सितंबर 30, 2013

फिर से तेरी याद


दिल्ली छोडने के बाद सबसे बड़ा दूराव मेरा अपनी किताबों से रहा । लगभग जमाई सी गृहस्थी में समझ सकते हैं कितनी ही किताबें रही होंगी । यूं तो इसकी भूमिका बन रही थी पर अचानक से एक दिन जब वहाँ का डेरा-डन्टा ही नहीं बल्कि दिल्ली छोड़कर यहाँ सुदूर दक्षिण आना पड़ेगा ऐसा सोचा नहीं था । इसी न सोचने ने सबसे बुरा यदि कुछ किया तो वह था किताबों का मुझसे छूट जाना । कोशिश तो की थी कि किताबें आ जाएँ यहाँ भी पर केरल इतना भी नजदीक नहीं है कि सोचा और ले आए । मूवर्स एंड पैकर्स से भी बात की तो वे मोल-भाव करते करते पांचेक हजार तक तो आ ही गए थे लेकिन उस समय पाँच हजार बहुत बड़ी रकम थी । ये उस समय उतना भी पहले का नहीं है कि तरस न खाया जा सके । यह इसी साल के जनवरी महीने की बात है ।

जिन किताबों को किसी को छूने नहीं देता था और कोई उस जाये भी तो मेरी टोका-टाकी शुरू हो जाती थी ले जाने की बात तो जाने ही दीजिये उन्हीं किताबों को न जाने किस के भरोसे छोड़ के चला आया । सोचना यह था कि चलो जी धीरे धीरे कर के तीन-चार यात्राओं सारी किताबें अपने पास ले जाऊंगा । इसी सोच के साथ जरूरी से भी जरूरी किताबों की छटाई शुरू हो गयी । ऐसा करते हुए मुझे मिस्टर बीन याद आ रहा था । क्या रखने लायक है और क्या साथ ले जाने लायक ऐसा तय करना बहुत मुश्किल था और जब कुछ किताबें लेकर यहाँ आया तो लगा कि जो वहाँ छूट गए वे ज्यादा जरूरी थे । बीच में दो बार दिल्ली जाना हुआ वहाँ अपनी किताबों को देख कर दुख हुआ । लगा अपने बच्चे को किसी अनाथालय में छोड़ा हो और वहाँ उसकी दुर्दशा हो रही हो । उन किताबों को पढ़ने वाला तो कोई नहीं है ये मैं जानता था पर वे इस तरह बोरे में भरकर ऊपर फेंके हुए से रखे जाएंगे इसकी उम्मीद नहीं थी । इस संबंध में मुझे पिताजी की कई बार दुहराई गयी बात सहज ही प्रासंगिक लगी कि भाइयों में जब अलगाव हो जाए तो दोनों एक दूसरे के लिए पड़ोसी की तरह हो जाते हैं । मेरी किताबें भाई के यहाँ थी लेकिन भाई के यहाँ पड़े हुए किसी के किसी अवांछित सामान की तरह । वे वहाँ अभी भी उसी तरह से हैं और तब तक रहेंगी जबतक उनका कोई ठोस इंतजाम नहीं हो जाता और तब तक मुझे लगता रहेगा कि वे सब बहुत दुख में हैं ।

जब यहाँ आया तो लगा कि धीरे धीरे यहाँ भी उसी तरह से किताबें जुटायी जा सकती हैं और प्रतिदिन न सही तो कम से कम हफ्ते में एक बार तो हिन्दी की किताबों के लिए एर्णाकुलम तक जाया ही जा सकता है । पर हफ्तों की बात तो जाने दीजिये महीनों होने को आए और मैं वहाँ न जा सका । किताबें खरीदने की बात तो दूर रही ढंग का उत्तर भारतीय खाना खाने भी नहीं जा पाया । ये नवोदयी मशरुफियत है ही कुछ ऐसी कि दो घंटे सोकर गुजार देना ज्यादा प्यारा लगने लगा है । वह तो भला कहिए विद्यालय का कि आज किताबें खरीदने की ही ड्यूटी लगा दी और वह भी हिन्दी में । सो सुबह सुबह निकल पड़े जी किताबें खरीदने वह भी हिन्दी की । मुझे दुकानें तो दो तीन बताई गयी थी पर जिस पर सबसे पहले जाने का मन किया वह थी दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा केरल की दुकान । जो हिन्दी प्रचार सभा के कार्यालय में ही स्थित है ।

दुकान के अंदर घुसते ही लगा किसी पुराने से पुस्तकालय में पहुँच गया । हिन्दी में एक साथ इतनी किताबें देखे हुए एक अरसा हो गया था । महीनों से भूखे को यदि ढेर सारा खाना दिख जाए तो जैसा लगता है ठीक वैसी ही दशा थी । कुछ हो न हो पर इतना जरूर है कि हिन्दी की किताबें आज भी दिख जाएँ तो मन मचलने लगता है । वैसा सा ही कुछ आज भी हो रहा था । हिन्दी के सभी नामचीन लेखकों किताबें यहाँ तक कि कुछ नयें उगे हुए लेखकों की किताबें भी दिख गयी । सभी बड़े प्रकाशकों तक की किताबें । राजकमल की पुरानी पेपरबैक किताबें भी जिनके दाम आज भी कम हैं । मिथिलेश राय एक कवि हुए हैं वे अपने एमए के दिनों में जो किताबें पढ़ने के लिए ले गए वे उनके गाँव लालपुर वापस चले जाने के बाद भी नहीं मिली । वे सब वहाँ पर दिख गयी । राजकमल प्रकाशन ने पुरानी पेपरबैक किताबों की कीमतें बहुत बढ़ा दी । ऐसे हालत में बेरोजगारी के दिनों में राजकमल पेपरबैक्स की नयी किताबें खरीदना शाहखर्ची लगती थी इसलिए मिथिलेश द्वारा ले गईं किताबों के न मिलने की सूरत में मैं उन्हें दुबारा नहीं खरीद पाया । लेकिन आज हिन्दी प्रचार सभा की उस दुकान में घुसते ही लग गया कि अपने उस छोटे से पुस्तकालय के सभी खाली स्थान फिर से भर जाएंगे और कई तो भर भी गए । कीमतों में इस अंतर को समझना कोई बड़ा काम नही है । यहाँ लोग हिन्दी की किताबें नहीं के बराबर खरीदते हैं और खरीदते भी हैं तो काम भर की उपन्यास और कविता संग्रह तो कतई नहीं । ऐसे में किताबें पड़ी नहीं रहेंगी तो और क्या होगा उनका आचार तो डलना नहीं है जी । राजकमल या कि कोई और कमल ने किताबें भेजी पुराने दाम में फिर एक तो वे बिक नहीं रही है ऊपर से इक्का-दुक्का बिक भी गयी तो कीमत आज की नहीं बल्कि पुरानी ही मिलती है । इसके बाद भी राजकमल या कि कोई अन्य प्रकाशन का धंधा बंद करके दूसरा धंधा करने के बजाय इसी में जमे हुए हैं तो ताज्जुब के बजाय अपना सोचने का तरीका बदलता है ।

गया तो था विद्यालय की तरफ से किताबें खरीदने लेकिन वहाँ पहले अपने मतलब की किताबें खरीदने लगा और वहाँ यदि मेरी कक्षा का कोई छात्र होता तो उसे आए थे हरी भजन को ओटन लगे कपास लोकोक्ति समझाने में मुझे कोई कठिनाई नहीं होती । खैर, इस टुच्चे से मज़ाक से आगे बढ़ते हैं । विद्यालय में हिन्दी पखवाड़ा हुआ था । उस दौरान कई सारी प्रतियोगिताएं भी हुई थी जिनमें लोगों ने पहला , दूसरा और तीसरा स्थान भी पाया था । अब मामला भले ही हिन्दी का ही क्यों न हो विजेताओं का सम्मान तो करना ही पड़ता है । उन्हें ही पुरस्कार स्वरूप हिन्दी की किताबें दी जानी हैं जिसकी खरीद का जिम्मा मेरे ऊपर था । काम-धाम और दिखने- सुनने में आप जीतने भी नाकारे लगें पर सरकार की नजर में यदि आप विभागाध्यक्ष हैं तो हैं । फिर सरकार आपको आपकी गरिमा भले ही न दे पर काम तो करवाएगी ही । मैं भी ऐसा सा फर्जी विभागाध्यक्ष हूँ जो अपने पहली ही नियुक्ति के साथ इस स्थान पर काबिज हो गया । उसी एवज़ में हिन्दी 
पखवाड़े का उदघाटन करना , एक संक्षिप्त सा वक्तव्य देना, प्रतियोगिताओं का निर्णायक बनना और ये किताबों को खरीद कर रख देना आदि करना पड़ा ।

हिन्दी प्रचार सभा की दुकान में तीन लोग काम करते हैं उन्हें जब पता चला कि मैं सौ के आसपास किताबें खरीदने वाला हूँ तो उन्होने सीधे भीतर बुला लिया । इसके बाद न जाने कहाँ से केंद्र के सचिव और उनके पीछे केरल की विशिष्ट फिल्टर कॉफी भी आ गयी । तब जाकर लगा कि यार हाँ थोड़ी तो गाहक की भी रौब होती ही है , फिर पोपुलर कल्चर के कई जुमले भी भी याद आए । सबसे ज्यादा याद आया निजी कंपनियों में चलने वाला टार्गेट सिस्टम जिसके नहीं पूरा होने की स्थिति में कंपनी अपने कर्मचारियों की छंटनी करती है ।

बच्चों के लिहाज से ढेर सारी किताबें देखी - तमस , विकलांग श्रद्धा का दौर , स्वदेश दीपक का कोर्ट मार्शल , सर्वेश्वर की बकरी , आपका बंटी , व्याकरण , शब्दकोश आदि । पर जिस स्थिति में अपने छात्रों को मैंने देखा है उसमें उनके लिए किसी भी श्रेष्ठ रचना के बदले भाषायी संरचना विकसित करने वाली पुस्तकें होनी जरूरी लगी । तमाम श्रेष्ठ रचनाओं को परे करते हुए ये व्याकरण , शब्दकोश और बोलचाल की हिन्दी जैसी किताबें एक अच्छा निवेश लगी । एक साथ पच्चीस पच्चीस व्याकरण या शब्दकोश न तो छात्रों के पास हैं और न ही विद्यालय के पुस्तकालय में । इसलिए तमाम कालजयी रचनाओं का मोह त्यागते हुए भाषा की बात सोचना ठीक लगी ।
दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के कर्मचारियों ने बताया कि केरल में छह-सात हजार रूपय के किताबों की बिक्री बहुत कम ही होती है और एक तरह से देखा जाए तो यह उनकी महीने भर की बिक्री के बराबर है । यह समझना भी उतना ही सरल था क्योंकि संस्थान के सचिव ने बाद में मुझे बस अड्डे तक अपनी गाड़ी में छुड़वाया ।


काम जो भी किया हो या कि वहाँ पर जितनी भी आवभगत मिली हो लेकिन अरसे बाद एक ऐसा दिन गुजरा जो हिन्दी की किताबों को समर्पित रहा । यही वजह है कि अभी भी नाक में पुरानी पड़ती किताबों की गंध उसी तरह बरकरार है जो अच्छी लग रही है । 

सितंबर 26, 2013

चयन में आभाव की भूमिका ...


