अगस्त 22, 2013

नापसंदगी के कारण


शाहरुख़ खान को पसंद करना लगातार ऐसा काम रहा है जिसमें किसी की भी आलोचना की गुंजाईश बनी ही रहती है . वह भी उसी तरह का एक अभिनेता जिस तरह के कि कई अन्य हैं लेकिन उसकी अस्वीकार्यता अन्य के मुकाबले बहुत ज्यादा है . यही कारण है कि उसके प्रशंसकों से ज्यादा संख्यां उन लोगों की है जो उसे नापसंद करते हैं . यह पसंद – नापसंद का मामला यूँ तो बहुत व्यक्तिगत सा है परन्तु लोकप्रिय व्यक्ति से जुड़ता हो तो सहज ही व्यक्ति के दायरे से बहार आ जाता है . फिर उस पसंद और नापसंद की तहों में जाने का मौका मिल जाता है .

चेन्नई एक्सप्रेस फिल्म आने के बाद जो पहला रविवार पड़ा था उस दिन द हिन्दू समाचार पत्र में चार ट्वीट छपे थे जो पता नहीं किन स्वनामधन्य ब्लागरों के थे ! उन ट्वीटस का विषय शाहरुख़ के चेन्नई एक्सप्रेस का घटियापन था . यहाँ तक कि अमूल के विज्ञापन चित्र श्रृंखला ने भी फिल्म को ‘बकवास’ मानते हुए अपने सामायिक ‘ज्ञान’ का परिचय दिया . पर जब फिल्म की कामयाबी को देखें तो वह या तो यह बताती है कि हम दर्शकों में फिल्म देखने का शऊर नहीं है या फिर फिल्म दर्शकों के लिए बनायीं गयी और उन्होंने उसको देखा बस ! अब जो स्थिति बन गयी है उसे देखते हुए क्या फिल्म समीक्षक फिर से विचार करना चाहेंगे कि समीक्षा के मानदंड क्या होने चाहिए ?

जब मैं एम.ए. कर रहा था तो सुधीश पचौरी हम मीडिया विकल्प वाले छात्रों को पढ़ाते थे . फिल्म और धारावाहिक की समीक्षा संबंधी कक्षा के नोट्स आज भी देखता हूँ तो लगता है कि उन मानदंडों के अनुरूप धारावाहिक तो खैर कोई बना ही नहीं और फिल्में ज्यादा से ज्यादा चार-छः बनी होंगी वह भी समानांतर सिनेमा के दौर में . फिर भी समीक्षा के मानदंड वही रखे जाते हैं ! वस्तुनिष्ठ समीक्षा के मीटर पर तो आज की कोई फिल्म नहीं ठहरती . ऐसी दशाओं में जितनी समीक्षाएं होती हैं वह फिल्मों की नितांत निजी व्याख्याएं ही हैं . तब इन व्याख्याओं के लिए यह जरुरी हो जाता है कि वह वह व्यक्ति के पसंद-नापसंद आदि बहुत से तत्वों और पूर्वाग्रहों से लिपट कर आये . शाहरुख़ के मामले में यह पूर्वाग्रह कई बार उभर कर आता है .

जब फिल्मों से क्रांति नहीं हो रही और जब आज की फ़िल्में और धारावाहिक विशुद्ध व्यवसाय बं गयी हैं तब तो जो मनोरंजन करा जाये और जिस भी तरह से मनोरंजन करा जाये उसी की जीत मानी जाएगी . यह भी एक सर्वसामान्य तथ्य है कि आमिर खान का वह तथाकथित ‘सामाजिक सरोकारों से जुड़ा’ धारावाहिक भी शुद्ध व्यापार था और उसने उसे उसी तरह से बेचा जिस तरह से कि तारे ज़मीन पर बिकी थी – भावनाओं के मोल ! सामाजिक मुद्दे और भी हैं , कन्या भ्रूण हत्या आज भी हो रही है पर आमिर साहब मोटी रकम लेकर भी कोई धारावाहिक नहीं ला रहे हैं !

यहाँ एक दूसरा पेंच भी है . यदि दूसरे अभिनेता की कोई ‘बिना दिमाग’ वाली फिल्म आती है तो कोई बात नहीं बल्कि यहाँ तक भी देखा गया है कि वे अभिनेता परदे पर आकर दर्शकों पर एहसान करने जैसा अभिनय कर के निकल जाता है तो भी वह ‘प्यारा’ ही लगता है . इसके उदहारण के लिए दबंग के बाद की सलमान की फ़िल्में , सिंघम सर, अक्षय कुमार और न जाने ऐसे कितनों को शामिल किया जा सकता है . पर उसी तरह की बिना दिमाग की फिल्म शाहरुख़ की आये तो पसंद - नापसंद से आगे बढ़कर भर्त्सना तक के मुखर स्वर सुनाई देने लगते हैं .

शाहरुख़ के प्रति इस अस्वीकार का उत्तर ढूंढनें के लिए न तो बहुत दूर जाने की जरुरत है और न ही ज्यादा ज्ञान की आवश्यकता है . इसके लिए बस भारत की सामान्य सामाजिक विशेषताओं को एक बार देखने की जरुरत है . शाहरुख़ ने लम्बे समय तक रोमांटिक फिल्में की . आज भी जब तब वह ऐसा करता रहता है और नहीं तो कम से कम हर फिल्म में रोमांस तो करता ही है . शायद यही कारण है कि वह कम से कम रोमांस तो सबसे अच्छा कर लेता है . यहीं भारत की रूढ़ी-प्रियता आ जाती है . फिल्मों के मामले में तो आज भी साधारण सामाजिक यथार्थ सामने आते हैं . लड़के और ‘मर्द’ माड़-धाड़ पसंद करते हैं वहीँ लड़कियों और स्त्रीयों के लिए रोमांस छोड़ा गया है . इस पुरुष केन्द्रित मानसिकता ने शाहरुख़ को स्त्रियों का हीरो बना दिया और उसमें भी उन स्त्रीयों का जो खाते पीते घरों से हैं और जिनके पास प्यार, रोमांस आदि पर सोचने के लिए खाली वक्त है . वैसे भारत में बहुत सी स्त्रीयां तो ऐसी हैं ही जिनको फिल्म देखना नसीब नहीं होता और यदि होता भी है तो घर के पुरुष की पसंद की फ़िल्में ही देखनी पड़ेगी . उनके मन में तो कोई हीरो हो क्या लेना-देना वाला भाव ही रहता है ! भारत जैसे पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की पसंद की चीजों को अपनाना आवश्यक रूप से निषिद्ध ही हो जाता है . यह रूढ़ि स्वयं शाहरुख़ अपने एक विज्ञापन में भी प्रयोग कर लेता है और मर्दों वाली क्रीम बेचता है ! यही वजह है कि आज भी गाँव के मेले में यदि विडियो हॉल आया तो किसी भी फिल्म से ज्यादा अमिताभ बच्चन की ‘मर्द पिक्चर’ पसंद की जाती है .

