मार्च 15, 2016

कठिन होते जा रहे प्रश्न ...


परीक्षाओं के इस मौसम में एक नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है । अध्यापक , माता-पिता , प्राचार्य और मीडिया के लोग परीक्षा भवन से बाहर आ रहे छात्रों की मुस्कान की चौड़ाई से , उनके आँखों की लाली और  उनमें बसी पानी की मात्रा से छात्र के प्रदर्शन को जाँचने लगे हैं । यदि बच्चा हँस नहीं रहा है तो परीक्षा कठिन हुई होगी , आँखें लाल हैं तो भी वही हुआ होगा और बाहर आते ही रोने वाले छात्रों के बारे में तो कहना ही  क्या ! पहली ही मार्च को अंग्रेजी की परीक्षा थी प्रश्नपत्र सामान्य ही था लेकिन एक प्राचार्य ने संबन्धित अध्यापक से कहा कि छात्र बाहर आते हुए मुस्कुरा नहीं रहे थे ...लगता है प्रश्न कठिन थे और छात्रों ने ठीक से उत्तर नहीं दिए ! माता पिता तो पहले से ही मानकर चलते हैं कि उनके बच्चे शत- प्रतिशत अंक पाने वाले हैं । सो एक अंक का प्रश्न छूट जाने से भी बच्चों से ज्यादा उनका ब्लड - प्रेशर बढ़ जाता है । एक अध्यापक को संबन्धित विषय की परीक्षा के दौरान ऐसी कुछ स्थितियों से दो चार होना पड़ता है ! उस दिन जिसकी चमड़ी जितनी मोटी होती है उसके लिए उतने ही फायदे की बात है ! हाल के दिनों में जब से छात्र परीक्षा परिणाम के डर से अत्महत्या करने लगे हैं तब से परीक्षा के प्रश्नपत्र भी खबर की हैसियत रखने लगे हैं ।

ऊपर की स्थितियाँ देखकर खुशी होती है कि अध्ययन अध्यापन के जीतने भी सहभागी हैं वे और मीडिया सब सचेत हो रहे हैं । वे कम से कम परीक्षा को तवज्जो जरूर देने लगे हैं । खुशी की बात यह भी है कि अब परीक्षा के दिनों में छात्र अकेला नहीं होता है  । शिक्षा के लिए यह यह एक खुशखबरी है । बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है जब परीक्षाओं के दिन केवल छात्रों से संबन्धित होते हैं । छात्रों को प्रवेश पत्र मिल गया , उन्होने तैयारी कर ही ली होगी फिर वे अब पढ़ें और परीक्षा दें । माता –पिता या अभिभावक अखबार से परीक्षा की समय सारिणी काट कर देने और थोड़े से जेबखर्च देने को ही अपना सबसे मूल कर्तव्य मानते थे और उसका निर्वाह कर उन्हें गर्व भी होता था । उस लिहाज से आज की स्थिति वाक़ई खुश करने वाली है कि छात्र की भावनाओं को समझने के लिए उसके आसपास  लोगों से लेकर संस्थान तक मौजूद रहने लगे हैं । लेकिन क्या यह सच में खुश होने का क्षण है ?

बात बारहवीं की गणित की परीक्षा से करते हैं । गणित के प्रश्न  कठिन थे । छात्र बाहर आकर रोये , रोष व्यक्त किया । माता – पिता व अभिभावकों ने बहुत से लोगों को इसके लिए जिम्मेदार माना , प्राचार्यों ने संबन्धित विषय के अध्यापकों को आड़े हाथों लिया, ऑनलाइन शिकायतें हुईं , सोशल मीडिया पर सीबीएसई का मज़ाक उड़ाया गया और  अखबारों ने इन सब पर खबरें बनायीं । सबने अपना अपना काम किया । ऊपर से देखने पर लगता है कि सबकुछ कितना सही हुआ । भारत ऐसा देश बन गया जहाँ प्रश्न पत्र में जरा सी दिक्कत आई और सब हरकत में आ गए । सबने रोष व्यक्त किया और अब सभी सगर्व सीबीएसई पर दबाव बनाएँगे कि गणित के प्रश्नपत्रों की जाँच में ढिलाइ बरती जाये । जिस तरह से सभी स्तरों पर दबाव बनाए जा रहे हैं उसे देखते हुए यह भी तय है कि सीबीएसई या तो कुछ अंक मुफ्त के दे देगी या जाँच में ढिलाइ करने के निर्देश छिपे तौर पर जारी कर देगी । छात्रों के अंक बढ़िया आ जाएँगे । वे खुश , सब खुश ! सबको अपने काम का इनाम छात्रों की मुस्कान में मिल जाएगा ! लेकिन अगले साल भी यही हालत रहेगी । तब गणित की जगह रसायन विज्ञान आ जाएगा या गणित ही आ जाये । फिर से वही सब दोहराया जाएगा । पिछले सालों में यही देखने को मिल भी रहा है । सबका ध्यान फौरी हल निकालने पर है जबकि मूल समस्या अलग है जिसके जूझने की जरूरत कोई महसूस नहीं करता है ।