ज्यों-ज्यों देश आगे के चुनावों की ओर बढ़ता जा रहा है त्यों-त्यों यह स्पष्ट होता जा रहा है कि विशाल लोकतन्त्र का नेतृत्व किन संभावित हाथों में होगा । उम्र कम है फिर भी कुछ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के अनुभव तो हैं ही । उन अनुभवों के आधार पर यदि एक ट्रेंड पहचानने की कोशिश करूँ तो यह कहने में गुरेज नहीं कि चुनाव के दो-तीन साल पहले तो ऐसा लगता है कि चुनाव आते-आते चयन के लिए बहुत से नाम होंगे और नेतृत्व के लिए एक सुयोग्य महानुभाव का चयन बहुत सरल होगा । इससे और आगे बढ़कर यह कह सकते हैं कि बहुत से सुयोग्य में से एक चुनना कठिन हो जाएगा । लेकिन , जब चुनाव सर पर आ जाते हैं तो स्पष्ट तौर पर एक दो कद्दावर नाम ही रह जाते हैं फिर कई बार उनमें जरा-जरा सी योग्यता ढूँढने में भी मशक्कत करनी पड़ती है । ऐसा छोटे से वार्ड सदस्य लेकर प्रधानमंत्री तक के चुनाव में देखा है । शुरू-शुरू में काफी अफवाहें उड़ती हैं और फिर वे अफवाहें ठोस होती जाती हैं और छोटी-छोटी अफवाहों को खा जाती हैं । कई बार देखने में आया है कि छोटी-छोटी अफवाहें खाये जाने के लिए ही उठती हैं । इसी खाये जाने की प्रक्रिया में कई बार संभावनाशील मगर छोटी शक्तियाँ भी लील ली जाती हैं या हालात ऐसे बना दिए जाते हैं कि उनका लील लिया जाना स्वाभाविक सा लगने लगता है । इस सब का समेकित प्रभाव अंतिम परिणाम में दिखता है । जब परिणाम आते हैं तो कुछ लोगों के चयन के साथ निबाह करना पड़ता है । इसे ही प्रतियोगी राजनीति कहते हैं ।

आगे बहुत सारे चुनाव हैं जिन्हें विधानसभा और लोकसभा चुनावों के खाँचे में रखने की परंपरा रही है । कम से कम आगामी लोकसभा चुनावों के लिए भी लगभग वही प्रक्रिया चल रही है और अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी है जहां से तस्वीर साफ सी नजर आने लगी है कि नेतृत्व किन-किन हाथों में जा सकता है । लेकिन अब से ठीक डेढ़ साल पहले की स्थिति पर गौर करें तो लग रहा था कि आम चुनाव आते-आते कुछ निरा-परिवर्तनकामी लोगों का समूह सामने आएगा जो नेतृत्व भले ही न कर पाये पर नेतृत्व को दिशा देने की स्थिति में जरूर रहेगा । लेकिन शायद यही प्रतियोगी राजनीति की मांग है कि सबसे पहले परिवर्तनकामियों की लामबंदी को तोड़ा गया और उसे एक छितरी हुई और विश्वास न की जा सकने वाली शक्तियों की हैसियत तक पहुंचाया गया । इस पूरी प्रक्रिया में भूमिका तो देश के दोनों प्रमुख दलों ने निभाई लेकिन फायदे की माप में भाजपा ने कॉंग्रेस को पीछे छोड़ दिया । क्योंकि जब एक दबाव समूह जो कॉंग्रेस का पहले से विरोधी था वह टूटा तो उसका बहुत सारा हिस्सा भाजपा के खेमे में चला गया । उस समूह के भाजपा में जाने वाले लोग कॉंग्रेस की सरकार के विरोधी थे और अपने स्वतंत्र अस्तित्व के प्रति आशंकित । इसलिए बहुत से लोग हाल तक यह दावा करते रहे हैं कि वह दबाव समूह भाजपा की तरफ से ही खेल रहा था । अब बचे हुए हिस्से में न तो दम है और न ही उसकी विश्वसनीयता रहने दी गयी है इसलिए एक संभावनाशील समूह अगले बहुत से सालों के लिए परिदृश्य से परे हो गया । अब फिर से भारतीय राजनीति उसी अवस्था में वापस लौट गयी है जहां मुख्य मुक़ाबला केवल दो ध्रुवों में ही होगा । बहुध्रुवीय अवस्था में चयन के लिए ज्यादा विकल्प होते तो उम्मीदवारों के लिए प्रतियोगिता भी ज्यादा होती लेकिन अब एक कि हार और दूसरे की जीत में ही इस मुक़ाबले का तर्जुमा हो सकता है । यदि स्पष्ट हार-जीत न भी हुई तो उसके बाद की राजनीति में नए - नए सौदेबाजी विशेषज्ञ उभरेंगे जो किसी भी हार को जीत में बदल देंगे ।

इस दो ध्रुवीय मुक़ाबले में फायदा भाजपा का है क्योंकि उसके पास वर्तमान सरकार की असफलताओं को जनता में ले जाने का अवसर है । ऐसी दशा में कॉंग्रेस के पास कुछ पैंतरेबाज किस्म के आइडिया बचे हैं जो गाहे-ब-गाहे सामने आ रहे हैं । हालांकि भाजपा के पास इससे पहले के आम चुनाव में यह अवसर था लेकिन वह उसका उपयोग नहीं कर पायी और शायद इसीलिए उसने इस बार मुद्दों के बजाय व्यक्ति को आगे किया है ताकि मुद्दे से मुद्दा लड़ा कर कोई जीत भी जाये तो व्यक्ति से व्यक्ति न लड़ा पाये । यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति आगे किया नहीं गया बल्कि वह आगे आ गए और अब जब आ गया है तो उसमें ही भाजपा को अपनी भलाई दिख रही है ।

इस तरह से भारतीय लोकतंत्र लोक-स्वीकृति के बदले व्यक्ति की महत्वाकांक्षा को पोषित करने लगा है । स्थानीय स्तर पर तो इसे कई बार और लगभग हर चुनाव में देखा गया लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा पहली बार दिख रहा है जहां स्वयं को देश का प्रधानमंत्री मनवाने की कवायद अब अंतिम रूप ले चुकी है । फिलहाल कॉंग्रेस को इस दोष से मुक्त रखा जा सकता है और बिना किसी लाग लपेट के सारी उँगलियाँ नरेंद्र मोदी की तरफ उठेंगी ।

नरेंद्र मोदी का इस तरह अपने को थोपना ऐसा लगता है जैसे बचपन की लड़ाई सी चल रही हो । किसी भी तरह से अपने को स्वीकार करवाने की उत्कटता लोकतान्त्रिक राजनीति में भी आ जाए तो उसे तानाशाही ही कह देना पड़ेगा । उसने स्वयं को खबर में रखने से लेकर अपनी छवि की मजबूती और उसके सबंध में प्रचार-प्रसार को लगातार बनाए रखने के लिए बहुत प्रयास किए हैं और ऐसा कह देना कोई खुलासा नहीं है बल्कि यह एक तथ्य का रूप ले चुका है । वह कई बार निर्लज्जता की हदें भी पार करता दिखाई देता है । मोदी के उत्तराखंड के रेम्बो एक्ट को देख कर तो यही कहा जा सकता है और उसके अनुयाइयों का अंधविश्वास इस कदर था कि वे इस झूठ को सच मानकर फैलाते रहे । फिर अमिताभ बच्चन से मोदी को सबसे योग्य कहलवाना , उसके भाषणों में आंकड़ों की बाजीगरी आदि उसकी इसी अधीरता को साबित करते हैं ।

भारत में वाचिक परंपरा खत्म नहीं हुई है । यूं तो इसके चिह्न हर जगह मिल जाएंगे लेकिन राजनीति अभी भी इस ऋग्वैदिक परंपरा को न सिर्फ जीवित रखी हुई है बल्कि इससे अपना उल्लू भी सीधा कर रही है । ज़ोर से और प्रवाहमय भाषा में बात करने वाला व्यक्ति जन्मजात नेता माना जाता है और जो राजनेता लच्छेदार भाषण दे सकता हो वह तो जनता के दिलों पर राज करता है । भीड़ के आत्मविश्वास की समूहिक कमी और उसकी सामूहिक  हीनभावना का बोध उसे स्वतः ही आकर्षक वक्ता की ओर आकर्षित होने के लिए विवश कर देता है । भीड़ के इसी मनोविज्ञान से बहुत से नेताओं ने फायदा उठाया और भीड़ को भीड़ ही रहने दिया क्योंकि भीड़ ने यदि बोलना सीख लिया तो उनकी अबाध सत्ता खतरे में पड़ जाती । अटल बिहारी वाजपेयी के परिदृश्य से बाहर हो जाने के बाद लगा कि अब शायद यह लच्छेदार भाषणों का युग समाप्त हो गया लेकिन मोदी ने उस दौर को पुनर्जीवित किया है । उसके समर्थक उसी भीड़ का हिस्सा हैं जिसे अपनी अभिव्यक्ति करने में हजार डर दिखाई देता है । उनका मनोविज्ञान यह स्वीकार कर चुका है कि मोदी की अभिव्यक्ति उन सबकी सामूहिक अभिव्यक्ति है । यह अवस्था चिंतन से नहीं बल्कि भावुक उद्वेगों से आई है । मोदी ने जिस तरह से इस रणनीति की परिणति चाही होगी यह उससे भी बढ़कर है । आज उसके समर्थकों की संख्या केवल इसलिए बढ़ रही है कि वह प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रख रहा है । भारत में आज भी वही दौर जारी है जिसमें ऊंची आवाज़ में कहे गए अतार्किक और बहुधा निरर्थक बातों को धीमी या मंद तार्किकता के बदले स्वीकार किया जाता है ।
सामंतवादी मूल्यों के कई स्तरों में दबे नागरिकों के लिए यह ज्यादा आसान दिखता है कि उसके बदले कोई और बात करे और वह बात करने वाला धीरे-धीरे उसके मनोविज्ञान पर कब हावी होकर उससे अपनी अतार्किक बातें भी मनवाने लगता है यह पता ही नहीं चल पाता है । यही वजह है कि अपने आस पास आजकल लोगों का मोदिमय होते जाना अस्वाभाविक नहीं लगता । फेसबुक पर जो दोस्त पहले मोदी का विरोध करते थे वे आज समर्थन में सामने आ रहे हैं । जो फेसबुक के ग्रुप पहले तमाम राजनीति पर चुहल करते थे वे अब प्रो-मोदी चुहल ही करते हैं । इन्हें उनका असली रंग दिखाने जैसे तय मुहावरे में बांधना गलत होगा । यह सामंतवाद के साये में विकसित हुई हीनता ग्रंथि है जिस पर बांसुरी बजाने वाले का कब्जा है जिसकी धुन इतनी मोहक है कि चूहों को नदी नही दिख रही । इसने न केवल मोदी को अबाध भावनात्मक समर्थन दिया बल्कि एक ऐसी भावुक सेना दी है जो केवल अपनी बात रखना जानती है , जिसके लिए उसके अपनी सोच के अलावा सारी सोच गलत है । स्थिति इतनी भयावह है कि उसके समर्थक अपने आप में विरोधाभासी और अतार्किक बातें करते हुए भी दूसरे विचारों के लिए कोई स्थान नहीं छोडना चाहते इसलिए उनके यहाँ बहस की गुंजाइश ही नहीं है ।