हाल के वर्षों में शाहरुख़ ने इस्लाम और दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अपना प्रेम स्पष्ट रूप से ज़ाहिर किया है . जो किसी भी सूरत में गलत नही है . लेकिन बहुसंख्यक हिन्दू जनसँख्या जो दर्शक में बदलती है उसकी नज़र में यह एक अपराध है . इस दिशा में यदि कोई शोध किया जाये तो इसे आंकड़ों के हिसाब से भी साबित करना कठिन नहीं रहेगा . अभी शाहरुख़ अन्य अभिनेताओं के साथ उत्तराखंड की आपदा से पीड़ित लोगों के लिए आगे आया तब तक ठीक था लेकिन जैसे उसने पकिस्तान के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए नृत्य किया कि राजस्थान में हिन्दू संगठनों ने उसके फिल्म को रोकने तक की धमकी दे डाली ! यहाँ हिन्दू दर्शक यह देने से भी नहीं चूकते कि अन्य मुसलमान अभिनेता इस तरह खुलेआम इस्लाम की बात नहीं करते . बल्कि आमिर खान तो बाक़ायदा लालकृष्ण अडवाणी के लिए तारे ज़मीन पर फिल्म की स्क्रीनिंग करता है . शाहरुख़ एक मुसलमान है पर यदि वह हिन्दू बहुल धर्मनिरपेक्ष देश में अभिनय कर के अपना पेट चलाना चाहता है तो उसे दिलीप कुमार की तरह हिन्दू नाम रख लेना चाहिए या नहीं तो हिन्दुओं को खुश रखने वाला व्यवहार करना चाहिए जो ज़ाहिर है उसके इस्लाम को परे रखने से होगी .


फिल्म देखना और उसके आधार पर पसंदीदा नायकों का चयन आवश्यक रूप से भारत के सामाजिक सच  का प्रतिबिम्बन है और उसे रूढ़िबद्ध मनःस्थिति की सहज प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा सकता है . मुद्दा शाहरुख़ को पसंद या नापसंद करने का नहीं है बल्कि उसके माध्यम से यह समझने का है कि हम सदियों से जहाँ खड़े थे उससे एक कदम भी आगे नहीं बढे हैं बल्कि और गहरे धंसते गए हैं . फिल्मों के व्यावसायिक रूप से सफल हो जाने और नहीं हो जाने से इस बात को कभी पुष्ट नही किया जा सकता कि शाहरुख़ के माध्यम से हमारी बहुसंख्यक मानसिकता में बड़ा बदलाव आ गया है .  

अगस्त 14, 2013

गोद से उतार देने का समय

देश से मुझे भी प्यार है लेकिन यह प्यार ऐसा नहीं है कि इसके लिए देश के गू-मूत तक को शरीर पर लेपा जाये और इस तरह जिया जाए कि सबकुछ अच्छा अच्छा ही है . ऐसा मुझे स्वीकार नहीं है ! इस तरह के बहुत से अस्वीकार को लेकर अब जीने का आदि हो रहा हूँ और इसीलिए घर से लेकर बाहर तक ‘ज्यादा समझदार’ मान लिया जाता हूँ . यहाँ ज्यादा समझदार होना कोई प्रशंसा नहीं बल्कि व्यंग्य है जो यह मानकर किया जाता है कि अब खुद ही मान लो कि तुम क्या हो . किसी ने ऐसे ही एक दिन कहा था कि हिन्दू धर्म के मानने वालों ने महात्मा बुद्ध को बुद्ध के बजाय बुद्धू कहना शुरू कर दिया और बहुत तेजी से इस शब्द को बुध्द के बरक्स उनके ज्ञान के बदले भाषाई चमत्कार के जरिये हीनता दिखाने लिए प्रचलित कर दिया . जब स्वतंत्रता दिवस या कि गणतंत्र दिवस का मौका आता है सब तरफ अच्छा-अच्छा बताने की होड़ लग जाती है जैसे इससे बढ़िया कोई देश ‘न भूतो न भविष्यति’ ! और इन दिनों पर यदि देश के सबंध में एक हरफ भी बुराई करने के लहजे में आया तो वो हरफ फिर से हलक में डाल दिए जाने तक बाध्य किया जायेगा . देश को लेकर प्रेम इस कदर आकार लेता है कि यह कट्टरता की हद तक चला जाये .

मैंने बहुत दिनों से टीवी नहीं देखा है इसके बावजूद कह सकता हूँ कि सभी टीवी चैनलों ने स्वतंत्रता दिवस को भुनाने के पुरे इंतजाम कर रखे होंगे . क्या समाचार और क्या फ़िल्मी चैनल सब के सब एक से एक पॅकेज के साथ तैयार होंगे . ऐसा नहीं है कि विदेशी पूँजी से चलने वाले ये सब अचानक से भारत भक्त हो गए बल्कि रघुबीर सहाय की एक कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ से एक पंक्ति ‘परदे पर वक्त की कीमत है’ लेकर कहें तो यह कि वे सभी अपना अपना वक्त आम लोगों की देशभक्ति के बदले व्यापारियों को बेचने के लिए तैयार हुए हैं .

यह बात तो सबसे पहले कहना चाहता था कि हमारे बहुलतावादी समाज में दिवसों की भी बहुतायत है . बहुत से धार्मिक दिवसों के बीच कुछ गैर-धार्मिक प्रकार के भी हैं पर हर दिवस पर इतनी सकारात्मकता बहती रहती है कि कभी कभी मन यह मानने लगता है कि देश में नकारात्मक तो कुछ है ही नहीं . हर दिवस पर संबंधित व्यक्ति, वस्तु , स्थान और भाव का गुणगान होता है . और उसे सामान्य से बड़ा दिखाने की कवायद का नतीजा ये होता है कि साल दर साल हम उनके बारे में आलोचनात्मक न होकर अनुकरणात्मक होते चले जाते हैं . यही हाल हमारे स्वतंत्रता दिवस का भी है .

