जून 06, 2014

गैर बराबरी की मातृभाषा में शपथ-ग्रहण


मेरे पिताजी संस्कृत महाविद्यालय में पढ़ाते हैं । उनका महाविद्यालय जिस विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है वह विश्वविद्यालय भी संस्कृत विश्वविद्यालय ही है । यहीं से कह सकता हूँ कि आज जब वे अपने कार्यस्थल पर गए होंगे तो वे और उनके सहकर्मी मिले होंगे तो बहुत खुश हुए होंगे । बहुत चर्चा हुई होगी और आशा-उम्मीदें भी बंधी होगी । इस खुशी का कारण पक्के तौर पर यह होगा कि कल बहुत से सांसदों ने संस्कृत में शपथग्रहण किया है । समय तो अब पहले जैसा नहीं रहा कि समाचार पहुँचने में दो तीन दिन अलग जाये और जब तक पहुंचे तब तक यह एक अफवाह की शक्ल ले ले । लेकिन संस्कृत महाविद्यालय में जश्न का सा माहौल तो आज ही रहा होगा ।   

संस्कृत भाषा मेरे पिताजी और उनके जैसे बहुतों को रोटी दे रही है । हमारे घर की एक एक ईंट मे उसी भाषा का योगदान है । इतना स्वीकार करते हुए भी मुझे कई बार यह लगा कि मेरे पिताजी जिस स्थान पर काम करते हैं वह किसी और ही दुनिया में है । यहाँ यह कह देना कि वह महाविद्यालय एक पिछड़ी हुई दुनिया की चीज है बड़ी हल्की बात होगी । ऐसी बात उस संस्थान के बारे में लोग कहते भी हैं । उस महाविद्यालय में छात्रों की न्यूनता को देखकर बिना कुछ कहे इसे समझा जा सकता है । लेकिन मेरा मानना है कि अपने पिछड़ेपन को लेकर नहीं बल्कि दुनिया की ओर पीठ करके खड़े होने की प्रवृत्ति उस संस्थान को बाकी दुनिया से काट देती है ।

यह बात मेरे पिताजी और उन जैसों की खुशी से अलग है । निश्चित तौर पर इस तरह से बात करना उन सबके प्रति द्रोह की तरह देखा जाएगा इसके बावजूद मुझे उस संस्थान की अगतिशीलता से चिढ़ के स्तर तक परेशानी है । कई बार मुझे लगता है कि संस्कृत कैसी भी उपयोगी भाषा रही हो लेकिन इसके भीतर अहंकार, दंभ, गैर बराबरी, उत्पीड़न आदि के तत्वों को आश्रय देने के सारे खाने मौजूद हैं । उन खानों में घुसे बैठे ये तत्व भाषा के मूल कार्य को खत्म कर उसे भय और गैर बराबरी की भाषा के दर्जे तक ले आए हैं । भाषा के द्वारा यह सब कैसे संभव हो पाया और कब इसकी शुरुआत हुई यह अलग चर्चा का विषय है तथा बहुत सी विशेषज्ञता की मांग करता है लेकिन इन सबने मिलकर संस्कृत भाषा का जो स्वरूप बनाया है वह मूल रूप से घृणा का ही ठहरता है । और आश्चर्य तो तब होता है जब उसी भाषा से धन अर्जित करने वाले लोग उस भाषा के सिमट जाने के मूल कारण को ठीक करने के बजाय उसे ही दुहराने में लगे रहते हैं ।

संस्कृत भाषा ने जो भी साहित्य दिया हो लेकिन उसके सेवकों के लिए उनका कोई महत्व नहीं है । संस्कृत आज भी अपने सेवकों में लोकप्रिय है तो बस अपने भीतर से उपजे कर्मकांड की वजह से । यही कर्मकांड उन सेवकों को रोटी देता है और तमाम प्रयासों के बावजूद भी लगातार बनी हुई जाति व्यवस्था में उन्हें स्व-निर्मित और स्वनिर्धारित श्रेष्ठता का भ्रम देता है ।