मोदी के समर्थक आजकल एक नए शिगूफ़े पर काम कर रहे हैं । पिछले स्वतन्त्रता दिवस के बाद से उनको लगता है कि भारत की राजनीति अब उस दौर में प्रवेश कर गयी है जहां अमेरिका की तरह प्रधानमंत्री का फैसला दो लोगों में बहस करवा कर हो जाए । लेकिन मोदी के फर्जी करिश्मे से चौंधियाई आँखें अपने देश की वास्तविकता तक देख नहीं पा रही हैं जहां आम चुनाव केवल एक पद के लिए नहीं बल्कि लोकसभा की करीब साढ़े पाँच सौ सीट के लिए होता है । जिसमें हो सकता है एक-दो राष्ट्रीय मुद्दे हों पर बहुधा स्थानीयता ही विजेता तय करती हैं फिर राज्यवार जो विविधताएँ हैं सो अलग । उनकी इस मांग को देखकर लगता है कि उनके लिए चुनाव देश के एक–एक बूथ पर नहीं बल्कि फेसबुक पर होने वाला है जहां लच्छेदार और मज़ाकिया भाषा से ही बात बन जाएगी ।
एक व्यक्ति के इस अप्रत्याशित उत्थान ने भारतीय राजनीति में बहुत से धड़ों की अकर्मण्यता और शिथिलता को उजागर कर दिया है । विशेष रूप से वामदलों के संबंध में इस बात को पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है । आज की भारतीय राजनीति में जब बड़े परिणामों की आशा करने के बजाय जमीनी स्तर पर जड़ें जमाने का काम उन्हें करना चाहिए उस समय वे महज हवाई लफ़्फ़ाज़ी और शिथिलता से काम चला रहे हैं । ऐसी शिथिलता से तो क्रांति नहीं ही आएगी ऊपर से लोकतंत्र से भी बेदखल होने की नौबत आने वाली है । केरल के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि उनकी स्थिति कितनी गंभीर है । लोग कहते हैं कि उनहोंने तो यही देखा कि वामदलों के पास कोई स्पष्ट कार्यप्रणाली नहीं है हाँ विचारधारा के नाम पर सच में वह सब आकर्षित करने वाला है लेकिन कई बार उनको सत्ता में लाकर देख लिया लेकिन विचारधारा पर कार्य में नहीं बदल सकी । इन दलों का लगभग यही हाल देश के स्तर पर है जो कई बार इनके आपसी सिर-फुटौव्वल से और गहरा जाता है । 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद से यदि किसी दल की लोकप्रियता घटी है तो वह कॉंग्रेस नहीं बल्कि वामदल हैं ।


लोकतान्त्रिक राजनीति में फिर से भीड़तंत्र का दौर आ गया है जिसे मोदी नेतृत्व दे रहा है । इस स्थिति में सबसे दुखद यह है कि भले ही हार जाने के लिए ही सही पर भीड़ को मोदी के सम्मोहन से जगाने वाले लोग सामने नहीं आ रहे हैं । जिन राजनीतिक दलों पर इसकी ज़िम्मेदारी थी या है वे इसे पहले से ही एक हारी लड़ाई मानने की हीनभावना में लिपटते हुए दिखाई दे रहे हैं । 

सितंबर 25, 2013

साल दर साल वही प्रहसन : सन्दर्भ हिंदी पखवाड़ा


हिंदी पखवाड़ा चल रहा है । इस पखवाड़े के पंद्रह दिनों तक हिन्दी वहाँ वहाँ विराजमान होगी जहां जहां इसके होने की कल्पना भी न हो । इन्हीं पंद्रह दिनों में ही हम यह देख लेते हैं कि कितना दयनीय है इस तरह के कुछ दिन एक भाषा को दे देना । यह उस तरह लगता है जैसे इसका श्राद्ध-पक्ष चल रहा हो । जिसे लोग पिछले पक्ष की तरह ही किसी तरह काट कर फारिग होना चाहते हैं । यहाँ यह पढ़ने में बहुत बुरा लग सकता है कि हिन्दी पखवाड़ा हिन्दी का श्राद्ध-पक्ष है लेकिन बुरे लगने से वास्तविकता बदल तो नहीं जाती ।

हिन्दी दिवस यानि 14 सितंबर को केंद्र सरकार से जुड़े संस्थान हिन्दी के लिए अगले पंद्रह दिनों तक नाटक अपने हर छोटे बड़े कार्यालय में रखते हैं । फिर अगले पंद्रह दिन नाटक लगातार चलता रहता है । एक – दो दिन तो उत्साह दिख जाता है लेकिन उसके बाद यह एक मज़ाक से बढ़कर कुछ नहीं रह जाता है । फिर इस सरकारी नाटक को देख कर लगता है कि इससे बेहतर हो कि ये नाटक हो ही न ।
इस तरह की अवस्था का अंदाजा तो था कि हिन्दी पखवाड़ा कुछ ऐसा ही होता होगा । क्योंकि आज तक हिन्दी क्षेत्र से बाहर नहीं निकला था तो यह समझने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी कि हिन्दी को साल के पंद्रह दिन देखने पर कैसा लगता है ।  जिन संस्थाओं में पढ़ाई हुई थी वहाँ हिन्दी ही पढ़ी तो ये भाषायी स्यापा करने की कोई जरूरत ही नहीं थी । 

उस समय और आज भी यह लगता है कि हिन्दी का दिवस मनाना लेना ऐसा है जैसे  भाषा के समाप्त हो जाने , बेदखल हो जाने की पूर्व - घोषणा हो । उधर केवल किसी बैंक में ही पता चल पाता था या आज भी चलता होगा कि हिन्दी पखवाड़े जैसी कोई चीज होती है । लेकिन यहाँ आने पर ज्यों-ज्यों सितंबर नजदीक आया त्यों-त्यों कई बार यह सामने आया कि यहाँ हिन्दी पखवाड़ा होगा या कि होता है जो बहुत बड़ा आयोजन होगा या कि होता है ।

सितंबर का ग्यारहवाँ या बारहवाँ दिन रहा होगा यहाँ पास में नारियल विकास बोर्ड , भारत सरकार का कार्यालय है वहाँ से हिन्दी दिवस पर बोलने का न्योता आया था । पर वे अपना हिन्दी दिवस 14 सितंबर नहीं बल्कि 13 को ही माना रहे थे । मेरे दिन महत्वपूर्ण नहीं था इसलिए हाँ हो गयी । वहाँ जाने पर पता चला कि नारियल विकास बोर्ड में शनिवार को भी छुट्टी होती है और वहाँ के अफसर और कर्मचारी अपनी एक छुट्टी खराब नहीं करना चाहते इसलिए इसे तेरह को ही माना रहे थे और इस बार से उनहोंने हिन्दी पखवाड़ा भी मनाने का निश्चय किया है जो 27 सितंबर तक चलेगा । हिन्दी पखवाड़ा आम तौर पर तो चौदह से शुरू होकर अट्ठाईस सितंबर तक चलता है पर वहाँ यह एक दिन पहले शुरू होकर एक दिन पहले ही खत्म हो रहा था । एक तरह से देखें तो हिन्दी के लिए दिन तो पंद्रह मिल ही रहे हैं लेकिन ये दिन हिन्दी के लिए नहीं बल्कि अपनी सुविधा के लिए रखे गए कियोंकि उनकी एक दिन की छुट्टी बर्बाद न हो । यह स्थिति तब थी जब वहाँ के अधीक्षक मध्यप्रदेश के निवासी हैं । बहरहाल वह कोई बहुत बड़ा आयोजन नहीं था । बस बीसेक कर्मचारियों का एक झुंड था जिसे संबोधित करना था । 

उससे पहले अधीक्षक जी से बात हो रही थी तो पता चला कि वे मधेपुरा बिहार में काम कर चुके हैं और वहाँ से सीधे यहाँ आए । जब तक औपचारिक सम्बोधन नहीं शुरू हो गया तब तक वही शाश्वत टाइमपास चलता रहा राजनीति , भ्रष्टाचार आदि पर वही पुरानी चबाई, उगली व थूकी हुई बातें । दूसरी बात, जब बिहार को जानने वाला कोई गैर-बिहारी हो और उसे मौका मिल जाए तो बिहार की बुराई तो करता ही है यह तो कोई अनोखी बात नहीं है । हाँ उन्हें आश्चर्य तब होता है जब आप उनकी सभी बातों से सहमति जता दें फिर बंदे का सारा उत्साह छू-मंतर हो जाता है । इसके बाद जाकर अधीक्षक महोदय अपने काम पर आए थे । नारियल कितने प्रकार के होते हैं , देश के किस भाग में कौन सी किस्म अच्छा उत्पादन देती है , और सबसे जरूरी कि नारियल की जीन-संरचना ठीक मनुष्यों जैसी होती है इसलिए जब तक वह फल न देने लगे तब तक कहा नहीं जा सकता है कि उसकी कौन सी किस्म है । और यही कारण है कि नारियल का हर पेड़ दूसरे से भिन्न होता है और इसी के साथ उसके गुण भी । तभी तमाम नयी नयी विधियों के आविष्कार हो जाने के बाद भी बीज से पौधा उगाने की परंपरागत विधि को तरजीह दी जाती है । इस बीच मैं देख रहा था कि मझोले से एक बरामदे में नोटिस बोर्ड के आर-पार कपड़े का एक बैनर टांगा गया, वक्ता और अधीक्षक की कुर्सी जमाई गयी और उनके सामने एक टेबल रखा गया फिर सामने-सामने बीस-पाचीस लोगों के बैठने का इंतजाम ।