हमें जिन परिस्थितियों में आजादी मिली उनमें यह स्वाभाविक ही था कि देश का गुणगान हो ताकि हमारे लिए कम से कम बोलने के हवाई स्तर पर ही सही बाहर के मुल्कों से टक्कर लेने का आत्मविश्वास पैदा हो सके . इसलिए नेहरु से लेकर उस दौर के अन्य राजनेताओं , बुद्धिजीवियों और फिल्मकारों ने इस तरह के काल्पनिक वातावरण का निर्माण किया . मनोज कुमार के फिल्मों और उसके गानों में इसकी झलक दिख जाएगी . उनकी फिल्में इस मामले में अकेली नहीं ठहरती हैं इस तरह की प्रवृत्ति हर जगह मिल जाएगी . तब के लिए यह ठीक था क्योंकि तब की वास्तविकताएं दूसरी थी लेकिन लगातार प्रश्न न करने से वही स्थिति बनी रही और क्रमशः और मजबूत होती गयी . इस देश में धर्म जिस तरह बहुत गहरी जड़ें फैलाये हुए है देशभक्ति ने भी वही रूप ले लिया है . इसका असर यह हुआ है कि हम देश को धर्म की तरह ही आलोचना के दायरे में नहीं रख सकते और यदि ऐसा किया तो बहुत संभव है कानूनी कार्रवाई का डर दिखा कर यह मानने को बाध्य कर दिया जाये कि देश बहुत ‘सुन्दर’ , ‘न्यारा’, प्यारा है . इस तरह का राष्ट्रप्रेम देश के लिए तो खतरनाक है ही उसमें रहने वालों के लिए भी उतना ही कष्टकारी है . और यही करण है कि देशप्रेम के दायरे में रखकर बहुत सी ऐसी बातें थोपी जाती हैं जो कहीं से भी स्वीकार करने के योग्य नहीं होती हैं .  जैसे कोई माँ अपने बिगड़े हुए बेटे की हकीकत उसके बाप से छिपाती फिरती है और लड़के की करनी पर खुद कोने में जाकर रोती है उसी तरह हम पहले स्वतंत्रता दिवस से आज तक देश की बुराइयों को छिपाते आ रहे हैं और उस माँ की तरह दोहरी मार भी हम ही झेल रहे हैं .

अभी कल मंथन फिल्म देख रहा था . वह फिल्म लाख डॉ. वर्गीस कुरियन के अथक प्रयासों से गुजरात में सहकारी डेयरी स्थापित करने की बात करती हो पर उसका केन्द्रीय भाव तत्कालीन भारत की जातीय जकड़नों को ही रेखांकित करता है . वह फिल्म अमूल से ज्यादा जातीय वास्तविकताओं की फिल्म है . यह फिल्म सत्तर के दशक में बनी थी तब की जातीयता और आज की जातीयता में कोई अंतर नहीं आया है . भले ही यह अब फिल्मों और साहित्य की चहारदीवारी से बाहर कर दिया गया हो लेकिन इसकी सामाजिक स्वीकार्यता घटने के बदले बढ़ी ही है . इस तरह की बहुत सी अन्य वास्तविकताएं हैं जो लगातार बनी हुई हैं और बढती भी जा रही हैं . धर्म समाज को पहले से भी ज्यादा संगठित रूप से संचालित कर रहा है . आज आजादी के 66 वर्ष होने को आये फिर भी शिक्षा, स्वास्थ्य भुखमरी के मोर्चे पर हम पहले की तरह ही हाथ बांधे रक्षात्मक रूप से खड़े हैं फिर भी हम इतनी बेगैरती से देश का गुणगान करते ही रहते हैं . और तो और हम अपने देश की गरीबी का आंकड़ा तय करने के लिए स्थानीय आवश्यकता के मानदंड तक नहीं बना पाए जो यहाँ के अनुकूल हो .

एक तरह से कहा जाये तो हमारा देश आज भी एक बच्चा ही है जिसे उसके निवासियों ने बच्चा समझकर गोद से उतारा ही नहीं और इस लाड-दुलार ने इसे आजाद होने के 66 वर्ष के उपरांत भी अपरिपक्व और अविकसित ही रखा है . समय आ गया है कि अब इसकी बहुत ज्यादा जय-जय करने के इसकी बुराइयों को रेखांकित किया जाये ताकि ध्यान उस ओर हो जिस ओर इसका जाना जरुरी है  

अगस्त 13, 2013

प्रिंटिंग का पर्यावरण पक्ष

कागज ने हमें केवल अपने एक से एक पुलिंदे नहीं दिए जो बहुत सारे काले काले डिज़ाइन से भरे हो बल्कि लाखों करोड़ों पात्र, घटनाएं, सिद्धांत, भावनाएं और चित्र दिए . इसके साथ ही दी आजादी उन्हें यहाँ से वहां ले जाने की, उन सब को जब चाहे तब खोल कर देख लेने की स्वतंत्रता मिल गयी थी इसी कागज के सहारे . लिखा तो पहले भी जाता था पर पहले लिखना जितना विशिष्ट था उसे पढना और भी विशिष्ट . विभिन्न ताम्रपत्र, पत्थरों के अभिलेख जिस उत्साह से लिखे गए उस उतने ही उत्साह से पढ़े भी गए हों इसकी सम्भावना कम ही है . अपने रोज़ के कामों से व्यक्ति फुर्सत पाकर व्यक्ति जब तक निश्चित न कर लेता होगा कि आज मुझे राजा, सम्राट या कि बादशाह का लेख पढने जाना है तब तक उसके पढने की सम्भावना तलाशनी बेकार है . कागज़ ने इसी सम्भावना को बढ़ा दिया बल्कि पढने को सहज बनाते हुए इसे सबके लिए सुलभ और लोकतान्त्रिक बनाया . कागज़ की खोज करने वालों के लिए भी यही पढने की सहजता या सहूलियत वह आकर्षण रही होगी जिसने उन्हें प्रेरित किया .


आगे यह कोई विशेष जानकारी की बात नहीं है कि कागज़ प्रकृति में उपलब्ध वस्तुओं से बनायीं जाता है . प्रकृति की दी हुई बहुत सी चीजों में से कागज़ बनाने वाले पदार्थ भी हैं जो मुख्यतः पेड़ पौधे हैं . जहाँ पेड़ पौधे आते हैं वहीँ उनकी सुरक्षा भी आ जाती है क्योंकि उन पर ही हमारा अस्तित्व टिका पड़ा है . और आज जब पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता इतनी बढ़ गयी है तब पेड़-पौधों से कागज़ बनाना ऐसा लगता है कि बहुत बड़ा अपराध किया जा रहा हो . हमारे तमाम विद्यालयों में पर्यावरण के प्रति सचेत करने वाली बहुत सी बातें किताबों और नीतियों के माध्यम से डाल दी गयी हैं सो उसके प्रति चेतना बनना कोई दूर की कौड़ी नहीं रह गयी है . छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता , अफसरान , राजनेता आदि सभी किसी न किसी बहाने ये बात जताने में लगे ही रहते हैं कि पेड़-पौधे बचाने ही पड़ेंगे . कागज उद्योग को पेड़-पौधों का भरी दुश्मन माना जाता है . यही करण है कि लगातार कागज के उपयोग को कम करने की बातें हो रही हैं . साथ ही जोरदार कवायदें भी चल रही हैं .


जब से कंप्यूटर आया तब से लगा कि कागज़ को चलता किये जाने का एक जबरदस्त माध्यम हाथ लग गया . काम भी जल्दी हो जायेगा , कागज़ जैसी सार-संभाल भी नहीं और सबसे बड़ी बात कागज़ की जरुरत ख़त्म होने से पेड़ –पौधे बच जायेंगे और उनके बचते ही मानव के अस्तित्व में अनश्वरता का भाव आ जाना स्वाभाविक है . निजी उद्यमों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में कंप्यूटर केवल इस आशा के साथ नहीं लगाये गए कि ये काम करने की गति तेज करेंगे लागत कम करेंगे बल्कि कागज़ की प्रतिवर्ष होने वाली खपत को निश्चित रूपेण कम करना . किताबें डिजिटल होने लगी . पत्र-पत्रिकाओं के ऑनलाइन संस्करण आ गए . पर क्या इन सब का यह अर्थ निकला जाये कि वाकई में कागज़ की खपत को कंप्यूटर ने कम किया ?


