जुलाई 30, 2014

हिन्दी और सीधे सादे होने का नाटक


जैसा कि हमारे नवोदय विद्यालय में नियम है नवीं कक्षा के लगभग 25 बच्चों को अपने मूल विद्यालय को छोड़कर देश के किसी दूसरे राज्य के नवोदय विद्यालय में पढ़ने जाना होता है और इसी तरह की उल्टी प्रक्रिया भी दोहरायी जाती है । इसी नियम के तहत हमारे विद्यालय के छात्र उत्तर प्रदेश के गौरीगंज अमेठी नवोदय विद्यालय पढ़ने जाते हैं और वहाँ के छात्र यहाँ आते हैं । इस बार भी यह क्रिया दोहराई गयी । हमारे विद्यालय के एक अध्यापक जो अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उनके साथ पुस्तकालय इंचार्ज छात्र छात्राओं को लेकर गवापस आकर जो उन्होने बताया वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था ।

वे यहाँ से राप्ती सागर एक्स्प्रेस में गए थे । एर्णाकुलम से गौरीगंज तक की उबाऊ यात्रा तीन दिनों में पूरी होती है । जाने आने और खाने पीने का खर्चा सरकार वहन करती है । लेकिन ये वहाँ करने का जो तरीका है वह बहुत पुराना है । इसके परिणामस्वरूप सरकारी धन अधिकतम दो दिनों तक भी बमुश्किल चल पाता है । फिर छात्र अपने पैसे से खाएं या नहीं तो अध्यापक / अध्यापिका जो साथ गए हैं वे अपनी उदारता से कुछ दिला दें तो बड़ी बात है । इसमें एक काम और होता है । अध्यापक / अध्यापिका रेलवे के कैटरिंग कर्मचारियों से मोलभाव करते हैं ताकि उन्हीं पैसों में बच्चों को कम से कम ढाई दिनों का खाना मिल जाए और तीसरी शाम भूखे भी गौरीगंज पहुँच गए तो कोई बात नहीं वहाँ विद्यालय का खाना मिल जाएगा !

पिछली बार जब मैं गया तो मैंने दूसरा तरीका अपनाया था । लेकिन इस बार गए अध्यापकों के सामने दूसरा रास्ता था ही नहीं । क्योंकि वे मोलभाव नहीं कर सकते थे । कहाँ से मोलभाव करते उन्हें हिन्दी आती ही नहीं थी । राप्ती सागर में आईआरसीटीसी के कर्मचारी हिन्दी भाषी हैं । बात यहीं खत्म नहीं होती । उन कर्मचारियों ने हिन्दी नहीं बोलने के कारण इन दोनों अध्यापकों की बड़ी फ़ज़ीहत की । अंग्रेजी के उक्त अध्यापक ने बताया कि यह दुर्व्यवहार एक यात्रा के पहले दिन से शुरू होकर यात्रा अंतिम होने के समय तक जारी रहा और अंततः यह एक गतिरोध में बदल गया । इस गतिरोध का नतीजा यह था कि वेंडरों ने मनमाने दामों पर सामान बेचा । सरकारी पैसा तो जल्दी ही चुक गया साथ में अपनी जेबें भी ढीली करनी पड़ी । यात्रा के खर्चे का हिसाब वापस आने पर विद्यालय के कार्यालय में देना होता है जिसके लिए विद्यालय के क्लर्क पक्की रसीद की मांग करते हैं । इसलिए  इन अध्यापकों ने रेलवे वेंडरों से रसीद मांगी । इस पर टका सा जवाब मिला कि जबतक हिन्दी नहीं बोलोगे रसीद नहीं देंगे । जबकि मैं जब पिछली जनवरी में छत्रों को ले गया था तब तीनों दिन की रसीद तो मिली ही थी साथ में बहुत तरह की छूट भी । लेकिन इनके साथ यह बर्ताव किया गया । वह भी हिन्दी न बोलने के नाम पर ।

वापस आने पर बड़ी मुश्किल से तरह तरह के फ़र्जी रसीदों का इंतजाम कर के कार्यालय में खर्चे का ब्यौरा जमा करवाया गया है अब यदि मार्च में यदि कैग वाले यदि उन रसीदों को नहीं मानते हैं तो इन दोनों अध्यापकों को भरी नुकसान उठाना पड़ सकता है । आर्थिक नुकसान तो चलिये बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन हिन्दी न बोलने के नाम पर जो अपमान रास्ते भर वो वेंडर करते रहे उसकी भरपाई कहाँ से हो पाएगी ?