चूंकि ऑफिस उनका था इसलिए पहले अधीक्षक जी को ही बोलना था और वही बोले भी । उनके प्रधान कार्यालय को पिछले कई वर्षों से हिन्दी में ज्यादा काम करने के लिए भारत सरकार की ओर से प्रथम पुरस्कार मिल रहा है । इस बार भी द्वितीय पुरस्कार मिल रहा है । फिर वह बताने लगे कि उनके ऑफिस में कितने लोग हिन्दी जानते हैं कितने नहीं । बोलते बोलते वे वह बोल गए जो इन हिन्दी के प्रति सरकारी कार्यालयों की प्रतिबद्धता की कलई उतारता है ।

हिन्दी में काम करना कई तरीके से गिना जाता है और ये कार्यालय बड़ी चालाकी से उनमें हेरा-फेरी कर अपने हिन्दी में काम करने के अंक बढ़ाते रहते हैं जबकि असलियत में काम हुआ ही नहीं रहता है । पत्र अमूमन अंग्रेजी में ही भेजे जाते हैं लेकिन उसके साथ हिन्दी में एक चिट जिसे कवरिंग लेटर कहते हैं, लगाकर हिन्दी का पत्र बना डालना किसी चमत्कार से कम नहीं है ! ऐसा करते हुए हिन्दी में किया गया पत्र-व्यवहार सौ प्रतिशत हो जाता है । आगे अधीक्षक ने यदि किसी दस्तावेज़ पर हिन्दी में हस्ताक्षर कर दिए हैं तो वह भी हिन्दी में किया गया काम गिना जाएगा । कंप्यूटर में हिन्दी में प्रारूप तय हैं उनमें बस नाम , दिनांक आदि डालकर बहुत से दस्तावेज़ और पत्र तैयार किए जाते हैं फिर वह हिन्दी में किए गए काम की श्रेणी में आता है । बीच बीच में राजभाषा विभाग को भेजी जाने वाली रपट की प्रति कंप्यूटर में तैयार रहती है बस संख्या आदि नए डालकर नयी रिपोर्ट तैयार कर ली जाती है ।
इसके बाद अपने वक्तव्य को लेकर मेरा अनुत्साहित हो जाना स्वाभाविक था । लेकिन तमाम राजनीतिक और ऐतिहासिक पहलुओं से बचते हुए उनको लताड़ लगा ही गया । केवल पुरस्कार के लिए काम करने की उनकी प्रवृत्ति इस पखवाड़े के मूल आदर्शों का तो गला ही घोंट रही हैं न ।  इसके साथ ही कार्यालय में वास्तविक रूप से हिन्दी में काम करने की सलाह भी दे डाली जो जनता हूँ उन लोगों को अच्छी नहीं लगी । पर उनका बुरा लगना बहुत देर तक रहा नहीं क्योंकि भाषण के बाद खाना बहुत बढ़िया खिलाया था ।
विद्यालय में ,
विद्यालय में भी हिन्दी दिवस की औपचारिकता पूरी की गयी । उस दिन मंच पर एक बड़ा सा दीप रखा गया पीछे कपड़े का वही बैनर जिस हिन्दी पखवाड़ा समारोह लिखा रहता है । एक दिन पहले ही राजभाषा के साथ की जा रही बाजीगरी पर क्षुब्ध होकर लौटा था इसलिए अपने विद्यालय में बोलते समय पहले तो सारी भड़ास निकाली फिर इस पर ज़ोर दिया कि काम करना हो तो पूरी तरह किया जाये अन्यथा नाटक बंद करने का समय आ गया है ।
ओणम की छुट्टी के सिलसिले में विद्यालय उसी दिन बंद होना था इसलिए हिन्दी पखवाड़े की बस औपचारिक शुरुआत हो पायी उससे जुड़े कार्यक्रमों की नहीं । ये कार्यक्रम नहीं बल्कि छात्र-छात्राओं के लिए प्रतियोगिताएं थे  जिनके माध्यम से उनमें हिन्दी के प्रति रुचि जगाने का काम होता । छुट्टियों के बाद विद्यालय जब पुनः शुरू हुआ तब से हर दोपहर कोई न कोई प्रतियोगिता हो रही है । व्याकरण, विभिन्न प्रकार के भाषण , रचनात्मक लेखन , कविता गायन , सुलेख आदि की प्रतियोगिताएँ चल रही हैं ।
छात्र कविता प्रतियोगिता के लिए कवितायें ले गए और किस धुन में गाना है वह भी लेकिन जब मंच पर चढ़े तो कविता कहीं थी ही नहीं । जो छात्र कविता लेने के लिए नहीं आए वे या तो बच्चन की अग्निपथ कविता सुना रहे थे या महादेवी की मधुर मधुर मेरे दीपक जल । अग्निपथ कविता जितनी आसान है उतनी ही आकर्षक भी क्योंकि इसे हाल ही रितिक रोशन ने अपनी फिल्म में पढ़ा है । बच्चे उसी अंदाज में पढ़कर जैसा फिल्म में है । महादेवी की वह कविता भी यहाँ बहुत लोकप्रिय है ।
भाषण प्रतियोगिता और निबंध प्रतियोगिता के विषय पहले ही तय कर दिए गए थे । इसका परिणाम यह हुआ कि परीक्षा कक्ष से बाहर और मंच पर जाने से पहले छात्र निबंध की विभिन्न किताबों को लेकर अपनी बारी आने तक  तैयारी करते रहे । जब निबंध को जांच रहा था तब लगा कि हिन्दी के लिए इस नाटक की आवश्यकता नहीं है । वरिष्ठ समूह के बीस बच्चों में से बारह ने मानो एक ही किताब से निबंध रटा था एक एक शब्द मिल रहे थे । और यही हाल भाषण प्रतियोगिता का भी रहा था । मित्रता विषय पर कृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण सब के पास था क्योंकि उनहोंने जिस किताब से तैयारी की थी उसमें यही उदाहरण था ।
हिन्दी पखवाड़ा एक नाटक सा लगता है जो चल तो रहा है पर इसके भीतर बस इसे किसी तरह खींच कर अंत तक ले जाने तक की ही ताकत है । एक बात यह आती है कि यहाँ केरल जैसे राज्य में हिन्दी इस तरह भी आए तो कम बात नहीं है लेकिन यहाँ यह बताना जरूरी है कि यह पखवाड़ा हिन्दी के लिए नहीं बल्कि राजभाषा के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए आयोजित किया जाता है । विद्यालय में इस पखवाड़े से जुड़े कार्यक्रम दोपहर को हो रहे हैं इसलिए सारे शिक्षक खुश हैं क्योंकि उनकी ड्यूटी के समय यह काम किया जा रहा है जिससे वे अपनी ड्यूटी से बच जा रहे हैं ।  
यह खयाल आजकल कई बार आ रहा है कि हिन्दी दिवस या कि पखवाड़ा सब मिलकर हिन्दी पर किए गए समूहिक एहसान या दया का भाव निर्मित करते हैं । साथ में अपने लिए यह स्पेस भी रख ले जाते हैं कि हिन्दी को जो महत्व दिया है वह किसी अन्य भाषा को नहीं । जबकि एक बार भी इन आयोजनों और उनके कार्यक्रमों को देख लें तो लग जाएगा कि यह सब महज रस्म हैं जो अपना अर्थ खो चुके हैं बल्कि इनमें से यदि अति-आशावादी होकर भी रस तलाशने की कोशिश की जाए तो भी यह हिन्दी के विकास को नहीं दर्शाते हैं बल्कि उसके प्रति और उदासीन ही करते हैं । इन कार्यक्रमों को एक झंझट से अधिक मानने वाले कम ही हैं और जो हैं वे इसलिए इसकी बात करते हैं क्योंकि इनके माध्यम से उनका कुछ फायदा हो जाता है ।
राष्ट्रभाषा और सरकारी भाषा हिन्दी के अलावा हिंदीभाषियों की मातृभाषा भी है, यह सच्चाई कई बार हमारे जेहन से बाहर चली जाती है क्योंकि आज जिस प्रकार का वातावरण बन रहा है उसमें हिन्दी की बात करना बहुलता को अस्वीकार करने जैसा बना दिया गया है । हिन्दी के नाम पर जो भी काम होते हैं या बातें होती हैं उसमें राष्ट्रभाषा हिन्दी के नाम पर जो इसकी कमियाँ (यह कितना सच है इस यह चर्चा का विषय है ) हैं उसकी गाज़ मातृभाषा हिन्दी पर आकार गिरती है ।

हर साल होने वाला यह रस्मी आयोजन हिन्दी के प्रति कोई विश्वास नहीं जागता है । इसके अतिरिक्त दूसरे सामाजिक और विशेषकर आर्थिक कारण हैं जो हिन्दी के प्रसार को बढ़ा रहे हैं । जरूरत इस स्थिति को समझने की है और फिर नए तरह की कार्यप्रणाली अपनाने की ।  केरल में हिन्दी का कोई समाचारपत्र नहीं आता है और यदि बहुत कोशिश कर के मंगवाया भी जाए तो वह दो दिन से पहले नही मिल पाता । इस स्थिति में भी हिन्दी पखवाड़ा मनाकर यह साबित करने का छद्म ओढ़ लिया जाता है कि हिन्दी के प्रचार – प्रसार के लिए काम हो रहा है । इस तरह की सोच पर हंसी आती है ।  

सितंबर 23, 2013

सर जी , फ़र्जी !