बात शुरू करते हैं दिल्ली से जहाँ कुछ बड़े बड़े विश्वविद्यालय हैं. जहाँ ढेरों लोग हर साल एम.फिल पी.एच डी करते हैं. कुछ लोग जो स्वयं से टाइप करते हैं उनको छोड़कर जो भी हैं वे सभी पटेल चेस्ट जैसी जगहों पर खुले सैकड़ों दुकानों से अपना प्रोजेक्ट से लेकर लघु–शोधप्रबंध और शोधप्रबंध बनवाते हैं. वहां पर यह बड़ा सामान्य सा है कि टाइपिंग के बाद कई कई बार प्रिंट आउट लेकर देखा जाता है कि कोई गलती तो नहीं रह गयी. आखिर लोगों के काम का सवाल है वे अपना परफेक्शन तो देखेंगे ही. अब इस स्थिति की तुलना करते हैं पुराणी टाइपिंग मशीन से. उसमें याददाश्त जैसी कोई चीज होती ही नहीं थी. और चूँकि टाइप करना बहुत सरल नहीं था तो टाइपिस्ट की भी कोशिश रहती थी कि कम से कम गलती हो ताकि वापस फिर से टाइप न करना पड़े. यहीं पर एक और यंत्र का जिक्र करना जरुरी है वह है कंप्यूटर से जुड़ा हुआ प्रिंटर. इसने कागज़ के प्रयोग को एक नयी दिशा दी. कुछ भी प्रिंट कर लेने की आजादी ने पटेल चेस्ट जैसे स्थानों पर बैठ कर टाइपिंग की गलतियाँ सुधारने का काम पूरा का पूरा प्रिंट-आउट घर ले जाकर गलतियाँ ताकने का हो गया . कई बार की गलतियों और रद्दोबदल के लिए कई बार प्रिंटआउट . प्रिंटर ने एक तरह से कागज़ की खपत को बहुत तेजी से बढाया है . पहले जहाँ बहुत कम प्रिंटर हुआ करते थे अब यह पर्सनल कंप्यूटर से जुड़ने वाले एक आवश्यक उपस्कर का रूप ले लिया है. मेरे ही कुछ दोस्तों के पास अपने प्रिंटर हैं . और हद तो तब है जब एक ही कमरे में रहने वाले दो मित्रों के पास अपना अपना प्रिंटर है ! प्रिंटर उद्योग का बहुत तेजी से विकास होता जा रहा है .


यह समझना बड़ा ही पेंचीदा लगने लगता है कि डिजिटलाइजेशन के नाम पर एक अलग बाजार तैयार हो रहा है वहीँ दूसरी तरफ प्रिंटर का बाज़ार अलग ही परवान चढ़ रहा है . प्रिंटर की बिक्री में बहुत तेजी आई है और इसे प्रिंटर बनाने वाली कंपनियों के विज्ञापनों में देखा जा सकता है . एक कम्पनी के प्रिंटर के लिए कहा जाता है कि अमुक माडल का प्रिंटर घर ले आइये और अपने बच्चे का ‘भविष्या’ ‘उजवल’ बनाइये . यहाँ भविष्या और उजवल शब्दों का उच्चारण अपना ही अर्थ रखता है . उनकी अर्थछवियाँ इन शब्दों को अपने साधारण अर्थ से मुक्त कर एक उच्चवर्गीय अर्थ देती है . यह हिंदी का वही स्वरुप है जो उच्च-मध्यवर्ग और उच्च-वर्ग में चल रहा है . मानें या न मानें पर यह हिंदी आकर्षक हो चली है . इस आकर्षण का केंद्र भाषाई न होकर सामाजिक प्रतिष्ठा के नए मानदंडों का बनना है .


सरकारी और निजी संस्थानों में कंप्यूटर आधारित काम ने सिद्धांत रूप में कागज के प्रयोग को नियंत्रित करने का काम किया . यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिए कि केवल सिद्धांत रूप में . भारत जैसे कुप्रबंधन से भरे देश में आज भी कंप्यूटर आधारित आंकड़ों , जानकारी और समग्र सामग्री को सहेजकर रखना कठिन बना हुआ है . असुरक्षित होने के डर से तमाम सरकारी संस्थानों में एक ही सामग्री को कंप्यूटर और कागज दोनों पर दर्ज करने की परंपरा बनी हुई है . इसने न सिर्फ संसाधनों का दुरूपयोग बढाया है बल्कि काम में समय की लागत को भी बढाया है . सरकारी कार्यालयों में कई कई कंप्यूटर आ जाने के बाद भी कागज़ आधारित पदार्थों की खरीद उसी तरह जारी है जिस तरह पहले होती थी .



जिस तरह बार-बार पर्यावरण संकट की लकीर पीटी जाती है उसे देख-समझ कर तो यही लगता है कि सरकारें और उससे भी बड़ी संस्थाएं या तो मूर्ख हैं या मूर्ख बना रही हैं . पहले की सम्भावना कम ही है तो यही तय लगता है कि वे मूर्ख बना रही हैं . यदि वे पर्यावरण के प्रति इतने ही कटि-बद्ध हैं तो उन्हें बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारनामे नहीं दीखते . उन्हें नहीं दीखता कि लगभग सभी इलेक्ट्रानिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी के प्रिंटर बाजार में आ गए हैं और वे लोगों की जेब के लिए इतने मुफीद हैं कि उनका खरीदा जाना लगभग तय ही होता जा रहा है . ऐसे में कागज़ का प्रयोग तो बढ़ना स्वाभाविक ही है फिर पेड़-पौधों का उसी अनुपात में काटा जाना भी स्वाभाविक सा हो जाता है . 

अगस्त 11, 2013

दो कवितायेँ ....

 [ आज दो कवितायेँ डाल रहा हूँ ... इधर कुछ खोजते हुए मिल गयी ... बहुत पहले नहीं लिखी गयी ये तो तय है क्योंकि इन्हें मैंने इसी साल की डायरी से उठाया है .. दो अलग अलग मूड हैं पर ठीक से देखें तो एक बाद ही दुसरे का क्रम बनता सा लगता है ... मैं नहीं जानता कि कविताओं को कौन पढ़ता है या ज्यादा स्पष्ट रूप में कहें तो मेरी इन कविताओं को कोई पढ़ेगा भी ये मुझे नहीं पता फिर भी सामने लाने में क्या बुराई है ... ]



  नए चेहरे के साथ 

मुस्कुराते चेहरे की भूमिका
अब ख़त्म होती जा रही है
लगातार गंभीर और
अवाक रहना
दिनचर्या में शामिल है
यह एक नया रंग है
पर गहरा मोटा और टिकाऊ
क़दमों में पागलपन लिप्त है
मन पर चढ़ा क्षोभ लगातार

ऐसे में
हंसने की सम्भावना बहुत दूर है
पर हंसना पड़ता है
हर बार न चाहते हुए
न हंसने वाली बात पर
तब बनता है चेहरे पर खिंचाव
फिर भागने लगते हैं लोग
मेरे उस चेहरे से ....