सारी घटना का का जिक्र जब वे कर रहे थे तो स्टाफ-रूम में जो भी लोग थे वे रोष से भर गए । उस समय मैं हिन्दी और उससे ज्यादा उत्तर भारत के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मौजूद था । मेरी स्थिति अपराधियों वाली थी । हिन्दी के नाम पर यह दुत्कार तो अहिंदी वालों को निश्चय ही इस भाषा से दूर करेगा ।

इसी विद्यालय में तदर्थ(एडहॉक) सेवा के अधीन टीजीटी हिन्दी के रूप में कर्तिका नाम की एक लड़की काम करती है । केरल में रहते हुए भी उसने हिन्दी से एमए किया और उसकी हिन्दी वाकई अच्छी है । वह स्थायी अध्यापिका बनने के लिए प्रयासरत है । दो बार उसने केंद्रीय विद्यालय में पीजीटी हिन्दी की नौकरी के लिए परीक्षा दी और दो ही बार नवोदय विद्यालय के लिए भी । एक बार भी वह लिखित परीक्षा पास नहीं कर पायी है । हर बार वह दो- चार अंकों से पीछे रह जाती है । अभी ताजा उदाहरण केंद्रीय विद्यालय के पीजीटी भर्ती का है जिसका अभी हाल ही में साक्षात्कार सम्पन्न हुआ है । उस परीक्षा में भी वह चार अंकों से पीछे रह गयी ।

परीक्षा में पास नहीं होने को हम सभी छात्र की असफलता मानते हैं । यही मानते हुए मैंने भी उसका मज़ाक उड़ाया और जैसा कि स्थायी नौकरी वाले करते हैं मैंने उसे पास होने और पढ़ने के प्रति समर्पित होने पर एक लेक्चर दे दिया । लेकिन उसने मेरे सामने वह सच्चाई सामने रखी जो आज तक हमारी नजरों से ओझल होती रही है । केंद्रीय विद्यालय के पीजीटी हिन्दी पड़ के साक्षात्कार के लिए बुलाये गए अभ्यर्थियों में एक भी दक्षिण भारतीय नहीं था । जबकि इधर के सभी बड़े विश्वविद्यालयों में हिन्दी विषय के रूप में शामिल है । इतने सारे दक्षिण भारतीय हिन्दी डिग्रीधारी लोगों में से एक का भी नहीं होना खलता जरूर है ।

कर्तिका कहती है कि दक्षिण के हिन्दी वालों के लिए या तो प्रश्न उनके अनुसार होने चाहिए अन्यथा उनका कट ऑफ थोड़ा नीचे होना चाहिए । बात अटपटी जरूर लगती है पर व्यावहारिक तो यही है । क्योंकि हिन्दी के प्रश्न हिन्दीभाषी क्षेत्र के अभ्यर्थियों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं । वे प्रश्न इलाहाबाद , पटना का व्यक्ति हँसते खेलते कर लेता है । वह हिन्दी की तो तैयारी भी नहीं करता । सारा ध्यान परीक्षा के अन्य अंगों पर लगाता है इसलिए उसकी सफलता की संभावना ज्यादा रहती है । पर कर्तिका जैसों के लिए यह सुविधा नहीं है  ।


हिन्दी का स्तर वैसे भी देश में कोई बहुत ऊंचा नहीं है उसमें भी इस तरह के भेदभाव आने वाली पीढ़ी को हिन्दी से और इसके माध्यम से हिन्दी प्रदेश से दूर करने में बड़ी भूमिका अवश्य निभाएंगे ! जरूरत व्यवहारों के प्रति सजग होने और उसे दूर करने की है । 

जुलाई 02, 2014

दृष्टिहीन की कलम


अमेरिकी राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति भले ही बदलते रहे हों पर पिछले साठेक सालों से वहाँ के कार्यालय की एक चीज नहीं बदली है । वह है कार्यालय द्वारा प्रयोग की जाने वाली कलम की कंपनी । राष्ट्रपति जिस कलम का इस्तेमाल करते हैं वह स्किलक्राफ्ट यू एस गवर्नमेंट नामक कंपनी तैयार करती है । अमेरिका में प्रतिवर्ष पाँच मिलियन डॉलर मूल्य की ये कलमें बेची जाती हैं जिनमें से लगभग 60 फीसदी सेना के द्वारा इस्तेमाल की जाती हैं । 

इन कलमों की एक विशेषता है । ये दृष्टिबाधित लोगों द्वारा तैयार की जाती हैं । 1938 ई में ग्रेट डिप्रेसन’# के दौरान वहाँ की सरकार ने दृष्टि बाधित लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूज़वेल्ट ने एक ऐसे कानून पर दस्तख़त किए जिसके अंतर्गत अमेरिकी सरकार को अपने दृष्टिहीन नागरिकों द्वारा उत्पादित सामान खरीदना था । यह कानून वेंगर – ओ डे के नाम से जाना जाता है । जल्दी ही इसमें कलमों को भी शामिल कर लिया गया । स्किल क्राफ़्ट कलमें वही कलमें हैं ।