बात तो बीएड के दौर की है । उन दिनों हमारा शिक्षण अभ्यास चल रहा था जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के उस महाविद्यालय में सभी टीचिंग – प्रैक्टिस कहते थे । यह दरअसल वह काम था जिसमें प्रत्येक प्रशिक्षु को वास्तविक विद्यालयों में जाकर छात्रों को पढ़ाना होता था । बाहर से तो ऐसा लगता है कि यह एक अभ्यास हो लेकिन जानकर आश्चर्य होगा कि इसमें गज़ब की वास्तविकता थी ।

उस समय हमें छात्र-अध्यापक कहा जाता था । अध्यापक शब्द जुड़ जाने से ही उसके जितना अधिकार मिल जाए ऐसा हम भले ही सोचते थे पर न तो हमें पढ़ाने वाले शिक्षक , न ही संबन्धित विद्यालयों के शिक्षक और तो और छात्र तक भी हमें अध्यापक समझने की गलती नहीं करते थे । ज़ाहिर है ऐसे में छात्र हमें बहुत गंभीरता से लें ये तो हो ही नहीं सकता । उनके व्यवहारों ने बहुत से ऐसे अनुभव दिए जो लंबे समय तक याद रहेंगे । छात्राएं तक हंसी मज़ाक से नहीं चूकती थी । जबतक हमारे सुपरवाइज़र कक्षा में होते तबतक तो वे यूं चुप रहते थे मानो उनसे आदर्श बच्चे मिल ही नहीं सकते । मैं दिल्ली सरकार के एक प्रतिभा विकास विद्यालय में पढाता था और बहुत से अपने दोस्त इसी तरह दिल्ली सरकार के विद्यालयों में पढ़ाते थे । हम सब के जो अनुभव हैं वे उन विद्यालयों को सभी अर्थों में सरकारी स्कूल साबित करते हैं ।

अब जब बात टीचिंग प्रैक्टिस की चल ही पड़ी है तो थोड़ी सी उसकी राजनीति से भी होते चलते हैं । जो शायद इस क्षेत्र को समझने में सहायता करे । दिल्ली विश्वविद्यालय के बीएड महाविद्यालय में जब टीचिंग प्रैक्टिस का समय आता है तब वहाँ आपको एक  बहुत स्पष्ट बात नजर आएगी । जो लड़कियां कार से आती हैं, ठीकठाक कपड़े पहनती हैं और अँग्रेजी बोलती हैं उनके लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लग जाता है कि उन्हें उजड्ड सरकारी विद्यालयों के छात्रों के बदले पब्लिक  स्कूल के पालतू बच्चे मिलें । दूसरी ओर अन्य लड़कियां जिनके लिए बीएड करना परिवार के लिए रोटी जुटाने का साधन बनेगा उन्हें खराब से खराब हालात वाले सरकारी विद्यालयों में भी भेजने से लोग नहीं हिचकते हैं । उनके अनुभव बहुत कटु होते हैं । स्वयं हमारे साथ की कुछ लड़कियों के अनुभव ऐसे रहे कि वे किसी भी सरकारी विद्यालय में नौकरी का आवेदन तक करने से डरती हैं । लेकिन इतना करने से वे बच नहीं सकती क्योंकि पब्लिक स्कूल के दरवाजे उनके शाश्वत रूप से बंद होते हैं । शायद ही किसी ने देखा हो कि कोई पब्लिक स्कूल उन सुंदर लड़कियों के अलावा किसी को नौकरी देता हो । यहाँ लड़कों का तो प्रश्न ही नहीं उठता है ।

हालांकि यह यहीं पर नहीं रुकता है । लड़कियों और सौंदर्य को लेकर शिक्षा-संस्थाएं जितनी भी उदार हो जाएँ लेकिन वहाँ के लोग बार बार वही कार्य करते रहते हैं जो पुराने सामंत करते थे । हमारे उस महाविद्यालय की प्रधानाचार्य ने अपने स्तर से एक कार्यक्रम करवाया विशुद्ध अपने अकादमिक लाभ के लिए । उसमें उन्होने अपने करीब की छात्राओं को स्वयंसेवक के रूप में इस्तेमाल किया । ध्यान नहीं पड़ता कि किसी लड़के को बोला हो । और जब कार्यक्रम का समापन हुआ तो उनहोने नाम ले-लेकर केवल उन्हीं लड़कियों को धन्यवाद दिया जो खूबसूरत थी और जिनके पास कार थी । उन मोहतरमा की सौंदर्योपासना किसी कामुक पुरुष से भी आगे जाकर ठहरती है । उनसे मिलने की दिल से इच्छा नही होती थी लेकिन किसी वजह से जाना ही पड़ा तो उनकी व्यर्थ की नफ़ासत गुस्सा ही दिलाती थी ।

खैर इस भड़ास के चक्कर में मूल किस्सा छूटा जा रहा है । मूल किस्से की याद अभी इसलिए आई क्योंकि परसों पुरानी डायरी पलट रहा था तो उसमें उन दिनों के एक दो किस्से दर्ज मिले । लिखने के तरीके में बदलाव भले ही आया हो पर बातें आज भी सच हैं । इसलिए उन्हें डायरी से निकाल कर ब्लॉग पर चेप देने का मन कर गया । इसी मन करने ने वैसे बहुत सा कूड़ा-कबाड़ा करवाया है और फिर एक बार मन कर गया है !

शिक्षण – अभ्यास (अरे महाराज वही टीचिंग-प्रैक्टिस) के दौरान हमें न सिर्फ स्वयं कक्षा लेकर वास्तविक अध्यापन सीखना था बल्कि आसपास के दूसरे विद्यालयों में पढ़ा रहे अपने सहपाठियों की भी कक्षाएं देखनी थी , उसने सीखना था । सीखे न सीखे लेकिन रिपोर्ट बनानी थी कि इससे यह सीखा और उससे वह ! वह एक वास्तविक खानापूर्ति सी थी । पर हमारे सुपरवाइज़र ने इस प्रचलन में थोड़ा सा बदलाव कर दिया ।  उनके हिसाब से हमें अपने सहपाठी नहीं बल्कि जिस विद्यालय में हम वह बहु-प्रचारित अभ्यास करते थे उसी के स्थायी शिक्षकों की कक्षाओं को देखना था , सीखना था और रिपोर्ट बनानी थी । उसी के तहत मैंने कई अध्यापकों की कक्षाएं देखि और कुछ अपनी कक्षाओं के अनुभव भी रहे । यहाँ पर हिन्दी विषय से संबन्धित दो टुकड़े डाल रहा हूँ । ये टुकड़े सरकारी टुकड़े हैं । कैसे ? जरा देखिये !

एक , राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, शंकरचार्य मार्ग, दिल्ली ।  कक्षा दसवीं ब, पाठ लिंग निर्धारण ।
अध्यापक की आवाज़ सुस्पष्ट है , छात्र पाठ में रुचि ले रहे हैं और यह रुचि शायद इसलिए है कि अध्यापक यहाँ के स्थायी शिक्षक हैं जो कक्षा से बाहर भी देख लेने की बात अभी-अभी कर रहे थे । एक लड़के को बोर्ड पर दो वर्ग बनाने को कहा गया – स्त्रीलिंग और पुर्लिंग । मुझे लगा शायद श्रीमान की जबान लड़खड़ा गयी होगी हो सकता है ऐसा ही उस बच्चे को भी लगा हो । उसने जो दो वर्ग बनाए वे थे स्त्रीलिंग और पुर्लिंग । उसके लिखने की देरी थी कि कक्षा में अध्यापक का गुस्सा और गंभीर स्वर गूंजने लगा ! उस गुस्से का शब्दांतरण कुछ यूं था – ओए, बेवकूफ ! ये क्या लिखा ? ... दसवीं में आ गया है पर तुम्हारा अशुद्ध लिखना नहीं छूटा । तुमलोग कभी नहीं सीख सकते ... अबे पुल्लिंग नहीं पुर्लिंग होता है । लड़का खुले मुंह से माट्साब की ओर देख रहा था और मैं भी इस प्रश्न के साथ कि ये कौन सी हिन्दी है भई ?’ माट्साब का गुस्सा फिर से चनका – ओय देख क्या रहा है , पुल्लिंग वाले आधे को मिटा और लि के ऊपर रेफ़ लगा रेफ़ । उनहोंने दो बार रेफ़ बोला था और दूसरे पर ज़ोर ज्यादा डाला था । अब उनके कहे अनुसार बोर्ड पर दो सफ़ेद वर्ग चमक रहे थे – स्त्रीलिंग और पुर्लिंग !
शिक्षक महाराज एक – एक शब्द कह रहे थे और बच्चे बारी - बारी से आकर उन्हें उनके लिंग के अनुसार इधर या  उधर डाल रहे थे । पुरुष वाचक शब्द एक एक बाद ऐसे खाने में गिर रहे थे जिसका हिन्दी भाषा में कोई अस्तित्व ही नहीं था । इसके बावजूद मैंने उस अध्यापक की कक्षा के बारे यही लिखा कि वह बहुत अच्छी थी और मैंने उससे बहुत कुछ सीखा । क्योंकि मैं जनता हूँ उस रिपोर्ट को कोई पढ़ने नहीं जा रहा था । एक खानापूर्ति दूसरे तरह की खानापूर्ति के लिए रास्ता तो बनाती ही है । इसलिए उस रिपोर्ट में वास्तविकता भरी हो या कल्पना क्या फर्क पड़ता है !

दो ! उसी राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, शंकराचार्य मार्ग, दिल्ली में एक दिन मैं ग्यारहवीं 
कक्षा को महदेवी वर्मा की कविता जाग तुझको दूर जाना पढ़ा रहा था । मैं कविता पर बात करते करते उसके भाव के साथ वर्तमान तक चला आया और मेरी यह उम्मीद थी छात्र अपने समकालीन संदर्भों में कविता को ज्यादा बेहतर समझेंगे । पर छात्रों ने फट से टोक दिया 
– सर जी यह कविता तो आजादी से पहले की है इसे आप आज से क्यों जोड़ रहे हैं ?

मैंने कहा - वह इसलिए कि यह कविता आज के संदर्भों में भी लागू होती है ।

इस पर एक ने कहा – गाइड में आजादी से पहले के बारे में लिखा है आप भी वही पढ़ाओ ।

इसके बाद मैंने गाइड पढ़ने के नुकसान विषय पर उस कक्षा में एक संक्षिप्त भाषण दिया जिसके समाप्त होते ही एक दनदनाती टिप्पणी मेरे कानों में पड़ी – मैडम भी तो गाइड से ही पढ़ाती हैं ।

अब मेरे पास कोई जवाब नहीं था । भई मैडम जो वहाँ की स्थायी शिक्षिका थी वह भी गाइड से पढ़ाती होंगी इसका मुझे अंदाजा नही था । बल्कि यह एक सदमा था मेरे लिए ।


मैं इन सब को इस तरह भी प्रस्तुत कर सकता हूँ कि ये प्रक्रियाएं भाषा का नुकसान कर रही हैं लेकिन ऐसा करूंगा नहीं । क्योंकि यह उससे कहीं आगे बढ़कर वर्तमान सरकारी स्कूल की शिक्षा-प्रक्रिया के स्वरूप का निर्धारण करता है जहां पर रचनात्मक होने के बदले यथास्थितिवादी होना पसंद किया जाता है । ऐसा माना जाता है कि यूं ही हर साल नए नामांकन होते हैं और होते रहेंगे इसलिए ज्यादा माथा-पच्ची के बजाय छात्रों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए ।
( भले ही मुखर होकर शिक्षक ऐसा न कहें पर कर तो वही रहे हैं और भीतर भी वे यही मानते हैं)!