नया चेहरा लगभग गढ़ा जा चुका है
अपनी मर्जी में बना  
सड़ा–सा मुंह

जिनकी मजबूरी वही देखेंगे ....  
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  यूँ भी हो 

जरा मस्ती से बाते हो जाए
बातों से मस्ती हो जाए

दो उलझे गिरह खुल जाए
एक हंसी पलटे तो आँखें देर तक चमकें
कुछ रोना भी बह निकले मन से
तो बढाकर हाथ रोकूँ न
रह रह के बस ये हवा चले
मन उठने को भी हो तो फिर फिसल जाये
कुछ झरे महुए-सा हाथों पे टप-टप
महके अँधेरी सुबह में हर सिंगार से पटी पड़ी जमीन की तरह
पानी की सतह पे कागज की नाव हो
तैर उठे मन घास की गंध थामे
एक साईकिल हो बारिश के पहिये वाली
झर झर पानी की रफ़्तार
चलें चींटी का घर देखने

सुबह गहरी हो और ठहरे देर तक
न भागे हर दिन की तरह जल्दी से
वो बेशक चाय न पिए पर बैठे अपने पहलू
आज धूप आये भी तो नया छाता ओढ़े
फिर कपड़े की छेद से सूरज से हंसी मजाक हो जाए
कूद पड़े चाँद शाम की गोद में
और रात मेरा सर सुबह तक सहलाए

अगस्त 09, 2013

पल पल बदलते हम ...

ऐसा दूसरी बार महसूस किया था ! दुर्घटना इतने करीब हुई थी । घटना या दुर्घटना के प्रति संवेदना का स्तर उससे दूरी या नजदीकी से तय होता महसूस किया ।

पहली बार जब ऐसा हुआ था तब वह जाड़े की एक सुबह थी । सहरसा को बड़ी रेल लाइन से जोड़ा जा रहा था इसलिए उसका रेल संपर्क लगभग कटा हुआ ही था । छोटी लाइन पर दिन में एक बार कोई गाड़ी चलायी जाती थी । बीच बीच में कोई इंजन यहाँ से वहाँ चला जाए तो अलग बात है । इसी मुतमयीनी में उस सुबह कुछ लोग सहरसा की ओर आ रहे एक इंजन पर चढ़ गए , चढ़ क्या गए लटक गए ! उस सुबह को अचानक से कुहरे ने घेर लिया । एक और संयोग बना जैसे किसी दुर्घटना के लिए कोई मंच तैयार हो रहा हो एक इंजन सहरसा की ओर से भी चला । बीच रास्ते में कहीं दोनों की टक्कर हो गयी कुछ लोग मारे गये ।

वह मोबाइल फोन का जमाना नही था । पुख्ता खबरों से ज्यादा अफवाहें पहुंची । सहरसा का दक्षिणी छोर सूचनाओं का गढ़ बन गया था । दुर्घटना हुई थी और दो या तीन लोग मारे गए थे पर दिन भर बहुत बड़ी दुर्घटना की अफवाहें जारी रही । मरने वालों की संख्या पचास से ऊपर बताई जा रही थी । दूसरे तीसरे दिन से बात आई-गयी होने लगी । सब अपने काम में लग गए और सही सूचना के आ जाने के बाद लोगों के लिए अनुमानों के उड़ानों का कोई अर्थ नहीं रह गया था ।

पिछले एक सप्ताह से केरल के इस इलाके में भारी वर्षा हो रही है और इस पहाड़ी क्षेत्र में कई अस्थायी झरने बन गए हैं । जो बहुत मोहक रूप ले चुके हैं । एक तरफ यहाँ सौन्दर्य बढ़ा तो दूसरी तरफ खतरा भी बढ़ा । ऊपर पहाड़ों से केवल पानी ही नहीं बल्कि मिट्टी और गाद भी खिसकने लगी साथ में पेड़ और लताएँ भी ।

पहाड़ी रस्तों पर बरसात में इस बात का खतरा बराबर बना रहता है कि आप जा रहे हों और अचानक से भूस्खलन हो गया । संभव है कुछ लोग दब भी जाएँ । यहाँ पास ही में मुश्किल से 5 किलोमीटर दूर एक जगह भूस्खलन हो गया और वहाँ खड़ी दुकाने दब गयी कुछ गाड़ियों के भी दबने की खबर मिली थी । बाद में कुछ लोग वहाँ राहत कार्य होते देखने के लिए रुके तो फिर से भूस्खलन हो गया इस बार ज्यादा लोग दब गए ।

जब खबरें हमारे स्टाफ रूम में आई तो कोई भी हिन्दी या अंग्रेजी में बात नहीं कर रहा था । पर चिंता की अपनी भाषा होती है शायद । किसी तरह मैं भी जान ही गया ।

दिन भर भारी बारिश होती रही । इधर बिजली भी गायब और यहाँ का संपर्क रेल , सड़क और हवाई तीनों मार्गों से कट गया । बाहर से आती खबरों के बीच बस इतनी ही रा हत थी कि विद्यालय का जेनेरेटर चल रहा था और मैस में खाने का स्टॉक था । अंधेरी शाम में एक विद्यालय परिसर में कई गाड़ियों में भरकर पुलिस वालों के आ जाने से पता चला केरल के मुख्यमंत्री घटनास्थल का दौरा करने आ रहे हैं । चूंकि इस इलाके का संपर्क हर तरह से कटा हुआ है इसलिए वे सीधे हेलिकॉप्टर से आएंगे और उसके लिए हमारे विद्यालय में आनन-फानन में हैलिपैड बनाया जा रहा है । मुख्यमंत्री का आना अपने आप में इस बात की सूचना थी कि दुर्घटना बड़ी है ।

मेरे लिए ये कोई बड़ी चिंता नहीं थी और न ही अन्य अध्यापकों या कि दूसरे कर्मियों के लिए पर यहाँ रह रहे छात्रों के बीच बड़ा डर था । वे अपने माँ-बाप के पास जाना चाहते थे । दूसरे दिन सुबह से ही मुख्यमंत्री के आने की सरगर्मी न सिर्फ स्कूल बल्कि उसके बाहर भी दिख रही थी । स्थानीय निवासी से लेकर मीडिया तक सभी प्रतीक्षा में थे । दसवीं कक्षा की एक लड़की केवल इसलिए रो रही  थी कि उसके पिता जो केरल पुलिस में हैं उनकी ड्यूटी रात में वहीं थी जहां दुर्घटना हुई और आज वे यहाँ स्कूल में ड्यूटी दे रहे थे । छात्र कक्षा में जाना नहीं चाह रहे थे । अंत में उन्हें भी बाहर खड़े होकर इंतजार करने का मौका मिल गया । अभी तक जो बच्चे दुखी थे ,जो डरे हुए थे उनका दुख और डर छू-मंतर हो गया । जब हेलिकॉप्टर दिखा तो उनहोने बकायदा ताली बजाना शुरू कर दिया ।