एक ब्रांड के रूप में इस कलम को स्थापित होने में एक दशक से ज्यादा लग गए । लेकिन आज अमेरिका के 37 राज्यों के 5500 से अधिक दृष्टि बाधित लोग इस कंपनी के विस्कॉन्सिन और नॉर्थ कैरोलिना इकाइयों में भारी मात्रा में इन कलमों का उत्पादन कर रहे हैं । इसके साथ साथ और भी लगभग 3000 प्रकार के उत्पादों का निर्माण कर रहे हैं । 

ये कलमें आज भी उन्हीं विशेषताओं के लिए जानी जाती है जो आधी सदी पहले के एक 16 पृष्ठों वाले दस्तावेज़ में निश्चित की गयी थी । इनसे बस इतनी अपेक्षा होती है कि ये शून्य से 40 डिग्री नीचे और 70 डिग्री ऊपर के तापमान पर कम से कम 1500 मीटर की लिखाई सम्पन्न करे वह भी बिना रुके हुए ।

यह तो हुई अमेरिका की बात जहां कलम तो बस एक बहाना था बड़ी संख्या में दृष्टि बाधित लोगों को जीवन की मुख्यधारा में शामिल करने का । कलम निर्माण के साथ ही बहुत से अन्य उत्पाद भी वहाँ दृष्टिहीन लोग बनाते हैं और उनसे सरकार वे उत्पाद खरीदती है ।

अमेरिकी जनसंख्या के मुक़ाबले हमारे देश की जनसंख्या में दृष्टिबाधित लोगों की संख्या बहुत ज्यादा होगी । पर कहीं भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं जो इन्हें मुख्यधारा तो दूर अपना आत्मविश्वास और आत्मसम्मान ही लौटा सके । हमने अपने इन साथी नागरिकों के लिए ऐसा माहौल बनाया है जिसके अंतर्गत खाते पीते घरों के लोगों को छोड़ दें तो ये बस भीख ही मांग सकते हैं और जो नहीं मांग सकते वे और बुरी हालत में जीते हैं ।

अपने देश में एक सूरदास हुए कवि और गायक । उनकी आँखें नहीं थी । तब से आजतक पूरी हिन्दी पट्टी में सूरदास दृष्टिहीन लोगों के लिए कभी संज्ञा तो कभी विशेषण बनकर सामने आता है । शायद ही कुछ लोग ऐसे मिलें जिनको लोग उनके नाम से पुकारते हैं वरना सब सूरदास हैं । इसका दुखद पहलू यह है कि उनसे अपेक्षा रहती है कि वे कुछ न कुछ गाएँ । दृष्टिहीन होना , सूरदास कहाना और गानगीर होना एक दूसरे के लिए अनिवार्य हो । तभी रेलवे स्टेशन , ट्रेन , बस अड्डे , गाँव- आँगन जहां जहां देखिये दृश्य हीनता के शिकार लोग बेसुरे होने पर भी गीत गाने के लिए बाध्य हैं । उनकी फटी हुई आवाज इसकी पूरी सूचना देता है कि वे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लगातार ऐसा करते आ रहे हैं ।

बचपन की एक घटना याद है । हमारी नानी के यहाँ एक व्यक्ति आए । उनको देखती ही किसी ने कहा – 'सूरदास , गीत सुनेबइ त न भीख मिलत' । उस व्यक्ति का जवाब मुझे अभी तक याद है – 'सब सूरदास गानगीरे नै होई छै' । यकीन मानिए उस व्यक्ति को जरा सी भीख भी नहीं दी गयी और दुत्कार कर आँगन से बाहर कर दिया गया ।

शैलेश मटियानी की कहानी है दो दुखों का एक सुख उसमें भी स्टेशन की पटरी पर बैठा सूरदास गाना ही गाता रहता है ।
निश्चित तौर पर भारत के सभी सूरदास भीख नहीं मांगते हैं । पैसे वाले घरों के लोग बाहर ही नहीं निकलते हैं लेकिन जिनके परिवार की माली हालत औसत दर्जे की भी है उन्हें बाहर आना ही पड़ता है । बाहर जो दुनिया है उसमें भूख मिटाने के लिए कोई रोजगार नहीं है ।


हम अमेरिका को बहुत भला बुरा कहते रहते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सम्मान और पहचान दिलाने में जितनी मदद वहाँ की सरकार करती है उतना हम सोच भी नहीं सकते । उदाहरण हमारे सामने है । वहाँ 1938 ई में ही सरकारी तौर पर दृष्टिबाधित लोगों को रोजगार देने के लिए राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम बनाए गए और हम अभी तक विचार करने की हैसियत में भी नहीं आ पाये हैं । 

# ग्रेट डिप्रेसन के बारे में इस लिंक पर पढ़ें ---
http://history1900s.about.com/od/1930s/p/greatdepression.htm#


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