सितंबर 16, 2013

शिक्षक दिवस पर इधर-उधर की


(इस पोस्ट को पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगेगा जैसे पहला शिक्षक दिवस न हो गया पहला करवा चौथ हो गया ! अब जहां व्यक्तिगत होने की गुंजाइश होती है वहाँ ऐसा तो लग ही जाता है )

इस पेशे में आने के बाद यह पहला शिक्षक दिवस था । पहले को लेकर मन उत्साहित रहता है और कभी कभी हल्की घबराहट भी होती है । यह घबराहट तब दिखने भी लगती है जब अपने स्तर से ही किसी कार्य का निष्पादन करना पड़े मसलन, कोई कार्यक्रम संचालित करना या फिर भाषण ही देना । वैसे कई बार ऐसा हुआ कि घबराहट के बावजूद अंत में लोगों की सराहना मिली हैं पर भीतर किस तेजी से मन और मस्तिष्क काम करते हैं वह मैं ही जानता हूँ ।

बहरहाल , इस बार के शिक्षक दिवस पर मेरे लिए छात्रों और सहकर्मियों की कुछ योजनाएँ तो थी पर इसे मेरे और उनके लिए दुखद ही कहना उचित होगा कि, मैं अपने विद्यालय से बाहर था । इतना बाहर कि , चाहकर भी न आया जा सके । कई बार ऐसा लगा कि घर में कोई बहुत बड़ा आयोजन हो और मुझे किसी काम से बाहर भेज दिया गया हो । आंध्र प्रदेश के जिस विद्यालय में मैं ठहरा हुआ था वहीं मेरे साथ एक और व्यक्ति थे अमिताभ । उनका भी पहला ही शिक्षक दिवस था । उनका फोन सुबह से ही बजने लगा । गज़ब की मुस्कुराहट और घमंड के साथ उन्होने दो – तीन बार बताया कि , उनके छात्रों के फोन आ रहे हैं जो उन्हें शिक्षक दिवस की शुभकमनाएं दे रहे हैं । तब तो मुझे और बुरा लागने लगा । उतना ही बुरा, जितना बचपन में किसी त्योहार पर आस पास के बच्चों को नए कपड़े मिल जाते थे और मुझे तथा मेरे छोटे भाई को नहीं मिलते थे , जितना हमारी नानी द्वारा हमें बरफ़ खरीदने के लिए बेच नहीं देते और दूसरे बच्चों का हमारे सामने बरफ़ खाते समय लगता था । जब नानी बेच नहीं देती तब यह समझ में आने लगा था कि , नाना-नानी हमें कितना ही प्यार करें पर हमारा उन पर खासकर उनकी संपत्ति पर वह अधिकार नहीं है जो उनके पोते-पोतियों ने भोगा । इसलिए हमारे हठ का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था फिर जमीन पर लोटकर देह पटकना तो दूर की बात है । लगभग वही स्थिति मैं वहाँ वेट्टम के नवोदय विद्यालय में महसूस कर रहा था ।

मैं जानता हूँ कि मुझे ऐसा महसूस नहीं करना चाहिए था । हालांकि जो महसूस कर रहा था वह किसी पर ज़ाहिर भी नहीं होने दिया लेकिन मन तो तमाम आदर्शों और सिद्धांतों से परे है । यह आध्यात्म नहीं बल्कि वास्तविकता है । बाहर पाँच सितंबर एक सामान्य सा दिन था और मुझे भी इसे ऐसे ही लेना चाहिए था लेकिन मन के बंधन तो होते ही नहीं न ! तभी तो दोपहर बाद जब मेरी बारहवीं की छात्राओं ने फोन किया तो मन संयत नहीं रह पाया । धन्यवादों के अलावा मैंने क्या बोला यह मुझे न तब पता चल पाया और न ही अब याद आ रहा है । पर उसके बाद एक संतोष जैसा तो मिल ही गया था । मेरे भी छात्रों ने मुझे फोन कर के विश किया पर शायद मैं अब उस आत्मप्रशंसा वाली बिहारीयत को भूलता जा रहा हूँ । इसलिए न तो अमिताभ के सामने जाकर जताया और न ही ऐसा कुछ करने की इच्छा ही हुई ।

वेट्टम का शिक्षक दिवस
अमिताभ के छात्रों के फोन से हम दोनों की नींद टूट ही चुकी थी और फिर अपने चयनित खिलाड़ियों को तैयार कर सात बजे तक खेलों के लिए लाना भी था इसलिए चेहरे पर एक बूंद पानी डाले बिना ही लगभग भागकर छात्रावास की ओर जाना पड़ा । जब तक छात्रों को लाकर सबकुछ व्यवस्थित किया और सोचा कि कॉटेज पर जाया जाए तब तक नवोदय विद्यालय वेट्टम के छात्र अपनी प्रातः कालीन सभा ( मन में आ रहा है कि मॉर्निंग असेंबली लिख दूँ पर लिखुंगा नहीं ) की तैयारी करने लगे । बिना बोले ही हम दोनों में यह सहमति बन गयी कि अपने अपने विद्यालयों की प्रातः कालीन सभाएँ तो हमने देख ही राखी हैं अब मौका मिला है तो यहाँ भी खड़े हो लेते हैं और ऊपर से आज शिक्षक दिवस भी है । सभी नवोदय विद्यालय में एक सी प्रक्रिया ही प्रतिदिन दोहराई जाती है यही कारण था कि , सभा शुरू होने के कुछ मिनटों के भीतर धीमी आवाज़ में अपने अपने विद्यालयों की सभाओं पर बात करने लगे । उस समय न मैं बिहारी था और न ही अमिताभ । हम दोनों यह सब भूलकर आंध्र प्रदेश में सुदूर केरल के दो जिलों के नवोदय विद्यालयों की प्रशंसा कर रहे थे और वह भी एक दूसरे की बातों को काटते हुए !

सभा में स्थानीय प्रधानाध्यापक ने शिक्षक दिवस की औपचारिक सी शुभकामनाओं के साथ यह भी कहा कि उनका विद्यालय शिक्षक दिवस संबंधी कार्यक्रम और उसका विधिवत आयोजन बाद में करेगा । कम से कम दूसरे विद्यालय में ही सही शिक्षक दिवस की विद्यालयी व्स्ताविकता से वाकिफ़ होने का मौका मिलता पर वह भी बनते बनते रह गया । सभा समाप्त होने पर स्थानीय छात्रों ने डरते डरते ही सही विश करना शुरू किया । कुछ हाथ मिलाने तक आ गए पर लगा कि इसी बहाने हम जो उनके लिए अजनबियों से थे करीब आ सकते हैं । हमने भी झिझक तोड़कर उनकी शुभकामनायें स्वीकार की और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की । इसके बाद हम भागे थे कॉटेज की ओर क्योंकि जल्दी ही तैयार होकर नाश्ते के लिए आना था !

नाश्ते पर भी शुभकामनाओं का एक दौर चला । इस बार पिछले दो दिनों से हैदराबाद संभाग के जिन तीसेक शिक्षक-शिक्षिकाओं से जान-पहचान हो चली थी उन्हें हमने और हमें उन्होने विश किया । इसके साथ ही शिक्षक दिवस संबंधी औपचारिकता का समापन हो गया क्योंकि याद नहीं आ रहा कि उसके बाद किसी ने किसी को कुछ कहा हो ! अब तो वह आवश्यक रूप से एक सामान्य दिन था ।

खीज़-
यहाँ यह कहने का बड़ा मन कर रहा है कि , शिक्षकों की तरह उनके लिए निर्धारित दिन भी निरीह है । ऐसा इसलिए कहना पर रहा है कि , इसके आयोजन का भार भी शिक्षकों पर ही होता है इसलिए वे अपने लिए बहुत कुछ ऐसा जुटा पाने की हिम्मत भी नहीं कर पाते जो थोड़ा सा तड़क – भड़क वाला हो , हल्की विलासिता वाला हो । वह किसी तरह एक कामचलाऊ दिन अपने लिए बनाने की कोशिश करता है जो आधे घंटे या फिर एक घंटे के औपचारिक से कार्यक्रम के बाद खत्म हो जाता है । दूसरे इस दिन को मनाने में आम लोगों की भागीदारी होती ही नहीं है और उनकी दिलचस्पी भी नहीं । यह शिक्षकों की सामाजिक स्वीकृति !
जिम्मेदारियाँ तो बहुत डाली गयी हैं शिक्षकों पर और उन्हें निभाते हुए भी देखा जा सकता है लेकिन जिस समाज ने उन्हें ज़िम्मेदारी दी है उसमें उनकी स्वीकृति उस स्तर पर है जहां से एक पायदान भी नीचे गिरे तो अस्वीकृति का दारा शुरू हो जाता है । यह कहना बहुत सरल है कि शिक्षकों ने अबतक अपना काम नहीं किया और यह कहना बहुत कठिन और कहने वाले की सोच से परे कि , शिक्षकों को करने कहाँ तक दिया जा रहा है ।

शिक्षक समस्याओं की पहचान सबसे पहले कर सकता है बल्कि करता है लेकिन अपनी व्यवस्था में सबसे नीचे होने के कारण उसके लिए एकमात्र विकल्प यही रह जाता है कि आगे-पीछे ध्यान दिये बगैर घिसे-पिटे पाठ्यक्रम को और घिसता रहे । यदि उसके पास नए विचार हैं और उस विचार में संभावनाएं भी हैं तो भी हर बार किसी न किसी बोर्ड , समिति या फिर संगठन के कार्य करने के तरीकों का हवाला देकर उन विचारों की हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है । आगे नेतागिरि , माता-पिता , धार्मिक , सामाजिक और आर्थिक समूह शिक्षकों को किस तरह से पंगु करते रहते हैं उसे यदि समझाने की जरूरत रह गयी है तो इतना अनभिज्ञ और अज्ञानी समाज कहीं और नहीं मिल सकता !