बच्चे अपने डर पर इतनी जल्दी काबू पा लेंगे इसका मुझे अंदाज़ा नहीं था ।
केरल में कॉंग्रेस की सरकार है और यहाँ यह भी देखा मैंने कि वामपंथी राजनीति की आम लोगों में गहरी पकड़ है । छात्र व शिक्षक दोनों ही समूहों में मुख्यमंत्री के विरोधी ज्यादा थे पर जब समय आया तो सभी बाहर ताली बजाते व फोटो खिंचवाते पाये गए । एक शिक्षक ने तो मेरे वहाँ नहीं जाने पर बकायदा अफसोस जताया ।

मुख्यमंत्री के आने से अबतक जो मामला बहुत गंभीर लग रहा था वह एक आयोजन जैसा बन गया । अचानक से दुर्घटना नेपथ्य में चली गयी और मुख्यमंत्री का आना मुख्य हो गया । और ताज्जुब की बात ये कि लोग घटना के इस राजनीतिकरण से दुखी भी थे और उस पूरी प्रक्रिया में शामिल भी थे । जब तक हेलिकॉप्टर रहा लोगों का फोटो खिंचवाना जारी रहा । विद्यालय के मैदान से लगी सड़क दोनों ओर से स्थानीय निवासियों से भरी थी । कभी जिनको भूस्खलन का दुख रहा होगा वे अब एक झलक के लिए पंक्तिबद्ध होकर खड़े थे । मुख्यमंत्री के वापस उड़ जाने तक वे उसी तरह से बने रहे फिर बरसाती पानी की तरह बह गए ।

बारिश अभी भी जारी है । उसी तरह से । इस स्थान का संपर्क अभी भी  सड़क मार्ग से कटा हुआ है । अखबार नहीं पहुँच पा रहे हैं । बच्चे रास्ते के बिगड़ जाने से ईद में घर नहीं जा पाये । उधर मलबा हटाने का कार्य अभी भी जारी है पर जो भय और संवेदना का वातावरण बना था वह नदारद है । यहाँ तक कि कुछ उत्साही शिक्षक एक रात दुर्घटना स्थल तक भी हो आए ।

संवेदना इतनी क्षणिक होकर रह गयी कि जो छात्र कक्षा में उस दिन मुस्कुराने तक ही हिम्मत नहीं कर पा रहे थे वे फिर से फिल्म दिखाने की मांग करने लगे हैं ।


एक बात तो अपने भीतर मैंने भी महसूस की कि मोबाइल फोन के होने से एक हिम्मत बनी रही और घरवालों से बात कर ली तो उनकी शंकाएँ भी जाती रही । इस तरह तकनीक ने एक बेफिक्री तो दी ही हमें । 

अगस्त 03, 2013

बेघर से रह गए ...


अब तो पक्के तौर पर लगने लगा है कि शहर नहीं छूटता , हम छूट जाते हैं ! वह तो हमारे नहीं रहने पर भी उसी तरह चलता रहता है जैसा हमारे रहने पर रहता था । पहले ऐसा लगता था कि एक सुबह जब हम शहर में नहीं होंगे तो शायद ये शहर वैसा ही न रहे जिसमें मैं जीता रहा था । तब शहर के न छूटने का पूरा विश्वास था । इसलिए जबतब उसके छूट जाने की कल्पना कर लेने में बड़ा ही रस आता था । फिर भी कहीं यदि फिल्म प्रेम रोग का वह गीत ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना न दोबारा सुन लेता तो मन की विकलता बढ़ जाती थी ।

उस दिन चुपके से शहर दिल्ली में दाखिल हुआ था । उसी दिल्ली में जहां पैसे बचाने के लिए बस में कुछ घंटे प्रतिदिन देता था , मैं हवाई अड्डे से एक टैक्सी में चल रहा था । मेरे लिए शहर में इस तरह जाना नया था और शहर के लिए भी मैं उतना ही अजनबी हो चुका था । जिस शहर ने आपको अपने पुराने दिनों में देखा हो वह आपके इस नए अवतार पर अवश्य ही मुंह चिढ़ाएगा । यही वजह थी कि उसने एक अतिथि से ज्यादा कि हैसियत देने से परहेज़ किया ।

दिल्ली से दाना-पानी उठने के बहुत दिनों बाद भी लगता था कि मन वहीं है और मैं भले ही वहाँ नहीं रहूँ पर मेरे होने के कुछ लक्षण तो वहाँ होंगे ही । इसलिए किसी के पूछने पर घर का पता दिल्ली का ही निकलता था । यह शायद महानगरीय जीवन की आवश्यक विशेषता हो कि वह बहुत दिनों तक कुछ यादों को जीता नहीं रह सकता । मैं यह नहीं कहता कि वह यादों को सहेजता नहीं है पर ज्यादा दिनों तक सहेज सकने का अवकाश उसके पास नहीं है । मेरे आने से पहले ही भाई ने लगातार वह स्थान छोडने के मंसूबे बनाने शुरू कर दिए थे जहां हम कई वर्ष रहे थे । और मुझे लगने लगा था कि यह देर-सवेर हो कर ही रहेगा । हम जहां रहते थे वह जगह शायद हमारे लिए ही बनी थी या कि उस जगह के हिसाब से हम ढल गए थे । वस्तुओं से लेकर हमारा स्थान तक सब निश्चित । आम तौर पर हम बहुत साफ-सफाई न रखते हों पर किसी के आने पर वह स्थान ईर्ष्या करने लायक जरूर हो जाता था । पिताजी द्वारा भेजी जानेवाली बंधी हुई रकम के लिए एक मुफीद और सटीक जगह । टीवी है तो गैलरी से जा रहा  केबल कनेक्शन भी है ! शुरू में तो हम चुपके से और रात को ही टीवी से जोड़ा करते थे लेकिन जब धीरे धीरे रहते हुए थोड़ी हिम्मत बढ़ गयी तो किल्ला-ठोंक कर जोड़ दिया । लगभग 3 साल के बाद हम पकड़े गए । उस पर भी आगे कनेक्शन लगा लेने के नाम पर काम बन गया ।