यहाँ यह कह देना भी ठीक ही रहेगा कि ऐसा केवल सहरसा जिले के उस महाविद्यालय तक ही सीमित नहीं है बल्कि बड़े शहरों के बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में चलने वाले संस्कृत विभागों की भी यही हक़ीक़त है । इन विभागों में संस्कृत की जातीय संरचना उसी तरह अटूट चल रही है । दिल्ली में बहुत दिन रहा तो दिल्ली विश्वविद्यालय की दशा से पूरी तरह वाकिफ हूँ । मुश्किल से एक दो नाम होते हैं गिनाने को जो संस्कृत की सेवक जातियों से अलग हों । बीएचयू तो खैर बहुत सारे विषयों में वह जातीय रचना बनाए हुए है ।

अब फिर से बात करते हैं उस खबर की जिसे सुनकर मेरे पिताजी और उनके सहकर्मी बहुत खुश हुए होंगे । वही संस्कृत में शपथ लेने वाली बात ।संस्कृत में शपथ लेना एक दुराग्रह है । दुराग्रह इसलिए कि उस समाप्त हो चुकी भाषा को बस शपथ ले लेने से जीवित नहीं किया जा सकता । एक चुकी हुई भाषा के प्रति सम्मान होना चाहिए । उसे सुरक्षित भी रखने की आवश्यकता है ।  लेकिन ऐसी वह अकेली भाषा नहीं है जो अस्तित्वहीन हो रही हो, इस देश की हो और प्राचीन हो ।

संस्कृत में शपथ लेने का सारा मामला ही दूसरा है । यह भाषा शपथ लेने को प्राचीन राजसी ठाठ देती है । जिस भाषा में राजा महाराजा राज्यारोहण करते रहे हैं और जो भाषा अपने उत्स से लेकर आजतक राजा और प्रजा में अंतर करवाती आ रही है उस भाषा में शपथ लेना राजत्व को पुनर्जीवित करने का भ्रम देता है । इतना तो सब जानते हैं कि संस्कृत अपने चरम काल में भी केवल शासकों की भाषा ही थी जो इस शपथग्रहण से प्रमाणित हो गयी । इस भाषा में शपथग्रहण को अंग्रेजी में कसम लेने के बरक्स देखा जा रहा है । कहा जा रहा है कि अंग्रेजी जो शासकों की भाषा थी उसके मुक़ाबले संस्कृत को रखा गया । जबकि संस्कृत शासकों की ही भाषा थी । जिन लोगों ने ऐसा किया वह निश्चित तौर पर यह दिखाना चाहते थे कि राजा और प्रजा में अंतर है । राजा राज के अनुकूल बोली बोलता है ।

फिर आती है भाषा की रक्षा और उसके सम्मान की बात तो संस्कृत अकेली भाषा नहीं है । और बहुत सी भाषाएँ हैं जिनको बोलने वाले दो चार ही बचे हैं । जब बचाना ही था तो उन्हें बचाते । किसी भाषा की रक्षा और उसका सम्मान इस तरह से नहीं होता है कि चार लोग शपथ के दस वाक्य उस भाषा में बोल लेंगे और वह भाषा बढ़ गयी । किसी भी भाषा की रक्षा के लिए खास सोच की जरुरत है जो रोजगार से ज्यादा जुडती है । यह कहना बहुत कठिन नहीं है कि आगे संस्कृत या इस तरह की अन्य किसी भाषा में रोजगार का सृजन हो सकेगा । शायद ही सरकारी पैसे और संरक्षण में चल रहे महाविद्यालयों से कहा जाएगा कि आप अपने यहाँ संस्कृत भाषा से गैर बराबरी बढ़ाने वाले तत्व निकालिए और इसे एक भाषा और साहित्य के रूप में आगे बढ़ाइए न कि आपसी नफरत की संचारक भाषा के रूप में ।


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