सीख रहा हूँ  - 
शिक्षक दिवस बीता तो लगा कि , अपने एक शिक्षक के तौर पर बिताए गए समय पर तो गौर करना ही चाहिए । यह एक लेखा-जोखा नही , अनुभवों में हुआ परिवर्तन है बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि यह अनुभवों के साधनों में हुआ बदलाव है । पिछले शिक्षक दिवस से पहले अपने को इस बाबत शुभकामनाएँ देने का तो न तो कोई औचित्य था और न लोग देते थे । जिन एक दो ने लीक से हट कर ऐसा किया वे भी बी एड के बाद के ही लोग हैं । यह भी की उनकी संख्या दो –तीन से ज्यादा नहीं थी ।

बचपन में शिक्षक दिवस का अर्थ हमने बस यही जाना था की उस दिन आधी छुट्टी के बाद एक अध्यापक सौ – पचास डाक टिकट लेकर एक कक्षा से दूसरी कक्षा में जाते थे और छात्रों से पाँच रूपय लेकर एक टिकट बेचते थे । उनका बेचना कम और हड़काना ज्यादा होता था । हड़काते हुए कहते थे कि इससे एकत्र किया हुआ पैसा शिक्षकों के कल्याण में लगाया जाएगा ! जो बच्चे पैसे बचाना चाहते थे वे तो दूसरी पाली में विद्यालय आते ही नहीं थे मतलब उन शिक्षकों के कल्याण का पैसा स्वयं हड़प कर जाते थे । इस तरह बहुत कम पैसा जमा हो पाता था । उन शिक्षकों के साथ ऐसा ही होना चाहिए था ! नानी गाँव का मिडिल स्कूल था इसलिए मैं चाह कर भी पाँच रूपय बचाने की कोशिश नहीं करता था क्योंकि शाम होने से पहले ही शिकायत पहुँच जाती और उसके बाद अगले कई दिनों तक कई स्तरों पर ताने सुनने को मिलते । इसलिए टिकट न खरीदने का मन होते हुए भी पैसा जेब से अपने आप निकल आता था । बाद के दिनों में शिक्षक दिवस कवल सूचना भर होती और थोड़ा और बाद में पता चला की उस दिन राष्ट्रपति उत्कृष्ट सेवा प्रदान करने वाले शिक्षकों को पुरस्कृत भी करते हैं ।

अब शिक्षक बन गया हूँ तो ज़ाहिर है शिक्षकीय दशा से दो-चार होना ही पड़ता है । इसे मैंने दो-चार होना इसलिए कहा क्योंकि यह अपने – आप में एक अनाकर्षक सा ही पेशा है जैसा बाहर से दिखता है । इस पेशे में होना अपने आप में एक स्तरहीन अवस्था है जहां काम के अनुसार परिश्रमिक नही है , असीमित गति से प्रोन्नति नही है और आगे बढ़कर कहें तो इसमें ऊपरी आमदनी की गुंजाइश नहीं है । इससे अनाकर्षक क्या हो सकता है ? हमारे एक सहकर्मी का चयन हाल ही में केरल राज्य पुलिस में सहायक उपनिरीक्षक पद के लिए हुआ है । उनहोंने बताया कि वे केवल घूस की संभावनाओं के चलते उधर जा रहे हैं ऊपर से पुलिस बनना अपने आप में बहुत सी स्वतंत्रताओं और छूटों की गारंटी है ।

हमारे कारयालय अधीक्षक बार बार मुझे कोसते हैं क्योंकि मैंने डीआरडीओ में एक ठीकठाक पद के बदले मैंने शिक्षक बनना स्वीकार किया । लेकिन मैं मानता हूँ कि यदि वहाँ होता तो प्रोन्नति मिलती , वेतन भी यहाँ से ज्यादा मिलता फिर रक्षा मंत्रालय का अपना रुतबा भी था लेकिन जो सीखते रहने और अपने में लगातार परिवर्तन करते रहने का अवसर यहाँ मिलता रहा है वह कभी नहीं मिलता ! ऐसा मैं किसी को नहीं समझा सकता । फिर किसी संकल्पना , बात या अर्थ को बच्चे को समझा देने की जो खुशी मिलती है उसे अन्यत्र पाना नामुमकिन है ।

मुझे यह स्वीकार करते हुए बहुत खुशी है कि यहाँ थोड़े समय में ही बहुत कुछ सीखने को मिला । सबसे पहले तो यह कि अबतक मेरे अकेले की ज़िम्मेदारी में भी कई बार उलझन होती थी पर अब अपने साथ साथ अपने छात्रों की भी ज़िम्मेदारी किसी न किसी बहाने आती ही रहती है । अभ्यास के इतने अवसर हैं कि सीखने में त्रुटियों का कम होते जाना स्वाभाविक है ।

वहाँ वेट्टम में शाम होते होते सनीश ने फिर से वही प्रसंग छेड़ा । सनीश से अभी हाल में परिचय हुआ है वह पास के एक नवोदय विद्यालय में कंप्यूटर का अस्थायी शिक्षक है । पालक्काड से आंध्र प्रदेश जाने , वहाँ रहने और वापस आने तक वह साथ रहा था । उसने कई बार बताया कि उसकी उप-प्रधानाचार्य ने जब देखा कि वह विज्ञान विषय से स्नातक है तो उसने अपनी कक्षाएं उसके नाम कर दी और अब खुद उस समय आराम फरमाती है । अब वह कंप्युटर के अतिरिक्त विज्ञान भी पढ़ाता है ! दूसरी बात यह कि दसवीं कक्षा की एक लड़की ने उसे बहुत तंग कर रखा है । वह आने बहाने कंप्यूटर लैब में आ जाती है , अकेले मिलने की कोशिश करती है वगैरह । और वह उसे थप्पड़ लगाने वाला है !

अस्थायी शिक्षकों के साथ तो खैर हर जगह शोषण का आलम है उस पर क्या कहें लेकिन दूसरी बात पर गौर करना जरूरी था । मैंने और अमिताभ ने उसे कई तरह से समझाया साथ में  अपने उदाहरण भी दिये इस वक्तव्य के साथ कि इस उम्र में उस लड़की का और उस जैसी और बहुत सारी लड़कियों का अपने शिक्षकों के प्रति आकर्षित हो जाना कोई असामान्य बात नहीं है । बल्कि स्वस्थ मानसिक विकास की पहचान है ऐसे में थप्पड़ लगाने के बदले उसे समझते हुए उसका उपयोग कक्षा को चलाने में किया जाना चाहिए ।

सनीश की सच्चाई अपनी और शायद अमिताभ की भी थी इसलिए मुद्दे को समझने – समझाने में आसानी हुई । जब अपने साथ ऐसी स्थिति आती है तो झूठ नहीं कहूँगा कि मैं गुस्सा हो जाता हूँ या कि दुखी लेकिन धीरे-धीरे उन से निपटना सीख लिया है क्योंकि हर अभी कुछ  साल तो यही होना है जबतक कि बुड्ढ़ा न लगने लगूँ !


इस जैसी कई बातें हैं जहां शिक्षक होना मतलब लगातार सीखते रहना है । कल की घटना आज का अनुभव बना रही है और यह क्रम जारी रहने की उम्मीद है ! 

सितंबर 15, 2013

असंतोष से आगे


पिछले कुछ दिनों की भाग-दौड़ अब थम चुकी थी । बाहर से बस कितनी भी तेज चलती हुई दिख रही हो लेकिन भीतर अब शांति गहरा चुकी थी । छात्र - छात्राओं के नृत्य का उत्साह भी कब का ठंढा पर चुका था और अंदर की हल्की रोशनी में नींद में उनकी गरदनों के इधर से उधर लुढ़कने 
पर ही पता चलता था कि बस के भीतर भी गति जैसी कोई चीज है ।

हम क्षेत्रीय खेलों के लिए छात्र-छात्राओं का दल लेकर जा रहे थे । उस दल में अलग अलग विद्यालयों से आए हुए छात्रों को शामिल किया गया था और लगभग इसी तरह शिक्षक भी जुटाये गए थे । पहले की तरह उस दिन भी लगा कि जड़त्व का नियम और न्यूटन के गति का पहला नियम वस्तुओं के साथ साथ मेरे जैसे मनुष्यों पर भी लगता है जो एक स्थान पर टिक जाने के बाद अपने स्थान से इंच भर भी हिलना नहीं चाहते जब तक कि उन पर बाहरी दबाव न हो । जीतने शिक्षक थे सभी इसी नियम के उदाहरण थे और एक तो ऐसी भी रहीं जिनको  बाहरी दबाव में आना तो पड़ा लेकिन उनका गुस्सा और नखरा देख कर किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि उन्हें कोई ज़िम्मेदारी लेने के लिए कहने की हिम्मत करे ! और उनकी ही एक परिचित भी मिली लगातार सोने वाली ! कुल मिलाकर यदि देखा जाये तो जितनी देर बस चली उतनी देर उनकी नींद भी एक दूसरे को बराबर मात्र में संक्रमित करते हुए जारी रही ।

उन दोनों के अलावा तीन लोग और थे । इत्तिफाक़ से हम तीनों पुरुष थे और इस विद्यालयी व्यवस्था के रंगरूट भी सो कुछ उत्साह और कुछ ज़िम्मेदारी ने मिलकर हमें नींद जैसा महसूस नहीं करने दिया । बहुधा चार-पाँच झपकियों और एकाध घंटे की दो-एक झटकेदार नींद के सहारे उस रात में हम बढ़ रहे थे । कई बार न उठने का मन होने पर भी उठकर पीछे देखना पड़ता था कि पीछे बैठे लड़के लड़कियों के करीब तो नहीं आ गए । हमारा हाल नमक का दारोगा कहानी के पंडित अलोपीदीन जैसा हो रहा था जो अपनी टप्पर-गाड़ी में कुछ सोते, कुछ जागते चल रहे थे उस रात !
यूं तो हमें इसकी आशंका आंध्रप्रदेश जाने की सूचना मिलने के समय से ही थी पर ऊपर से बार – बार यह आश्वासन दिया गया था कि , जहां जाना है वह तेलंगाना है आंध्र नहीं ! तेलंगाना शांत है और आंध्र अशांत इसलिए इन खेलों को आंध्र से हटकर तेलंगाना के विद्यालयों में स्थानांतरित किया गया है । ऊपर वालों का तर्क एक बेफिक्री तो दे ही रहा था । लेकिन जब रात के दस बजे के करीब हम तमिलनाडु में खाने के लिए रुके तो वहाँ के लोगों और चालकों ने जो बताया उसने उस आशंका को डर में तब्दील कर दिया । उन्होने हमें रस्ता बदलकर कर्नाटक का लंबा चक्कर लगा कर सीधे तेलंगाना के उस क्षेत्र में जाने की सलाह दी । फिर हमारी असमर्थता और विवशता को भाँप कर सुबह होने से पहले ही आंध्रप्रदेश के अशांत क्षेत्र से निकल जाने की दूसरी सलाह दी । जल्दी जल्दी ठूंस-ठांस कर बस में बैठे और बस तेजी से चलने लगी । हालांकि बस की गति बहुत तेज थी लेकिन यात्रा के बचे हुए किलोमीटर को सुबह होने में बचे समय में नाप जाने की कोई सूरत बन ही नहीं रही थी और हम सभी जानते थे कि हमारा ड्राइवर हॉलीवुड बॉलीवुड तो जाने दीजिये स्थानीय मालीवुड का भी कोई सुपरमैन होता तभी यह संभव हो पाता ।