ऐसा नहीं था कि दिल्ली में इस बार अपने रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था पर जब आपका अपना ठिकाना उठ चुका हो तो आपका दायरा आपके बैग तक ही सीमित होता है उन्हीं तक आपका अधिकार भी रहता है । यदि भाई अब भी उसी घर में रह रहा होता जहां हम पहले रह रहे थे तो वस्तु और व्यक्ति का संबंध उतना अजनबी नहीं रहता जितना कि मैंने महसूस किया । भाई ने घर ही नहीं मुहल्ला तक छोड़ दिया सो उधर जाकर उस जैसा महसूस करने का भी अवकाश नहीं रहा । यूं यहाँ एक बात तो कही ही जा सकती है कि कितने दिनों तक एक ही स्थान को पकड़ कर बैठे रहेंगे और यह सही भी है पर इसके इतनी जल्दी होने ने निश्चित तौर पर खालीपन जोड़ा ।

नेहरू-विहार या कि दिल्ली-विश्वविद्यालय के आस-पास की अन्य कोई भी जगह वही जगहें थी जहां से में रात-बिरात का खयाल किए बिना भी यमुना-विहार भाग जाता था । क्योंकि अपना बिस्तर तो अपना ही होता है (था) । पर इस बार मेरी सारी दौड़ नेहरू-विहार पर जाकर खत्म हो जाती थी ।

कोई दूसरे दिन वहाँ जाना हुआ जहां भाई ने अपना नया ठिकाना बनाया है ! वह जगह पहले से जानी-पहचानी थी क्योंकि चचेरे भाई का परिवार वहाँ कुछ वर्षों से रह रहा है । सो आना-जाना लगा रहता था । ठीक बगल वाले कमरे में भाई के चले जाने से एक बार मन में यह भी उठा था कि जाया ही न जाए । अपनी भावुकता के बदले भाई से मिलकर उससे कुछ बातें कर सकने के मोह ने ज़ोर जरा ज्यादा लगा दिया था । जितनी देर रहा भाई के सेट-अप में ही रहा यहाँ तक कि खाना भी भाभी इसी कमरे में ले आयी थी । यहाँ तक कि जिन बच्चों को मैं अपने से खेलने की खुली छूट दे दिया करता था वे भी अच्छे नहीं लग रहे थे ।

भाई के कमरे में उसी के समान पड़े थे और होना भी चाहिए । पर वहाँ जाते ही मेरी नजरें उन सामानों में अपना समान खोजने लगी । भाई ने जिस तरह से मेरे सामानों को अपना लिया था उसमें किताबों को छोड़कर अब कुछ भी मेरा नहीं रह गया था । कुछ किताबें तो सामने रखी भी थी । उन्हें देखकर लगा कि मेरा कौन सा हिस्सा दिल्ली में रह गया है । शेष किताबें , नोट्स , पत्रिकाएँ और अखबार की कतरनें जिनमें मेरी कुछ छपी समग्रियाँ थीं वे नहीं दिखीं । पूछने पर पता चला कि वह सब बांध कर कहीं रख दिया गया है । मन में ऐसे भाव उठे कि सबको तभी साथ लेकर आ जाने का मन किया ।

इधर हवाई जहाज के मालिकों ने यात्री के साथ अतिरिक्त वजन की सीमा को भी पहले से लगभग आधा कर दिया है और बिना किसी प्रतिक्रिया के यह बात यात्रियों ने स्वीकार भी कर लिया । नयी सीमा के अतिरिक्त वज़न पर अलग से शुल्क देना होगा । हालांकि यह पहले भी देना पड़ता था लेकिन तब वज़न की सीमा ज्यादा थी । कंपनियाँ जानती हैं कि हवाई जहाज में चलने वाले ज़्यादातर लोग हील-हुज़्ज़त से बचने वाले लोग हैं जिनके लिए हर चीज़ का साधारण सा इलाज़ है धन । वे लोग किसी भी सूरत में विरोध नहीं करेंगे । यही काम यदि रेलयात्रा में कर दिया जाए तो जो बवाल मचेगा कि पूछिए भी मत । खैर , जब भाई के यहाँ किताबें छांट रहा था तो ये वज़न वाली बात तो ध्यान में थी ही । वापस सुशील के यहाँ नेहरू विहार आया और उसके घर के पहले वाली दुकान में किताबों का वज़न पता किया तो वह 6 किलो ही निकला !

इधर मन बार-बार पुराने दिनों की तरह ही व्यवहार करने के मूड में आ जाता था । वही किसी और के जन्मदिन को लगभग अपना ही कार्यक्रम बना लेने जैसी जिद ( और लगभग वही बन भी गया था) वही अपने तरह का व्यवहार ! रेस्तरां यदि इतना भारी सेवा कर लेता है तो वह एक जने के आने तक समय तो दे ही सकता है । अपनी यह चीप जिद और सुसंस्कृत व्यवहार करने वाले दोस्तों की शान में उससे पड़ती खलल ने तो एक बार को माहौल कड़वा बना ही दिया । तो लगा कि शहर एक मैं ही हूँ जो अपने तरह का व्यवहार करने पर आमादा हूँ । जबकि शहर से लेकर अपने दोस्तों के हिस्से से कुछ महीने ही सही अलग हो जाने के कारण अब मेरा पुराना व्यवहार बेदखल हो चुका है और लगभग विस्मृत-सा ! यही पहले से दिन होते तो शायद कोई उस तरह से प्रतिक्रिया नहीं देता जैसा कि मिला । तब मेरा वह कार्य उनके प्रतिदिन के अनुभव का हिस्सा होता ।

यात्रा का अंत आते-आते बीमार भी पड़ गया । मित्र के यहाँ टिका था उसको दी गयी असुविधाओं में यह भी जुड़ना था । कोशिश तो अपनी थी कि उन्हें और न प्रताड़ित किया जाए पर कै की आवाज़ से उनका जागरण भी हो ही गया । मित्र के यहाँ ही अपना बैग पड़ा था और उसी बैग तक अपना ज़ोर था इसलिए बहुत सी असुविधाओं के बारे में खयाल भी नहीं आया ।



अपना डेरा-डंटा उखड़ जाने के बाद पहली बार दिल्ली जाना हो पाया था सो बहुत सारे नये अनुभव भर रहे थे । यही कारण था कि दिन के जल्दी शुरू हो जाने के बाद भी रात देर से हुई उन दिनों !

अगस्त 01, 2013

नादां वहीं हैं हाय , जहां पर दाना ....


विद्यालय में यूं तो बहुत सारे छात्र हैं और सभी इंसान ही हैं , फिर भी इस स्थान को मैं भावनाओं से भरे हुए स्थान की तरह नहीं पाता हूँ । इसका कारण यहाँ का अपना समाज हो सकता है जो जीवन को वस्तुपरक ढंग से देखना सीख चुका है । समस्या यही है कि बहुत सारी बातों को हम सरलीकरण के खांचे में डालकर उन्हें नज़रअंदाज़ करना सीख जाते हैं जो जानने समझने के साधारण तौर – तरीके के बदले विशेष को प्रश्रय दिलवाता है । अर्थात, बिना किसी शोध के हम छोटी सी बात को समझने का दावा भी नहीं कर सकते जैसे शोध ही ज्ञान का एकमात्र आधार हो !