बारहवीं कक्षा विद्यालयी शिक्षा का अंतिम पड़ाव है जिसे उसका चरम कह सकते हैं । उस पर छात्र के आगे का भविष्य निर्भर करता है । इसलिए यह कक्षा एक गंभीर तैयारी और गंभीर समझ की मांग करती है । छात्र इस कक्षा में आकर वाक़ई अपनी पढ़ाई को लेकर गंभीर हो भी जाते हैं । लेकिन जो तैयारी इस कक्षा के लिए चाहिए वह नहीं हो पाती है । लिहाजा छात्रों पर पूरे साल जबर्दस्त दबाव रहता है । उन्हें इसी कक्षा के अंकों के आधार पर बढ़िया कॉलेज में बढ़िया विषय मिलेंगे । यही कक्षा उन्हें रोजगार के बेहतर  और ज्यादा आमदनी वाले अवसर वाले कोर्स के लिए आधार बनेगी । यह चौतरफा दबाव इसी कक्षा पर होता है । इसलिए इस कक्षा की तैयारी बहुत जरूरी हो जाती है ।  तैयारी की हालत बहुत खराब है और तमाम तरह के शोर में इस ओर ध्यान भी नहीं जाता है ।

\सीबीएसई ने सतत एवं समग्र मूल्यांकन की व्यवस्था की है दसवीं कक्षा तक । इसके तहत छात्रों का समग्र मूल्यांकन लगातार होना है । छात्रों के अंक केवल लिखित परीक्षा पर ही निर्भर नहीं हैं बल्कि उनके आचार व्यवहार से लेकर उनके कला- कौशल तक को भी मूल्यांकन के दायरे में लाया गया ताकि उनसे लिखित परीक्षा का दबाव कम हो सके । इस व्यवस्था के मूल उद्देश्य से किसी को कोई दिक्कत नहीं है । समस्या इसके तरीके को लेकर भी नहीं है । न ही इसके मूल्यांकन बिन्दु कोई समस्या खड़ी करते हैं । केवल दसवीं तक की शिक्षा तक ही यदि किसी को पढ़ाना हो तो यह बहुत अच्छी मूल्यांकन व्यवस्था होगी । लेकिन समस्या की जड़ है इस मूल्यांकन व्यवस्था का आगे की कक्षाओं पर पड़ने वाला प्रभाव ।

दसवीं कक्षा में मार्च के महीने में सीबीएसई द्वारा ली जाने वाली अंतिम परीक्षा ही एक मात्र परीक्षा है जो बाहर की एजेंसी आयोजित करती है बाकी सब विद्यालय स्तर पर ही हो जाता है । छात्रों के कुल अंक में इस परीक्षा का मूल्य 30 प्रतिशत है शेष 70 प्रतिशत उन्हें विद्यालय स्तर पर ही मिल जाते हैं । आंतरिक मूल्यांकन के 70 प्रतिशत अंक कई भागों में बंटे होते हैं लेकिन उसमें लिखित परीक्षा की भूमिका कम है । बाकी असाइनमेंट और प्रोजेक्ट आदि के अंक हैं । इस तरह छात्रों के ऊपर से वाक़ई परीक्षा का बोझ कम हो जाता है । उन्हें स्थानीय स्तर पर बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के अच्छे खासे अंक मिल जाते हैं । इसका सीधा प्रभाव उनके पढ़ने की आदत पर पड़ा है जिससे  उनकी किसी भी विषय को तैयार करने की क्षमता घटी है ।

इस स्थिति के साथ छात्र ग्यारहवीं में आता है जहाँ पाठ्यक्रम में अभूतपूर्व विस्तार है । नीचे की कक्षाओं के समग्र मूल्यांकन ने उनमें पढ़ने की क्षमता को प्रभावित किया होता है ऊपर से ग्यारहवीं के अंकों का कोई खास महत्व भी नहीं होता सो ग्यारहवीं के छात्र समान्यतया अध्ययन से अरुचि दिखाते पाये जाते हैं । अब जरा समस्या की भयावहता का की कल्पना कीजिये । सबसे पहले विशाल पाठ्यक्रम जो विज्ञान  और सामाजिक विज्ञान पहले एक साथ थे वे अलग अलग हो जाते हैं , भाषा साहित्य का भी विस्तार हो जाता है , अकेले गणित की कई शाखाएँ आ जाती हैं । इसके बाद पिछली कक्षाओं में विकसित हुई कम पढ़ने की आदत और अंत में ग्यारहवीं कक्षा के अंकों का महत्वहीन होना । ये तीनों चीजें छात्रों को बरहवीं कक्षा के लिए तैयार नहीं कर पाती । जिसका दबाव बारहवीं में आते ही दिखने लगता है । छात्रों का खेलना रुक जाता है , वे खाना कम कर देते हैं ताकि नींद न आए ज्यादा और लगातार किताबों में घुसे रहने से आँखों पर भी बुरा असर पड़ता है । छात्रों की यह स्थिति पीछे के सतत एवं समग्र मूल्यांकन से उपजी दबावहीनता की खाट खड़ी कर देती है ।