खाना खाते ही शिक्षिकाएँ सो गयी और हम तीन शिक्षक आगे की दशा और शायद आशंका की मन ही मन कल्पना करते हुए बैठ गए । और बच्चे सभी इन सबसे बेखबर गज़ब चहक रहे थे । किसी ने गाना बजाने का आग्रह किया । उसे हमने भी इसी लिए माना कि चलो इसी बहाने उस अशांत आंध्र से तो सबका ध्यान हटे । गाने बदलते रहे , बच्चों का नृत्य होता रहा गानों की लय के अनुरूप बदल-बदलकर ! उनका नृत्य शुरू होते ही शिक्षिकाएँ कुनमुना कर तो उठीं पर कुछ देर बाद फिर सो गयी । ठीक ठाक समय बीत जाने के बाद कई बार ऐसा लगा कि बच्चे थक गए अब नृत्य बंद कर देंगे पर हर बार वे उस लगने को धता बताते हुए अगले गीत पर अगले उत्साह से नाचने लगते । रात एक बजे आसपास हम चेन्नै से कुछ दूरी पर रहे होंगे लगभग तभी बच्चों का नाचता हुआ अंतिम समूह हमारे पास गाने बंद करा देने आया । बस में शिक्षिकाएँ सो रही थी , बच्चे भी । ड्राइवर से हैल्पर बात कर रहा था और हम तीन लोग लगभग जागते हुए तेजी से फोर लेन पर दौड़ती बस की गति पर मुग्ध हुए जा रहे थे । लेकिन अशांत आंध्र प्रदेश की आशंका उठते ही बस की गति की सीमा का अंदाजा आने लगता ।

करीब चार बज रहे होंगे । पता नहीं मेरी नींद कैसे टूटी लेकिन जब टूटी तब पता चला कि मैन बढ़िया नींद में था । नींद टूटी तो देखा सभी सो रहे थे । हम तीनों ने जो अलिखित सा नियम बनाया था कि जागते रहना है उसके टूटने पर आश्चर्य हुआ और उससे भी बड़ा आश्चर्य तो तब हुआ जब बस को रुका हुआ पाया । तमाम आशंकाओं के सर उठाने का यही समय था । एक बार तो लगा कि कोई टोल नाका हो पर बाहर देखा तो उस जैसा कुछ नहीं लग रहा था । घुप्प अंधेरा और इक्का-दुक्का ट्रक की रोशनी और आवाज़ ही थी वहाँ जो फोर लेन के वैभव और सौंदर्य से कोसों दूर थी ।  

बाहर निकला तो देखा अपने ड्राइवर साहब अपने कागज़ात की फाइल सम्हाले एक ओर बढ़ रहे थे । समझते देर नहीं लगी कि पुलिस की चेकिंग चल रही है । मन की आशंका इस बात से  थोड़ी शांत हुई कि चलो यहाँ पुलिस तो है । उधर जाने के बजाय वापस बस में आ गया । बस में मुतमयीनी भरी थी जिसे बेपरवाह सोते चेहरों पर पढ़ा जा सकता था ।

काफी देर बाद भी जब ड्राइवर नही आया तो हम तीनों नीचे उतरे और उस ओर बढ़ गए । उस अंधेरे में भी पुलिस वाले की छवि अलग ही दिख रही थी । छोटे से कद पर तोंद निकली हुई और सर पर पुलिसिया टोपी हज़रत किसी जोकर से कम नहीं लग रहे थे । इससे स्पष्टवादी पुलिस वाला नहीं देखा था । हो सकता है और भी पुलिस वाले ऐसे होते हों पर चूंकि अपना साबका पुलिस से लगभग नहीं ही पड़ा है इसलिए इस संबंध में जानकारी कम है ।

वह सीधे-सीधे कह रहा था कि आंध्र प्रदेश में जाना है तो यहाँ रूपय देने पड़ेंगे । ड्राइवर अपनी चिरौरी कर रहा था तरह – तरह की काल्पनिक और वास्तविक विवशताओं का हवाला देकर । उस समय हमें भी यही सबसे अच्छा विकल्प लगा । हमने भी चिरौरी की । केंद्र सरकार , समिति , बच्चे , सीमित धनराशि सबका हवाला हमने भी दिया । हमने मतलब हम तीनों ने । तो एक बार हज़रत बोले कि चूंकि आपलोग केंद्र सरकार से संबन्धित हैं इसलिए बस सौ रूपय दीजिये । हमने फिर अपने हवालों को देना जारी रखा । तब शायद उसे लगा होगा कि उसका पुलिस वाला होना खतरे में पड़ रहा है । वह गरजने लगा । ए पी बंद है , प्रदर्शन हो रहे हैं कोई सुरक्षा नहीं बस वापस ले जाओ । हमारे पास अब विकल्प साफ हो गया था कि बस सौ रूपय की तो बात है निपटाओ यार ! वैसे भी ज्यादा ईमानदारी पर रहते तो रात के चार बजे न तो कोई प्रिंसिपल फोन उठाता और न समिति के किसी बड़े अधिकारी से उसकी बात करने की हिम्मत होती । ले – दे कर सुबह होने के बाद ही मामला सुलझ पाता । तब तक तो बस आंध्र के कई किलोमीटर टाप देती । सौ रूपय मिलते ही वह जोकर पुलिसवाला अगली गाड़ी को रुकवाने चला गया और हम सब बस में । हमारे अगले कुछ मिनट पुलिस के व्यवहार , भ्रष्टाचार, देश की दुर्दशा आदि की व्याख्या में ज़ाया हुए । सबसे ज्यादा इस बात पर हमने समय दिया कि उस पुलिस वाले ने हमसे घूस लिया भी तो सौ रूपय । और जैसा कि हर बार होता बिना किसी समाधान और निष्कर्ष के एक एक कर चुप होते गए ।

लगभग दस-बारह दुकानों के बाद एक दुकान पर पढ़ने को मिला चित्तूर । मतलब हम आंध्र प्रदेश में पवेश कर गए थे । अचानक मध्य एशिया , ईरान , इराक़ और कुछ मानों में अफगानिस्तान के दृश्य उभरने लगे जेहन में । ये वे दृश्य थे जो युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों में देखे थे । सबकुछ शांत था । दुकानों, घरों के दरवाजे बंद थे । सड़क की पीली रोशनी भी रहस्यमय लग रही थी । किसी चौराहे पर एक पंडाल लगा था , लाल - लाल रखी थी करीने से । वहीं चाय की गुमटियों पर दो – चार लोग हंस बोल रहे थे । बस आगे बढ़ी तो फिर वही शांति । शांति को पाकर कोई अच्छा महसूस नहीं हो रहा था क्योंकि युद्ध प्रभावित जिन देशों पर फिल्में बनी हैं उन फिल्मों में तो यही देखा कि सब कुछ शांत रहता है और अचानक से कोई मोर्टार किसी गाड़ी पर दाग दी जाती है । एक अफरातफरी तो मचती है लेकिन उसके बाद फिर शांति अगले हमले तक । नींद अपना दबाव बढ़ा रही थी लेकिन जब बस की गति हल्की भी धीमी होती तो लगता कि बस को रोका जा रहा है या नहीं तो पथराव आदि से बचने के लिए ड्राइवर रास्ता बदलना चाहता हो । आँख खुलती तो वही शांति दिखती । नींद का दबाव बढ़ता ही गया ।

सुबह जब नींद खुली तो दूर दूर तक खेत फैले हुए थे । दायीं तरफ की पहाड़ी से सूरज निकलने की तैयारी कर रहा था । मैंने जब तक कैमरा निकाला तब तक तो किसी चिड़ियाँ के अंडे से निकले चूजे की तरह बाहर आ गया था । बस अब आबादी के बीच चल रही थी । सड़क के दोनों ओर सुबह की शुरुआत के नजारे देखे जा सकते थे । इन सब के बीच कहीं भी यह नहीं लग रहा था कि आंध्रप्रदेश सुलग रहा है , राह चलती गाड़ियों पर पथराव किया जाता है । युद्धभूमि की वास्तविकता से ज्यादा उससे जुड़ी अफवाहें बाहर फैलती हैं ऐसा कई बार उन फिल्मों में मैंने महसूस किया था और ज्यों ज्यों हम आंध्र में प्रवेश करते जा रहे थे त्यों – त्यों वहाँ भी यह बात पूष्ट हो रही थी । आगे दिन भर हम आंध्रप्रदेश में ही तब तक चलते रहे जब तक कि आंध्र और कर्नाटक की सीमा न आ गयी । लेकिन जिन अफवाहों से सहमकर हम चिंतित थे उनका नामोनिशान भी नहीं था । बस सरपट दौड़ रही थी । उसमें फिल्म और नृत्य के दौर पे दौर चल रहे थे ।


ऐसा नहीं है कि आंध्र प्रदेश में असंतोष नहीं होगा पर असंतोष अब वास्तविकता को स्वीकार करने में बदल रहा है । दोनों तरफ के लोग यह मानने लगे हैं कि प्रदेश के बँटवारे को वापस लिए जाने की संभावना अब नहीं बची । ऐसे में चक्का-जाम, प्रदर्शन, हिंसा आदि को जारी रखना लोगों के लिए कठिन होना स्वाभाविक ही है । लोग अपनी दिनचर्या में मशरूफ़ हैं । और उनहोंने बटवारे और उसके प्रभावों स्वीकार कर लिया है । इसके बावजूद जैसा कि हर प्रभावित क्षेत्र में होता है पुलिसवालों , कालाबाजारियों की सक्रियता बढ़ जाती है । स्थिति का फायदा ये अपने हित उठाने लगते हैं । यही आंध्रप्रदेश में आंध्र प्रदेश के नाम पर हो रहा है । 
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