक मंदिर में लगी मूर्ति की मुद्रा भी । उस समय तक बहुत से लोगों से ये सुन चुका कि ऐसा उनके साथ भी हुआ है । कहना ये चाहता हूँ कि इसके बाद सपनों के प्रति मेरी दिलचस्पी बहुत बढ़ गयी । लेकिन इस दिलचस्पी के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि जहां कोई कभी गया ही नहीं उसके चित्र व्यक्ति में कैसे बन जाते हैं ।
थोड़े दिनों के  बाद एक और घटना हुई । एक हमारे महाकांत मामा हुआ करते थे - मेरे मामा के दोस्त ! बरसात की एक रात में आधी रात के करीब मैंने सपने में देखा कि कोई चीज तेजी से गुजर गयी और महाकांत मामा की एक पासपोर्ट साइज फोटो बन गयी । अगली सुबह खबर मिली कि उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गयी । इस संबंध को मैं आज तक समझ नही पाया हूँ कि यह सपना मुझे ही क्यों दिखाई दिया । उन मामा से मिले हुए भी कुछ साल हो गए थे तब तक ।

सपनों का संबंध हमारी सोचने समझने की प्रक्रिया , हमारी मनःस्थिति और आस पास के वातावरण से है यहाँ तक तो मनोविज्ञान का इस पर अधिकार उचित जान पड़ता है । ठीक इसी बिन्दु पर फ्रायड , एडलर और यूंग आदि मनोविश्लेषण वादी और फिर नव मनोविश्लेषणवादी भी सही नजर आते हैं  । परंतु जो स्थितियाँ हमारे चेतन मन की पकड़ से बाहर  हैं उन स्थितियों के सपनों के आने का संबंध जोड़ना कठिन प्रतीत हो रहा है ।
आज एक चिट्ठी मिली ! आज के समय में चिट्ठी का मिलना एक आश्चर्य ही है । उस चिट्ठी में एक सपने का जिक्र किया गया है । उस सपने में मैं भी हूँ । और उसका मजमून इस तरह का है जिसकी असल जिंदगी में फिलहाल तो कल्पना ही की जा सकती है । पर वह सपना मन पर एक सुखद असर ही छोडता है । उस पत्र की एक पंक्ति यहाँ रख रहा हूँ शायद यह अपनी हालत स्पष्ट कर पाये - ' पता नहीं क्या अजीब चीजें हैं जो सपने बन के सामने आ रही हैं '
जब ऊपर वाला सपना देखा जा रहा था ठीक उन्ही दिनों में मैंने सुबह को लगातार तीन दिनों तक एक ही भाव वाले सपने देखे । मेरे माता-पिता , मैं जो चाहता हूँ उस बात के लिए राजी हो गए , दूसरे दिन उन्होने उन बातों को अपनी कुछ शर्तों के साथ मान  लिया तीसरे दिन का सपना अब उतना याद नही पर मजमून मेरी बात मानने का ही था । इन सपनों को तो मैं मेरी हाल की सोचने समझने की प्रक्रिया से जोड़कर देखता हूँ इसलिए लगता है कि हमारा अन्तर्मन हमें वो दिखाता है जो शायद हम देखना चाहते हैं । पर यहाँ भी एक पेंच फँसता है ।
पेंच यह कि ये सपने मेरे उपरोक्त दोस्त के मन में भी आए और ठीक उन्हीं दिनों । अब इसे किस चीज से जोड़ कर समझा जाए । वह दोस्त मेरा बहुत करीबी है यह भी मानता हूँ पर मेरे और उसके बीच लगभग दो हजार किलोमीटर की दूरी है । हम दोनों की आपसी सोच कितनी भी मिलती हो पर समाजीकरण और बड़े होने की प्रक्रिया में बहुत अंतर है फिर भी एक ही भाव के सपने हैं ! 
मैंने सपनों पर कुछ किताबें भी पढ़ी पर वे हर सपने पर लागू नहीं होती बहुधा वे सपनों के वर्गीकरण के दायरे में रहकर ही बात करती हैं । यहाँ पर थोड़ा सा आलसी हुए नहीं कि मन धार्मिक व्याख्याओं की ओर भागता है । पर धार्मिक ग्रंथ सपनों पर व्याख्या नहीं करते , उन पर बात भी नहीं करते बल्कि फतवा सुनाते हैं कि सपनों का आना मन की चंचलता और अपवित्रता के लक्षण हैं । आज के समय में सबकुछ इतना जटिल और विस्तृत हो गया है कि किसी चीज के संबंध में सरलता की कल्पना भर हो सकती है । क्लीनिकल साइकोलोजी मानती है कि धार्मिक किताबों का मन पर असर होता है कम से कम स्वप्नदोष के मामले में तो में यह बात लंबे समय से दावे के साथ कही और प्रयोग में लायी जा रही है । लेकिन इसकी व्याख्या इतने भर से हो जाती है कि धार्मिक किताबों को पवित्र का दर्जा प्राप्त है और हम उसकी इसी स्थिति के साथ बड़े होते हैं बाद में भले ही हम उन पुस्तकों को खारिज कर दें लेकिन हमारा प्रारम्भिक समाजीकरण तो उनकी श्रेष्ठता के साथ ही होता है । श्रेष्ठता के भाव के कारण उसका असर ठीक वैसा ही होता है जैसा घर के बुजुर्गों का जिनके सामने तो हम भले बने रहते हैं लेकिन उनकी नजरों से ओझल होते ही फिर वही सब । बेचारे बुजुर्ग खुशफहमी में जीते रहते हैं ।


बहरहाल सपनों के मामले में बात करना रहस्यों की दुनिया में जाने जैसा लगता है । कई बार बात कर के भी इनके बारे में किसी खास निष्कर्ष पर पहुँच पाना संभव नही हो पाता । इस सब से बेखबर सपने आते रहते हैं । वे सपने कई बार हिम्मत भी दे जाते हैं !
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