अभी हाल ही में दिल्ली से आने पर 11वीं कक्षा में गया तो पता चला कि एक छात्रा विद्यालय छोड़ कर जा रही है ! विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहां छात्रों का आना-जाना तो लगा ही रहता है सो कोई अनोखी बात हो ऐसा तो था ही नहीं । न मैंने ऐसा महसूस किया और न ही कहीं से ज़ाहिर ही हो रहा था । छात्रों ने बताया कि उसे किसी दूसरे विद्यालय में विज्ञान में नामांकन मिल गया है । यूं विज्ञान या कि किसी भी अन्य क्षेत्र में छात्रों की दीवानगी मुझे नहीं जँचती है फिर भी मैं हर किसी पर अपनी बात थोप तो नहीं सकता न ! सो उसके विज्ञान की पढ़ाई के लिए विद्यालय छोडने को उसकी तरक्की मानते हुए उसे शुभकामनायें ही दी । थोड़ी देर बाद पता चला कि ऐसा वह अपने मन से नहीं, बल्कि अपने पिता के मन से कर रही है !


एक दिन बाद वह लड़की स्टाफ़-रूम में सभी शिक्षकों से मिलने आयी । कोई दूर से ही कह सकता था कि वह घंटों रोयी होगी । बात करने पर उसने बताया कि वह विज्ञान नहीं पढ़ना चाहती है । वह वहाँ पास नहीं हो पाएगी । बल्कि यहाँ उसका मन भी लगता है और मन माफिक विषय भी मिले हैं । लेकिन पिताजी हैं कि एक बार भी सुनने को तैयार नहीं हैं !


उस दिन वह लड़की कई बार इधर-उधर दिखी- कभी यहाँ से अनापत्ति-प्रमाणपत्र लेते हुए तो कभी वहाँ से ! उसके चेहरे पर रोने के भाव हमेशा ही ताज़ा बने रहे । छुट्टी के बाद तो उसके दोस्तों के चेहरे भी उसी तरह के थे – ग़मज़दा । शाम होते होते मुझे भी अपनी कक्षा से एक बढ़िया हिन्दी बोलने वाली छात्रा खोने का ग़म होना शुरू हो गया । वैसे ही यहाँ एक कक्षा में ठीकठाक हिन्दी बोलने वाले एक-दो मिलते हैं उस पर भी उस लड़की को उसके पिता विज्ञान पढ़ने के लिए यहाँ से ले जा रहे हैं ।


पहली नज़र में तो उसके पिता सीधे सीधे अपराधी नज़र आए जो अपने बच्चे की भावनाओं और इच्छाओं का कोई भी खयाल किए बिना अपनी जिद उस पर थोप रहे हैं । लेकिन गहरायी से देखने पर मामला कुछ और ही नज़र आता है । उसके पिताजी या कि इस तरह के कोई और, केरल की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनसे यहाँ साक्षारता और शिक्षा में नयी हवा की शुरुआत मानी जाती है । जिस पीढ़ी ने केरल को शिक्षा और साक्षारता के क्षेत्र में गर्व करने का मौका दिया उसी पीढ़ी के हैं ये हज़रत ! इन्होंने शिक्षा को जिस तरह से समझा उसमें वह केवल अधिकतम आय प्राप्त करने के साधन के रूप में ही मानी जाती है । तभी साहब विज्ञान विषय में ही भविष्य देख रहे हैं ।


मैंने जब से होश संभाला तब से जब भी केरल का जिक्र सुना, देखा, पढ़ा हमेशा वह एक आदर्श राज्य के रूप में ही दिखाया गया । और इस सबने मन पर इतना असर कर लिया था कि यहाँ मैं उन्हीं से उपजी बहुत सारी पूर्वधारणाओं के साथ आया था । मैं पता नहीं क्यों यह मानकर चलने लगा था कि इस राज्य में स्त्रियों को अन्य स्थानों की अपेक्षा ज्यादा स्वतन्त्रता होगी और कम से कम उनके पास कुछ अधिकार तो होंगे ही जैसे अपने अध्ययन क्षेत्र को चुनने की । पिताओं के वर्चस्व वाले परिवारों में वैसे भी लड़कियों की पढ़ाई कोई विशेष स्थान नहीं रखती है ।


अभी विद्यालय का कप्तान को चुनने की बैठक हुई थी । उस बैठक में सबने यह स्वीकार किया कि 11 वीं कक्षा में एक भी ऐसा लड़का नहीं है जो कप्तान बन सके । ज़िम्मेदारी, अनुशासन, धैर्य और अध्ययनशीलता एक साथ किसी में भी नहीं है । कई नाम उछले पर सब किसी न किसी के द्वारा काट दिए गए । वहीं सबने एकमत से स्वीकार किया कि उसी कक्षा की एक नहीं बल्कि कई लड़कियों में कप्तान बनने की क्षमता है । इस पर मेंने कह दिया कि क्यों न इस बार विद्यालय के कप्तान की ज़िम्मेदारी इस बार किसी लड़की को ही दे दी जाए इस तरह से एक परिवर्तन भी हो जाएगा और उनकी क्षमताओं का उपयोग करने का मौका भी मिल जाएगा । सच बता रहा हूँ इस प्रस्ताव का सिरे से विरोध शुरू हो गया । छोटे-छोटे से लेकर बड़े-बड़े कई बहाने बता दिए गए । और नहीं हुआ तो उनके लड़की के रूप में असुरक्षित और कमजोर होने का मुद्दा डाल दिया गया । परिणाम ? वही जो होता आया है अपने देश में । इस बात की पूरी संभावना है कि लोग मेरे इस प्रस्ताव को दूसरे नजरिए से भी देखने की जुगत कर रहे होंगे ।


जहां देखो वहाँ समाज में व्याप्त असमानता की भावनाओं के खिलाफ लड़ने के लिए शिक्षा की ढाल लायी जाती है और ऐसा माना जाता है कि इससे परिवर्तन हो ही जाएगा । शुरू मैं मैं भी यही मानता था पर पिछले दिनों के कुछ अध्ययन और कुछ अपने अनुभवों ने शिक्षा की निरीहता को समझने का मौका दिया है । इसे केरल के आधार पर ही देखिये तो समझ जाएंगे कि शिक्षा की जो भी महिमा गाते फिरते हैं वह बेकार सी है । केरल देश में सबसे ज्यादा शिक्षित प्रदेशों में से आता है और यहाँ स्त्रियों की स्वतन्त्रता और उनके प्रति हिंसा का जो आलम है वह सहज आभास देता है कि इन सामाजिक बुराइयों पर अंकुश के लिए केवल शिक्षा से काम चलाना संभव नहीं है और इसके लिए नए रास्तों और तरीकों को तलाशने की जरूरत है ।

यहाँ मुझे हरिवंश राय बच्चन की पंक्तियाँ बड़ी मौजूं लगती हैं –

कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना ?
नादां वहीं हैं, हाय ,  जहां  पर   दाना !
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे ?

मैं सीख रहा हूँ,  सीखा  ज्ञान भूलाना !  (हरिवंशराय बच्चन) ! 
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