सबसे दुखद यह है कि यह पूरी प्रक्रिया परिदृश्य से ही बाहर है । इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता । क्योंकि इस ओर ध्यान देना समय की मांग करता है । माता –पिता या अखबार के लिए एक दिन के कठिन प्रश्न पर जिरह कर लेना आसान है । बहुत हुआ तो कोई अभिभावक एक दिन अपने बच्चे के किसी यूनिट टेस्ट में कम अंक आने पर शोर मचा लेता है । फिर उस दिन अध्यापक पर प्राचार्य बरस पड़ते हैं । इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अध्यापक छात्रों की पीछे की तैयारी का रोना रोते रह जाते हैं लेकिन कोई उस ओर ध्यान नहीं देता ।

एक अध्यापक के रूप में मुझे ग्यारहवीं में आने वाले छात्रों को पुराने तौर तरीकों से निकालने में ही काफी समय लग जाता है । उन्हें यह विश्वास ही नहीं होता कि ग्यारहवीं में पहले पाठ के आधार पर साल के अंत में भी प्रश्न आएंगे । नीचे की कक्षाओं में उनकी जो आदत लगी है उस हिसाब से पहला  एफए होते ही ज्ञान का वह भाग उनके लिए निरर्थक हो जाता है । अतः वे उसे अपने जेहन तक से निकाल देने में नहीं हिचकते । मैं दसवीं को भी पढ़ाता हूँ तो वहाँ एफए एक का  कोई संदर्भ यदि दूसरे एफ ए में आता है तो कई बार छात्रों को मुंह ताकते देखा है । कुछ तो खुल के कह देते हैं कि अमुक संदर्भ  बीते हुए एफ ए का था इसलिए हमें नहीं पता ।

अब थोड़ी सी बात प्रश्न पत्रों पर । बाहर तक से आने वाले दसवीं तक के प्रश्न पत्र आवश्यक रूप से बड़े ही सरल होते हैं । उदाहरण के तौर पर अपठित गद्यांश के प्रश्न को लेते हैं । गद्यांश में बताया जाता है कि महात्मा गांधी का जन्म पोरबंदर में हुआ था। नीचे प्रश्न होता है – महात्मा गांधी का जन्म कहाँ हुआ था । भाषा साहित्य के व्याकरण के प्रश्न छठी से लेकर दसवीं तक लगभग एक समान होते हैं । लेकिन बारहवीं के प्रश्न अचानक से काफी गहरे पूछ लिए जाते हैं । जिन छात्रों को आदत लगी है आसान प्रश्न करने की वे थोड़े से घुमावदार प्रश्न देखते ही चिंतित होने लगते हैं । एक दो घुमावदार प्रश्न उनके पूरे आत्मविश्वास को हिलाने के लिए काफी होते हैं । फिर वे परीक्षा भवन से रोते हुए आयें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।

ऊपर कही गयी बातें कोई नयी नहीं हैं । दसवीं से लेकर बारहवीं तक को पढ़ाने वाला कोई भी अध्यापक इस पर लंबी बात कर सकता है । हर वर्ष साँप के गुजर जाने पर ही लकीर पीटी जाती है । शिक्षा के मामले में तो यह लकीर पीटने जैसी बात भी नहीं है । मीडिया के लिए कठिन प्रश्न पत्र एक सनसनी है लेकिन पूरी प्रक्रिया कभी भी उसकी चिंता का विषय नहीं रही है । अध्यापक से ऊपर के लोग सबकुछ अध्यापकों पर छोडकर निश्चिंत हो जाते हैं । नीति बनाने वाले लोग विद्यालय का मुँह देखे बिना यहाँ वहाँ से लायी हुई बातें थोप कर अपने कर्मों की इतिश्री कर लेते हैं । माता – पिता भारत में कभी इतने जागरूक हुए ही नहीं कि वे शिक्षा की प्रक्रिया पर ध्यान दें । छात्र जहाँ तक संभव हो सके मेहनत करने से बचने की कोशिश करते हैं । ऐसे में गणित के कठिन प्रश्नों पर शोर मचा लेना और सीबीएसई द्वारा जाँच में ढिलाइ बरतना खुश करने के बजाय एक खतरनाक स्थिति की ओर संकेत करती है जहाँ हम छात्रों को तैयार करने के बजाय क्षणिक हल निकालने की कोशिश करते हैं ।


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